गया जेल के निलंबित उपाधीक्षक का दावा: ‘CCTV फुटेज से सामने आ जाएगी सच्चाई’, डीएम से लगाई न्याय की गुहार

गयाजी। गया केंद्रीय कारा में मादक पदार्थों की आपूर्ति के आरोपों के बाद निलंबित किए गए उपाधीक्षक सुदर्शन प्रसाद सिंह ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को निराधार बताते हुए जिला प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की है। शुक्रवार को उन्होंने गया के जिला पदाधिकारी (डीएम) शशांक शुभंकर से मुलाकात कर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और न्याय दिलाने की अपील की। उनका कहना है कि यदि संबंधित दिन की जेल परिसर की सीसीटीवी फुटेज की जांच कराई जाए तो पूरे मामले की सच्चाई सामने आ जाएगी और उन पर लगाए गए आरोप स्वतः गलत साबित हो जाएंगे।

उपाधीक्षक सुदर्शन प्रसाद सिंह ने कहा कि उन्हें बिना किसी ठोस साक्ष्य के निलंबित किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने व्यक्तिगत कारणों और प्रशासनिक मतभेदों के चलते उन्हें अपने रास्ते से हटाने के लिए सुनियोजित साजिश रची है। उनका दावा है कि जिस घटना के आधार पर कार्रवाई की गई, उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी और उन्हें जानबूझकर बलि का बकरा बनाया गया है।

उन्होंने बताया कि जिस दिन जेल में मादक पदार्थ की आपूर्ति का आरोप लगाया गया है, उस दिन की पूरी गतिविधि जेल परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड होगी। यदि उन फुटेज की तकनीकी जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या जिला प्रशासन की निगरानी में कराई जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि आरोप कितने सही हैं। उन्होंने डीएम से अनुरोध किया कि निष्पक्ष जांच के लिए सभी डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए और उनकी जांच कराई जाए।

सुदर्शन प्रसाद सिंह ने यह भी कहा कि जिस छापेमारी का उल्लेख कर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है, उस दौरान बरामदगी की पूरी प्रक्रिया की जानकारी जेल प्रशासन के अन्य अधिकारियों से भी ली जा सकती है। उनका कहना है कि 16 जुलाई को केंद्रीय कारा में हुई छापेमारी के दौरान जो भी कार्रवाई हुई, वह प्रशासनिक रिकॉर्ड में दर्ज है और उससे सच्चाई सामने लाई जा सकती है। उन्होंने दावा किया कि उन्हें घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना तथ्यों के विपरीत है।

निलंबित उपाधीक्षक ने आरोप लगाया कि जेल प्रशासन के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने पहले से ही उन्हें हटाने की योजना बना रखी थी। उन्होंने कहा कि कई प्रशासनिक मामलों में उनकी स्पष्ट कार्यशैली कुछ लोगों को पसंद नहीं थी, जिसके कारण उनके खिलाफ माहौल बनाया गया। उन्होंने कहा कि अब उसी का परिणाम है कि बिना निष्पक्ष जांच के उन पर गंभीर आरोप लगाकर निलंबन की कार्रवाई कर दी गई।

डीएम को दिए गए आवेदन में उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने, सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने, संबंधित अधिकारियों के बयान दर्ज करने तथा उपलब्ध सभी दस्तावेजों की जांच कराने की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि निष्पक्ष जांच होती है तो उनकी बेगुनाही साबित हो जाएगी और उन्हें न्याय मिलेगा।

गौरतलब है कि गया केंद्रीय कारा में मादक पदार्थों की आपूर्ति और प्रतिबंधित सामग्री मिलने के मामले ने हाल के दिनों में प्रशासनिक हलकों में काफी चर्चा बटोरी है। इस मामले में विभागीय स्तर पर कार्रवाई करते हुए उपाधीक्षक सुदर्शन प्रसाद सिंह को निलंबित किया गया था। इसके बाद से यह मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं।

इस बीच निलंबित अधिकारी द्वारा सीसीटीवी फुटेज की जांच की मांग किए जाने के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है। यदि जिला प्रशासन या संबंधित विभाग इस मांग को स्वीकार करता है और डिजिटल साक्ष्यों की जांच कराता है, तो जांच की दिशा बदल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जेल जैसे संवेदनशील संस्थानों में सीसीटीवी रिकॉर्डिंग किसी भी विवादित घटना की सच्चाई सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सूत्रों के अनुसार, जिला प्रशासन ने उपाधीक्षक द्वारा दिए गए आवेदन को प्राप्त कर लिया है। हालांकि, इस मामले में प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। विभागीय जांच अपनी प्रक्रिया के अनुसार जारी है और अंतिम निर्णय जांच रिपोर्ट आने के बाद ही लिया जाएगा।

उधर, जेल प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की जांच नियमों के अनुरूप की जा रही है और जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। फिलहाल विभागीय जांच पूरी होने का इंतजार किया जा रहा है। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या साजिश के प्रमाण मिलते हैं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई संभव है।

अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और विभागीय जांच पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों की जांच के बाद क्या निष्कर्ष सामने आते हैं और क्या निलंबित उपाधीक्षक के दावों को बल मिलता है या विभागीय कार्रवाई सही साबित होती है। फिलहाल मामला जांच के अधीन है और अंतिम निर्णय आने तक किसी भी पक्ष के दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की जा सकती।