समारोहपूर्वक मनाई गई स्वामी सहजानंद सरस्वती की पुण्यतिथि - शहर के कंपनीबाग
बिहार के मुजफ्फरपुर शहर का ऐतिहासिक कंपनीबाग परिसर आज एक बार फिर इतिहास के पन्नों में दर्ज गौरवमयी यादों का गवाह बना। संगठित भारतीय किसान आंदोलन के जनक, अदम्य स्वतंत्रता सेनानी और 'विद्रोही संन्यासी' स्वामी सहजानंद सरस्वती की पुण्यतिथि पूरे जिले में समारोहपूर्वक और गरिमामयी ढंग से मनाई गई।
इस भव्य श्रद्धांजलि सभा सह विचार गोष्ठी में राजनीतिक दिग्गजों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों, किसान प्रतिनिधियों और युवाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। उपस्थित जनसमूह ने स्वामी जी के तैलचित्र पर माल्यार्पण कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और देश के नवनिर्माण में उनके अद्वितीय योगदान को नमन किया।
क्रांति की भूमि: कंपनीबाग में विचारों का महामंथन
समारोह की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चार और स्वामी जी के चित्र पर सामूहिक पुष्पार्पण के साथ हुई। कंपनीबाग के मंच से जब वक्ताओं ने बोलना शुरू किया, तो माहौल स्वामी जी के विचारों की ऊर्जा से भर गया।
मुख्य वक्ता ने सभा को संबोधित करते हुए कहा:
"स्वामी सहजानंद सरस्वती को किसी एक जाति, वर्ग या क्षेत्र की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। वे देश के शोषित, वंचित और बेज़बान किसानों के मसीहा थे। उनका मानना था कि समाज का असली उद्धार तब तक संभव नहीं है, जब तक खेतों में पसीना बहाने वाले अन्नदाता को उसका वाज़िब हक नहीं मिल जाता।"
स्वामी जी के मूल सिद्धांत: 'रोटी ही भगवान है'
गोष्ठी में वक्ताओं ने स्वामी जी के उन क्रांतिकारी विचारों को रेखांकित किया जिन्होंने भारतीय समाज और राजनीति की दिशा बदल दी थी:
संन्यास और सेवा का संगम: स्वामी जी दंडी संन्यासी थे, लेकिन उन्होंने मंदिर की चारदीवारी में बैठने के बजाय खेतों-खलिहानों को अपनी कर्मभूमि बनाया। उन्होंने साफ कहा था कि भूख से तड़पते इंसान के लिए 'रोटी ही असली भगवान' है।
जातिवाद के खिलाफ शंखनाद: उन्होंने यह साबित किया कि शोषक चाहे अपनी ही जाति का क्यों न हो, उसके अत्याचार के खिलाफ खड़ा होना ही सच्चा धर्म है। उन्होंने बिहार के बड़े ज़मींदारों की क्रूरता के खिलाफ खुद लाठी उठाई और गरीब किसानों के ढाल बने।
एक नजर इतिहास पर: नौरंग राय से स्वामी सहजानंद तक का सफर
| विवरण | ऐतिहासिक तथ्य |
|---|---|
| जन्म | सन् 1889, महाशिवरात्रि (गाजीपुर, यूपी) |
| बचपन का नाम | नौरंग राय |
| क्रांतिकारी कदम | मात्र 18 वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण किया |
| महाप्रयाण (निधन) | 26 जून 1950, मुजफ्फरपुर (बिहार) |
बिहार से नाता और किसान आंदोलन का उदय
स्वामी जी का मुख्य कर्मक्षेत्र बिहार ही था। उन्होंने सन् 1929 में 'बिहार प्रांतीय किसान सभा' की स्थापना की, जो बाद में चलकर देश का सबसे बड़ा किसान संगठन बना।
सन् 1934 के विनाशकारी बिहार भूकंप के दौरान जब ज़मींदार तबाह हो चुके किसानों से जबरन लगान वसूल रहे थे, तब स्वामी जी का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने हुंकार भरी थी— "कैसे लोगे मालगुजारी, लट्ठ हमारा ज़िंदाबाद!" इस एक नारे ने पूरे देश के किसानों में आत्मसम्मान की अलख जगा दी थी।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य: आज स्वामी जी के विचारों की कितनी जरूरत?
कंपनीबाग की इस सभा में बुद्धिजीवियों ने वर्तमान कृषि व्यवस्था और किसानों की दयनीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। वक्ताओं ने कहा कि स्वामी जी को गए दशकों बीत चुके हैं, लेकिन आज भी देश का अन्नदाता कर्ज, फसल की सही कीमत न मिलने और मौसम की मार से त्रस्त होकर आत्महत्या करने को मजबूर है।
समारोह में सर्वसम्मत से सरकार के समक्ष ये प्रमुख मांगें रखी गईं:
कृषि को मिले उद्योग का दर्जा: किसानों की आय दोगुनी करने के लिए स्वामी जी की सोच के अनुरूप नीतियां बनाई जाएं।
पाठ्यक्रम में जीवनी: आने वाली पीढ़ी को स्वामी जी के संघर्षों से परिचित कराने के लिए उनकी जीवनी को स्कूली शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए।
राष्ट्रीय सम्मान: देश के प्रमुख कृषि विश्वविद्यालयों या अनुसंधान केंद्रों का नामकरण स्वामी सहजानंद सरस्वती के नाम पर हो।
मुजफ्फरपुर से आखिरी सांस तक का नाता
इतिहासकारों ने भावुक होते हुए याद दिलाया कि मुजफ्फरपुर की धरती का स्वामी जी से सबसे गहरा और आखिरी नाता रहा है। 26 जून 1950 को इसी मुजफ्फरपुर में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली थी। उनके निधन पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने रोते हुए लिखा था— "आज दलितों और किसानों का सच्चा संन्यासी चला गया।" यही कारण है कि कंपनीबाग में उनकी पुण्यतिथि मनाना हर मुजफ्फरपुर वासी के लिए एक ऐतिहासिक और नैतिक कर्तव्य है।
कार्यक्रम की मुख्य झलकियां (At a Glance)
स्थान: कंपनीबाग परिसर, मुजफ्फरपुर शहर।
माहौल: देशभक्ति के गीतों और 'स्वामी जी अमर रहें' के नारों से गुंजायमान।
संकल्प: जाति-पाति से ऊपर उठकर किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखना।
कार्यक्रम के समापन पर आयोजकों ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि स्वामी जी को सच्ची श्रद्धांजलि केवल तैलचित्र पर फूल चढ़ाना नहीं है, बल्कि उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारना है। राष्ट्रगान के सामूहिक गान के साथ इस ऐतिहासिक और भव्य समारोह का समापन हुआ।