मायागंज अस्पताल में 'प्रमोशन विवाद' ने पकड़ा तूल, ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. अजय प्रताप की नियुक्ति पर उठे सवाल

भागलपुर: जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (मायागंज अस्पताल) में इन दिनों प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर घमासान मचा हुआ है। अस्पताल के ब्लड बैंक के प्रभारी के रूप में डॉ. अजय प्रताप की नियुक्ति और महज चार महीने के भीतर उन्हें मिले प्रमोशन ने विवाद को जन्म दे दिया है। अस्पताल के कई वरिष्ठ चिकित्सक और कर्मचारी इस नियुक्ति को नियमों के विरुद्ध मान रहे हैं, जिससे चिकित्सा जगत में चर्चाओं का बाजार गर्म है।

क्या है विवाद की जड़?

विवाद की मुख्य वजह यह है कि डॉ. अजय प्रताप, जो वर्तमान में ब्लड बैंक का प्रभार संभाल रहे हैं, उन्हें केवल चार महीने के भीतर पदोन्नति (प्रमोशन) दे दी गई। अन्य चिकित्सकों का आरोप है कि डॉ. अजय एक कनिष्ठ चिकित्सा अधिकारी (Junior Medical Officer) हैं और उनसे वरीयता सूची में कई अन्य अनुभवी डॉक्टर मौजूद हैं। असंतुष्ट डॉक्टरों का कहना है कि उनकी वरिष्ठता को दरकिनार कर यह नियुक्ति और प्रमोशन पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण है।

वरिष्ठ डॉक्टरों का तर्क है कि अस्पताल के प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति के लिए एक निश्चित प्रक्रिया और अनुभव का पैमाना तय होता है, जिसे इस मामले में नजरअंदाज किया गया है।

अधीक्षक का बचाव: 'सब कुछ नियमों के अनुरूप'

दूसरी ओर, अस्पताल के अधीक्षक ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि डॉ. अजय प्रताप को दी गई जिम्मेदारी और उसके बाद मिला प्रमोशन पूरी तरह से विभागीय नियमों और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के अनुरूप है।

अधीक्षक के अनुसार, "नियुक्ति के समय योग्यता और कार्यकुशलता को प्राथमिकता दी गई है। किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया गया है। अस्पताल की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर लिए गए निर्णय को अनावश्यक रूप से विवाद का मुद्दा बनाया जा रहा है।" उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी को इस पर आपत्ति है, तो वे आधिकारिक माध्यम से अपनी बात रख सकते हैं।

मामला पहुंचा स्वास्थ्य विभाग के गलियारों तक

यह विवाद अब केवल अस्पताल परिसर तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसकी गूंज पटना स्थित राज्य स्वास्थ्य विभाग के गलियारों में भी सुनाई देने लगी है। बताया जा रहा है कि असंतुष्ट चिकित्सकों के एक समूह ने इस मामले की विस्तृत शिकायत स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों और स्वास्थ्य निदेशालय को भेजी है। उन्होंने मांग की है कि इस पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

अस्पताल की कार्यप्रणाली पर असर

मायागंज अस्पताल, जो पूरे भागलपुर और आसपास के जिलों के लिए स्वास्थ्य की रीढ़ है, में इस तरह का आंतरिक विवाद सीधे तौर पर अस्पताल की सेवाओं को प्रभावित कर सकता है। नाम न छापने की शर्त पर एक स्वास्थ्यकर्मी ने बताया कि इस विवाद के कारण प्रशासनिक निर्णयों में देरी हो रही है और कर्मचारियों के बीच गुटबाजी जैसी स्थिति पैदा हो गई है, जिसका सीधा असर मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ सकता है।

भविष्य की संभावनाएं

फिलहाल, स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इस मामले ने अस्पताल प्रशासन की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब सभी की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या स्वास्थ्य विभाग इस मामले की जांच के लिए कोई कमेटी गठित करेगा या मामला इसी तरह विवादों में बना रहेगा।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में प्रशासनिक नियुक्तियों की पारदर्शिता और वरिष्ठता बनाम योग्यता के पुराने बहस को जीवित कर दिया है।