मुजफ्फरपुर में ताजिया-अखाड़ा जुलूस की धूम: हैरतअंगेज करतबों से थमी सांसें, ब्लेड और जंजीरों के मातम से छलनी हुए सीने
मुजफ्फरपुर शहर समेत पूरे जिले में यौम-ए-आशूरा (मुहर्रम) का त्योहार बेहद अकीदत, अदम्य साहस और गमगीन माहौल के बीच पारंपरिक तरीके से मनाया गया। शहर के विभिन्न मोहल्लों से पारंपरिक ताजिया और अखाड़े का जुलूस निकाला गया, जो मुख्य मार्गों से होते हुए कर्बला मैदान पहुंचा।
इस दौरान जुलूस में शामिल युवाओं और उस्तादों ने एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज करतब दिखाए, जिसे देखने के लिए सड़कों के दोनों ओर हजारों की संख्या में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। वहीं दूसरी ओर, कर्बला के शहीदों की याद में शोक मना रहे अंजुमनों के जायरीनों ने ब्लेड, छुरियों और जंजीरों से सीना-जनी (मातम) की, जिससे माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया।
शौर्य का प्रदर्शन: लाठी, तलवार और आग के गोलों से हैरतअंगेज करतब
मुहर्रम के इस ऐतिहासिक जुलूस में सबसे बड़ा आकर्षण विभिन्न अखाड़ों द्वारा प्रदर्शित की गई पारंपरिक युद्ध कला रही। जैसे ही अखाड़े शहर के प्रमुख चौराहों (जैसे- कंपनीबाग, कल्याणी, सरैयागंज और सूतापट्टी) पर पहुंचे, वैसे ही करतबबाजों ने समां बांध दिया।
लाठी और तलवारबाज़ी का हुनर: अखाड़े के उस्तादों और नन्हे बच्चों ने हवा में इस तेजी से लाठियां और चमचमाती तलवारें भांजी कि देखने वालों की सांसें थम गईं। एक साथ कई लाठियों के प्रहार को ढाल से रोकने के कौशल ने दर्शकों को ताली बजाने पर मजबूर कर दिया।
आग के गोलों के बीच हैरतअंगेज खेल: अंधेरा घिरते ही कई युवाओं ने जलते हुए आग के गोलों (बनेठी) को हवा में लहराकर हैरतअंगेज चक्रव्यूह बनाया। इन खतरनाक करतबों को बेहद सफाई और सुरक्षा के साथ अंजाम दिया गया।
दांतों तले उंगली दबाने वाले दृश्य: कुछ जांबाजों ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर तलवार से नारियल काटने और ट्यूबलाइट को बदन पर तोड़ने जैसे जोखिम भरे प्रदर्शन किए, जिसे देख लोग स्तब्ध रह गए।
गम का समंदर: जंजीर और ब्लेड के मातम से छलनी हुए सीने
शौर्य प्रदर्शन के समानांतर, जुलूस का एक रूप बेहद भावुक और गमगीन करने वाला था। हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत को याद करते हुए शिया समुदाय और विभिन्न अंजुमनों के लोगों ने काले लिबास पहनकर मातम मनाया।
"हाय हुसैन, वाय हुसैन" और "शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन" के गगनभेदी नारों के बीच पुरुषों और युवाओं ने अपने हाथों में तेज धार वाले ब्लेड, छोटी छुरियां और जंजीरें थाम रखी थीं।
शोक में डूबे इन मातमदारों ने पूरी अकीदत के साथ जंजीरों और छुरियों से अपने सीने और पीठ पर प्रहार किया। देखते ही देखते मातम करने वालों के सीने खून से छलनी हो गए और उनके कुर्ते लाल रंग में रंग गए। इस दर्दनाक लेकिन आस्था से भरे दृश्य को देखकर सड़क पर खड़े हर आम-ओ-खास की आंखें नम हो गईं। मातमदारों का कहना था कि यह खून कर्बला के मैदान में बहे बेगुनाह खून के प्रति उनकी अकीदत और शोक का एक छोटा सा नजराना है।
भव्य ताजिया: अकीदत के साथ निकला कारवां
