मुहर्रम के यौम-ए-आशूरा पर मुजफ्फरपुर की सड़कों पर उमड़ा अकीदतमंदों का सैलाब; कर्बला के शहीदों की याद में बहा खून, हैरतअंगेज लाठी-तलवारबाजी से थम गईं सांसें!
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले और इसके आस-पास के सुदूर ग्रामीण इलाकों में मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी यौम-ए-आशूरा पर ऐतिहासिक और पारंपरिक तरीके से ताजिया और अखाड़ा जुलूस निकाला गया। कर्बला के मैदान में हक और इंसानियत की रक्षा के लिए शहीद हुए हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 जांबाज साथियों की शहादत की याद में पूरा शहर डूबा नजर आया।
मुजफ्फरपुर के प्रमुख चौक-चौराहों—कंपनी बाग, सूतापट्टी, सरैयागंज, सिकंदरपुर, कल्याणी और अखाड़ाघाट से होते हुए जब केंद्रीय जुलूस गुजरा, तो अकीदतमंदों (श्रद्धालुओं) का हुजूम उमड़ पड़ा। इस दौरान सबसे ज्यादा झकझोर देने वाला और हैरान करने वाला नजारा था 'शहीदाने-कर्बला' का खूनी मातम। लोहे की तीखी जंजीरों, छुरियों और नुकीले ब्लेडों से अकीदतमंदों ने अपने सीने और पीठ को लहूलुहान कर लिया। वहीं दूसरी ओर, विभिन्न अखाड़ों के जांबाज खिलाड़ियों ने पारंपरिक हथियारों से ऐसे हैरतअंगेज करतब दिखाए कि पूरा मुजफ्फरपुर 'या हुसैन' के नारों से गूंज उठा।
जंजीर और ब्लेड का खूनी मातम: जब 'या हुसैन' की सदाओं से भर आईं आंखें
मुहर्रम की 10वीं का सबसे भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाला हिस्सा दोपहर के वक्त शुरू हुआ, जिसे 'शहीदी जुलूस' कहा जाता है।
छलनी हुए सीने: शिया समुदाय और अन्य अकीदतमंदों की अंजुमनों ने शहर के विभिन्न इमामबाड़ों से मातम मनाते हुए मार्च निकाला। मातमी धुनों और नौहे (शोक गीत) के बीच जैसे ही युवाओं ने अपने हाथों में लोहे की भारी जंजीरें उठाईं, माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया। 'या हुसैन, हम न थे कर्बला में...' के नारों के साथ युवाओं ने अपनी पीठ और सीने पर जंजीर और ब्लेड से वार करना शुरू कर दिया, जिससे उनके सीने छलनी हो गए और सड़कें खून के कतरों से लाल हो गईं।
बच्चों और बुजुर्गों का जज्बा: इस खूनी मातम में केवल युवा ही नहीं, बल्कि कई बुजुर्ग और बच्चे भी इमाम हुसैन की मोहब्बत में अपनी उंगलियों और माथे को छुरियों से चटकाते नजर आए। अजीब बात यह थी कि सीने से खून बहने के बावजूद किसी के चेहरे पर शिकन या दर्द का अहसास नहीं था, बल्कि हर कोई हुसैन की शहादत के गम में डूबा हुआ था।
अखाड़ों में शौर्य का प्रदर्शन: लाठी, तलवार और आग के गोलों से करतब
मातम के समानांतर, मुजफ्फरपुर के विभिन्न पारंपरिक अखाड़ों से जुड़े लाठीबाजों और तलवारबाजों ने अपने हुनर का प्रदर्शन किया। अखाड़े के खलीफाओं की देखरेख में युवाओं और बच्चों की टोलियों ने हैरतअंगेज प्रदर्शन किए।
तलवारों की खनक और लाठी की गूंज: जुलूस के दौरान कल्याणी चौक और सरैयागंज टावर के पास अखाड़े के खिलाड़ियों ने दोधारी तलवारबाजी, पट्टाबाजी और लाठी चलाने के एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज पैंतरे दिखाए। एक साथ चार-चार लाठियों को हवा में लहराते हुए और एक-दूसरे पर वार करते हुए खिलाड़ियों की फुर्ती देखते ही बन रही थी।
