दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर की कथित 'फर्जी डिग्री' का मामला साकेत कोर्ट में फिर शुरू हुई सुनवाई
भागलपुर: दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के नेता जितेंद्र सिंह तोमर की तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) से जारी कथित फर्जी एलएलबी (LLB) डिग्री का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। पिछले करीब एक दशक से चल रहे इस हाईप्रोफाइल मामले में अब साकेत कोर्ट में गवाही और दस्तावेजों के सत्यापन (Verification) की प्रक्रिया तेज हो गई है।
क्या है पूरा विवाद?
वर्ष 2015 में यह मामला तब सामने आया जब जितेंद्र सिंह तोमर पर आरोप लगा कि उन्होंने अपनी एलएलबी की डिग्री हासिल करने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है। तोमर ने दावा किया था कि उन्होंने 1999 में मुंगेर के विश्वनाथ सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की थी, जो उस समय टीएमबीयू से संबद्ध था। हालांकि, बाद में हुई जांच में पाया गया कि उनके द्वारा जमा किए गए शैक्षणिक प्रमाण पत्र, जिसमें फैजाबाद और बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से जुड़े दस्तावेज शामिल थे, फर्जी थे।
साकेत कोर्ट में हालिया घटनाक्रम
इस मामले की सुनवाई दिल्ली के साकेत कोर्ट में चल रही है। हाल ही में, 30 जून 2026 को टीएमबीयू के पूर्व कॉलेज इंस्पेक्टर डॉ. मनींद्र कुमार सिंह को इस मामले में गवाही के लिए तलब किया गया था। अदालत ने उनसे उन दस्तावेजों के सत्यापन की मांग की है जिन्हें दिल्ली पुलिस ने जांच के दौरान टीएमबीयू से जब्त किया था।
डॉ. सिंह ने कोर्ट को बताया कि दस्तावेजों की संख्या काफी अधिक होने के कारण इतने कम समय में इनका सटीक सत्यापन कर पाना व्यावहारिक रूप से कठिन है। इस पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने उन्हें अतिरिक्त समय देते हुए अगली सुनवाई के लिए 3 जुलाई 2026 की तारीख मुकर्रर की है। इस सुनवाई के दौरान तोमर के अधिवक्ता सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे।
टीएमबीयू की कार्रवाई का इतिहास
इस मामले को लेकर टीएमबीयू प्रशासन ने पिछले वर्षों में कड़े कदम उठाए थे:
डिग्री रद्दीकरण: वर्ष 2017 में, टीएमबीयू के सिंडिकेट, सीनेट और परीक्षा बोर्ड की मंजूरी के बाद विश्वविद्यालय ने जितेंद्र सिंह तोमर की एलएलबी की डिग्री आधिकारिक रूप से रद्द कर दी थी।
FIR दर्ज: विश्वविद्यालय ने इस धोखाधड़ी में शामिल पाए गए विश्वविद्यालय के 14 कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई का रास्ता साफ किया था और तोमर के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी।
जांच का दायरा: विश्वविद्यालय की जांच में यह पाया गया था कि तोमर की नामांकन प्रक्रिया और परीक्षा संबंधी दस्तावेज पूरी तरह से संदेहास्पद थे।
राजनीतिक और कानूनी प्रभाव
इस मामले का राजनीतिक असर भी काफी गहरा रहा है। 2015 में गिरफ्तारी के बाद तोमर को कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। वहीं, 2020 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके 2015 के चुनावी हलफनामे में शैक्षणिक योग्यता को लेकर गलत जानकारी देने के कारण उनके चुनाव को भी 'शून्य' घोषित कर दिया था।
वर्तमान में, अदालत का ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि क्या दिल्ली पुलिस द्वारा जब्त किए गए दस्तावेज पूरी तरह से प्रामाणिक हैं। यह मामला न केवल एक पूर्व मंत्री की साख से जुड़ा है, बल्कि टीएमबीयू की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े करता है, जहां से फर्जी डिग्री जारी करने का रैकेट चला था। अब सभी की निगाहें आगामी 3 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सत्यापन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।