जिले के शहरी और ग्रामीण इलाकों में आकर्षक और गगनचुंबी ताजिया (इमामबाड़े का प्रतीक रूप) आकर्षण का केंद्र रहे। थर्मोकोल, रंग-बिरंगे कागज, कांच और चमकीली पन्नियों से सजे ऊंचे-ऊंचे ताजियों को जब लोग अपने कंधों पर उठाकर निकले, तो पूरा माहौल 'या हुसैन' के नारों से गूंज उठा।
शहर के सिकंदरपुर, चंदवारा, ब्रह्मपुरा, मिठनपुरा, और नया बाजार समेत ग्रामीण क्षेत्रों जैसे बोचहां, कांटी और सकरा से भव्य ताजिया जुलूस निकाला गया। लोगों ने मन्नतें पूरी होने पर ताजिया पर सेहरा, चादर और मलाई का भोग चढ़ाया।
एक नज़र में: मुजफ्फरपुर मुहर्रम जुलूस की मुख्य बातें
| आयोजन का पहलू | मुख्य विवरण |
|---|---|
| प्रमुख मार्ग | सिकंदरपुर, कल्याणी, सरैयागंज, टाउन थाना रोड होते हुए कर्बला |
| करतब के प्रकार | लाठी संचालन, तलवारबाजी, आग के गोले (बनेठी), आंखों पर पट्टी बांधकर प्रदर्शन |
| मातम का स्वरूप | शिया समुदाय द्वारा ब्लेड, छुरियों और लोहे की जंजीरों से सीना-जनी |
| प्रशासनिक व्यवस्था | चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल, ड्रोन कैमरों से निगरानी, शांति समिति मुस्तैद |
सुरक्षा के कड़े इंतजाम: ड्रोन और सीसीटीवी से रखी गई नजर
मुहर्रम के इस संवेदनशील और विशाल आयोजन को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद दिखा। विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) खुद सड़कों पर गश्त करते नजर आए।
ड्रोन कैमरों से निगरानी: संवेदनशील इलाकों और संकरी गलियों में छतों पर पत्थरों या उपद्रवी तत्वों की निगरानी के लिए विशेष रूप से ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल किया गया।
सादे लिबास में पुलिस: भीड़ के बीच किसी भी प्रकार की छिटपुट घटना या झपटमारी को रोकने के लिए सादे लिबास में महिला और पुरुष पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी।
चिकित्सा दल मुस्तैद: मातम के दौरान घायल होने वाले लोगों और करतबबाजों को तुरंत प्राथमिक उपचार देने के लिए जुलूस के साथ-साथ एम्बुलेंस और डॉक्टरों की मोबाइल टीम तैनात रही।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल
मुजफ्फरपुर के इस जुलूस ने एक बार फिर शहर की ऐतिहासिक गंगा-जमुनी तहज़ीब और आपसी भाईचारे की मिसाल पेश की। कई जगहों पर हिंदू भाइयों ने आगे बढ़कर अखाड़े के उस्तादों और खिलाड़ियों का स्वागत किया, उनके लिए शरबत, ठंडे पानी और प्राथमिक चिकित्सा (First-Aid) की व्यवस्था की। राजनीतिक दलों के नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी विभिन्न अखाड़ों के खलीफाओं को पगड़ी बांधकर और शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
मुजफ्फरपुर में संपन्न हुआ यह ताजिया और अखाड़ा जुलूस केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कला, अटूट आस्था, इतिहास की शहादत को याद करने और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने का एक जीवंत माध्यम साबित हुआ। देर शाम सभी ताजियों को पूरे अदब-ओ-एहतराम के साथ स्थानीय कर्बला मैदानों में ले जाकर सुपुर्द-ए-खाक (ठंडा) किया गया, जिसके साथ ही मुहर्रम का यह दस दिवसीय पर्व संपन्न हो गया।