मायागंज अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं पर लगा ग्रहण: 10 मार्च से जांच कार्य बाधित, प्रशासन की चुप्पी से मरीजों में आक्रोश
भागलपुर: जिले के सबसे बड़े स्वास्थ्य केंद्र, जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (मायागंज अस्पताल) में चिकित्सा व्यवस्था एक बार फिर चरमरा गई है। पिछले कई दिनों से अस्पताल में पैथोलॉजिकल जांच की सुविधा बाधित है, जिससे मरीजों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। 10 मार्च से जांच कार्य ठप होने के बावजूद अस्पताल प्रशासन और जिला स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई ठोस पहल न किए जाने से व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।
निजी एजेंसी की लापरवाही या प्रशासनिक विफलता?
अस्पताल में जांच का जिम्मा एक निजी एजेंसी को सौंपा गया है। सूत्रों के अनुसार, एजेंसी और प्रशासन के बीच भुगतान या अनुबंध के नवीनीकरण से जुड़े विवाद के कारण सेवाएं बाधित हुई हैं। आलम यह है कि अस्पताल के ओपीडी (OPD) और इमरजेंसी विभाग में आने वाले सैकड़ों मरीजों को खून, पेशाब और अन्य जरूरी जांच के लिए बाहर की निजी प्रयोगशालाओं में जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
गरीब मरीज, जो सरकारी अस्पताल में मुफ्त या रियायती दरों पर जांच की उम्मीद लेकर आते हैं, वे अब भारी कीमत चुकाकर बाहर से जांच कराने को विवश हैं।
मूकदर्शक बना अस्पताल प्रशासन
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात अस्पताल प्रशासन का रवैया है। पिछले कई दिनों से जांच कार्य बाधित रहने के बावजूद, न तो अस्पताल प्रबंधन ने एजेंसी के साथ वार्ता कर समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की है और न ही वैकल्पिक व्यवस्था (अस्पताल की अपनी लैब) को पूरी तरह सक्रिय किया है।
आम लोगों का आरोप है कि:
निजी एजेंसी को खुली छूट: प्रशासन निजी एजेंसी के साथ सख्ती बरतने के बजाय मूकदर्शक बना हुआ है।
मरीजों का शोषण: जांच बाधित होने से मरीजों को मजबूरन निजी क्लीनिकों में लूटा जा रहा है।
जिम्मेदारी का अभाव: अस्पताल के वरीय अधिकारियों द्वारा इस गंभीर संकट पर चुप्पी साधे रखना उनकी उदासीनता को दर्शाता है।
मरीजों की बदहाली और परिजनों का आक्रोश
अस्पताल के गलियारों में मरीजों के परिजनों का गुस्सा साफ देखा जा सकता है। दूर-दराज के गांवों से आने वाले लोगों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वे महंगी जांच करा सकें। इमरजेंसी में आने वाले गंभीर मरीजों के लिए तो यह स्थिति जानलेवा साबित हो रही है। बिना रिपोर्ट के डॉक्टर इलाज शुरू नहीं कर पा रहे हैं, जिससे समय पर उपचार मिलने में बाधा आ रही है।
अधिकारियों का आश्वासन बनाम धरातल
जब इस संबंध में अस्पताल के उच्चाधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो हमेशा की तरह "जल्द ही समस्या सुलझा ली जाएगी" का रटा-रटाया जवाब मिला। हालांकि, धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। प्रशासन का कहना है कि मामला भुगतान से संबंधित है और प्रक्रिया जारी है, लेकिन इस प्रक्रिया की कीमत गरीब मरीज अपनी जेब खाली करके और अपनी सेहत के साथ समझौता करके चुका रहे हैं।
मायागंज अस्पताल में जांच सेवाओं का ठप होना स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्यप्रणाली का प्रमाण है। यदि समय रहते इस निजी एजेंसी पर कार्रवाई नहीं की गई या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, तो अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या में गिरावट आएगी और अव्यवस्था का यह दौर और लंबा खिंच सकता है। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले में कोई ठोस कदम उठाता है या मरीज इसी तरह भगवान भरोसे रहने को मजबूर रहेंगे।