लखीसराय, भागलपुर और कटिहार समेत 6 जिलों में वित्तीय अनियमितता पर विभाग अलर्ट
पटना/बिहार: बिहार में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए महालेखाकार (AG - Accountant General) ने कड़ा रुख अपनाया है। हाल ही में राज्य के छह प्रमुख जिलों में 'जिला औद्योगिक नवप्रवर्तन योजना' के तहत प्रस्तुत किए गए खर्चों के विवरण और 'कच्चे बिल' (Raw Bills) को लेकर एजी ने गंभीर आपत्ति जताई है। इस मामले ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है, जिसके बाद संबंधित जिलों के अधिकारियों को जवाब-तलब किया गया है।
क्या है पूरा मामला?
'जिला औद्योगिक नवप्रवर्तन योजना' के तहत किसानों से उत्पाद (जैसे टमाटर आदि) की खरीदारी और प्रसंस्करण इकाइयों को दी गई राशि का हिसाब-किताब महालेखाकार द्वारा ऑडिट किया जा रहा था। ऑडिट के दौरान यह पाया गया कि कई जिलों में सरकारी धन का उपयोग तो किया गया, लेकिन उसके बदले में जो बिल प्रस्तुत किए गए, वे वैध नहीं थे। एजी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि जिन खर्चों के लिए 'कच्चे बिल' या अनधिकृत रसीदें दी गई हैं, उन्हें सरकारी नियमों के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता।
किन जिलों पर सवाल?
महालेखाकार की आपत्ति के दायरे में मुख्य रूप से लखीसराय, खगड़िया, भागलपुर, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जैसे जिले शामिल हैं। इन जिलों के संबंधित अधिकारियों ने योजना के तहत आवंटित राशि के खर्च का जो ब्यौरा दिया, उसमें पारदर्शिता का अभाव था।
अररिया: यहां भुगतान की प्रक्रिया ही विधिवत नहीं पाई गई, जिसके कारण एजी ने आपत्ति दर्ज की है।
पूर्णिया: यहां केवाईसी (KYC) संबंधी समस्याओं का हवाला देकर निकासी में देरी की गई है।
अन्य जिले: सहरसा, सुपौल और बांका जैसे जिलों में भी खर्च की गई बड़ी राशि के संबंध में अधिकारियों ने स्पष्ट जवाब देने के बजाय मोहलत मांग ली है।
विभाग की प्रतिक्रिया और निर्देश
इस वित्तीय अनियमितता को गंभीरता से लेते हुए योजना के निदेशक ने संबंधित जिला उप विकास आयुक्तों (DDC) को तत्काल प्रभाव से जवाब देने का निर्देश दिया है। निदेशक ने स्पष्ट कहा है कि सरकारी राशि का सही उपयोग और वैध बिल के साथ समायोजन अनिवार्य है। जिन जिलों ने गोलमोल जवाब दिए हैं, उन्हें एक सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है।
कार्रवाई की तलवार
एजी की आपत्ति के बाद संबंधित जिलों में हलचल तेज हो गई है। मधेपुरा जैसे कुछ जिलों में, जहां वेंडर का पता नहीं चल पा रहा है, वहां विभाग ने रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर दी है। एक इकाई पर तो नीलाम वाद (Certificate Case) भी दायर किया गया है। विभाग ने चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय के भीतर वैध बिल और दस्तावेजों के साथ हिसाब-किताब प्रस्तुत नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता के दावों पर सवालिया निशान लगाती है। 'कच्चे बिल' के जरिए सरकारी धन की बंदरबांट की कोशिशों पर एजी की यह रिपोर्ट एक बड़ा सबक है। अब देखना यह है कि राज्य के ये जिले समय सीमा के भीतर अपनी जवाबदेही कैसे पूरी करते हैं।