आग के गोलों से हैरतअंगेज खेल: जैसे ही शाम ढली, अखाड़े के करतबबाजों ने जलती हुई लकड़ियों और आग की लपटों से घिरे गोलों (बनैती) को हवा में तेजी से नचाकर अद्भुत कला का प्रदर्शन किया। दर्शकों ने तालियों और नारों के साथ खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाया।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल: मुजफ्फरपुर के इस अखाड़ा जुलूस की सबसे खूबसूरत बात यह रही कि कई अखाड़ों में हिंदू और मुस्लिम समाज के युवा कंधे से कंधा मिलाकर लाठियां भांज रहे थे और तिरंगा झंडा लहराकर देश की एकता और कौमी एकता का संदेश दे रहे थे।
एक नज़र में: मुजफ्फरपुर मुहर्रम जुलूस 2026
| मुख्य बिंदु और हाइलाइट्स | ग्राउंड जीरो की विस्तृत लाइव रिपोर्ट |
|---|---|
| मुख्य मार्ग (रूट) | इमामबाड़ों से शुरू होकर कंपनी बाग, सरैयागंज, कल्याणी होते हुए कर्बला तक |
| मातम का स्वरूप | छुरियों, जंजीरों और तीखे ब्लेड से सीना और पीठ लहूलुहान कर मातम |
| अखाड़ा प्रदर्शन | लाठी, तलवारबाजी, पट्टाबाजी और जलती बनैती के हैरतअंगेज करतब |
| सुरक्षा व्यवस्था | चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल, ड्रोन कैमरे और सीसीटीवी से निगरानी |
| सांप्रदायिक सौहार्द | हिंदू-मुस्लिम भाइयों ने मिलकर संभाली व्यवस्था, गंगा-जमुनी तहजीब दिखी |
भव्य और आकर्षक ताजिए: रात भर घूमती रहीं मिसालें
शहर के सिकंदरपुर, ब्रह्मपुरा, चंदवारा, और काजी मोहम्मदपुर इलाकों से विशाल और बेहद खूबसूरत रोशनी से सजे ताजिए निकाले गए। थर्मोकोल, रंग-बिरंगे कागजों, झिलमिलाती लाइटों और शीशों से बने ये ताजिए इमाम हुसैन के रौजे (मकबरे) की हूबहू शक्ल में बनाए गए थे।
करतब दिखाते हुए बढ़े आगे: कई ताजिए इतने विशाल थे कि उन्हें बिजली के तारों से बचाने के लिए अखाड़े के वॉलिंटियर्स बांस के डंडों की मदद से तारों को ऊपर उठाते हुए आगे बढ़ रहे थे। इन ताजिए के आगे ढोल, ताश और नगाड़ों की थाप पर युवा पारंपरिक धुनों पर थिरकते और अखाड़े का खेल खेलते हुए कर्बला की ओर बढ़ रहे थे।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम: ड्रोन कैमरों और क्यूआरटी (QRT) की रही पैनी नजर
मुहर्रम और अखाड़ा जुलूस को शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल में संपन्न कराने के लिए मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन और पुलिस कप्तान (SSP) ने अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की थी।
चप्पे-चप्पे पर पुलिस: संवेदनशील इलाकों और संवेदनशील मोड़ों पर भारी संख्या में बिहार पुलिस के जवान, बीएमपी (BMP) की टुकड़ियां और क्विक रिस्पांस टीम (QRT) को तैनात किया गया था। जिला मजिस्ट्रेट (DM) और एसएसपी खुद कल्याणी और सरैयागंज कंट्रोल रूम से पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए थे।
डिजिटल सर्विलांस: जुलूस के पूरे रूट पर ड्रोन कैमरों (Drones) के जरिए छतों और संकरी गलियों की निगरानी की जा रही थी। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की अफवाह या भड़काऊ पोस्ट को रोकने के लिए साइबर सेल चौबीसों घंटे एक्टिव मोड में काम कर रही थी।
मुजफ्फरपुर में शनिवार को संपन्न हुआ मुहर्रम का यह ऐतिहासिक जुलूस केवल मातम और करतबों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह बुराई पर अकीदत की जीत और गंगा-जमुनी तहजीब का एक जीवंत दस्तावेज था। तीखे ब्लेडों से लहूलुहान होते सीने जहां कर्बला के दर्द को बयां कर रहे थे, वहीं अखाड़े की लाठियों ने समाज को एकजुट रहने की ताकत दिखाई। देर शाम शहर के विभिन्न कर्बला मैदानों में गमगीन माहौल के बीच ताजिए को सुपुर्द-ए-खाक (विसर्जित) किया गया, जिसके साथ ही मुहर्रम का यह 10 दिवसीय शोक पर्व शांति और सौहार्द के साथ संपन्न हो गया।