स्नातक के साथ अब नौकरी का अनुभव भी, चार वर्षीय डिग्री में अनिवार्य होगी अप्रेंटिसशिप; छात्रों को मिलेगा ₹12,300 मासिक स्टाइपेंड
पटना। बिहार में उच्च शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। अब राज्य के विश्वविद्यालयों में चार वर्षीय स्नातक (यूजी) पाठ्यक्रम के साथ अंडरग्रेजुएट अप्रेंटिसशिप एंबेडेड डिग्री प्रोग्राम (Undergraduate Apprenticeship Embedded Degree Programme) लागू किया जाएगा। इस नई व्यवस्था के तहत छात्र-छात्राओं को केवल कक्षा में पढ़ाई तक सीमित नहीं रहना पड़ेगा, बल्कि उन्हें पढ़ाई के दौरान ही उद्योगों, कंपनियों और विभिन्न संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण (अप्रेंटिसशिप) का अवसर मिलेगा। सबसे खास बात यह है कि इस प्रशिक्षण अवधि में विद्यार्थियों को हर महीने 12,300 रुपये का स्टाइपेंड भी दिया जाएगा।
नई शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों को डिग्री के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव देना है ताकि वे पढ़ाई पूरी करते ही रोजगार के लिए पूरी तरह तैयार हो सकें। राज्य सरकार और राजभवन का मानना है कि यह कार्यक्रम युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कुशल मानव संसाधन तैयार करेगा।
अगले शैक्षणिक सत्र से होगी शुरुआत
राज्यपाल एवं विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति की सहमति के बाद इस योजना को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। शुरुआती चरण में राज्य के चार प्रमुख विश्वविद्यालयों में इसे लागू किया जाएगा। इनमें पटना विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय और बीआरए बिहार विश्वविद्यालय शामिल हैं।
राज्यपाल के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह ने बताया कि उच्च शिक्षा को रोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि छात्रों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं बल्कि उद्योगों में काम करने का व्यावहारिक अनुभव भी मिलेगा, जिससे उन्हें भविष्य में नौकरी पाने में काफी आसानी होगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर आधारित है योजना
यह नया कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप तैयार किया गया है। नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों को कौशल आधारित शिक्षा देने, उद्योगों से जोड़ने और रोजगारपरक पाठ्यक्रम विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया है।
इसी सोच के तहत चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में अप्रेंटिसशिप को शामिल किया गया है। इसके अनुसार पूरे पाठ्यक्रम का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा पारंपरिक शैक्षणिक अध्ययन का होगा, जबकि 25 प्रतिशत हिस्सा उद्योग आधारित प्रशिक्षण के लिए निर्धारित रहेगा।
तीसरे वर्ष में होगी अनिवार्य अप्रेंटिसशिप
नई व्यवस्था के अनुसार स्नातक के तीसरे वर्ष में विद्यार्थियों के लिए अप्रेंटिसशिप करना अनिवार्य होगा। इस दौरान छात्र-छात्राएं विभिन्न उद्योगों, निजी कंपनियों, सरकारी संस्थानों, स्टार्टअप्स और अन्य संगठनों में जाकर कार्य करेंगे।
इस प्रशिक्षण के दौरान उन्हें वास्तविक कार्य वातावरण में काम करने का अवसर मिलेगा। इससे वे अपने विषय से संबंधित तकनीकी और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करेंगे तथा भविष्य में नौकरी के लिए आवश्यक कौशल विकसित कर सकेंगे।
हर महीने मिलेगा ₹12,300 का स्टाइपेंड
इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अप्रेंटिसशिप करने वाले विद्यार्थियों को प्रति माह 12,300 रुपये का स्टाइपेंड दिया जाएगा। इससे छात्रों को आर्थिक सहायता भी मिलेगी और वे पढ़ाई के साथ-साथ अपनी आवश्यकताओं का कुछ खर्च स्वयं उठा सकेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्टाइपेंड मिलने से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों को भी अप्रेंटिसशिप करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और वे बिना किसी वित्तीय दबाव के प्रशिक्षण पूरा कर सकेंगे।
डिग्री में जुड़ेगा अप्रेंटिसशिप का मूल्यांकन
नई व्यवस्था में केवल प्रशिक्षण कर लेना ही पर्याप्त नहीं होगा। विद्यार्थियों के अप्रेंटिसशिप कार्य का मूल्यांकन भी किया जाएगा।
प्रशिक्षण के दौरान उनके प्रदर्शन, कार्यशैली, अनुशासन, तकनीकी दक्षता और सीखने की क्षमता के आधार पर अंक दिए जाएंगे। ये अंक अंतिम डिग्री में शामिल होंगे। इससे विद्यार्थी अप्रेंटिसशिप को गंभीरता से करेंगे और प्रशिक्षण की गुणवत्ता भी बेहतर होगी।
उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप तैयार होंगे छात्र
आज के समय में अधिकांश कंपनियां ऐसे उम्मीदवारों की तलाश करती हैं जिनके पास डिग्री के साथ व्यावहारिक अनुभव भी हो। अक्सर देखा जाता है कि कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों को इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली की जानकारी नहीं होती, जिसके कारण उन्हें नौकरी मिलने में कठिनाई होती है।
नई व्यवस्था इस समस्या का समाधान करेगी। छात्र पढ़ाई के दौरान ही उद्योगों में काम करेंगे और वास्तविक परियोजनाओं पर अनुभव प्राप्त करेंगे। इससे उनके भीतर तकनीकी दक्षता, संचार कौशल, टीमवर्क और नेतृत्व क्षमता का विकास होगा।
रोजगार के अवसर बढ़ेंगे
विशेषज्ञों का कहना है कि अप्रेंटिसशिप करने वाले छात्रों को नौकरी मिलने की संभावना सामान्य छात्रों की तुलना में अधिक रहती है। कई कंपनियां प्रशिक्षण के दौरान अच्छा प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सीधे नौकरी का प्रस्ताव भी देती हैं।
इस योजना के लागू होने से बिहार के लाखों विद्यार्थियों को रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकेंगे। साथ ही राज्य के उद्योगों को भी प्रशिक्षित और कुशल युवा उपलब्ध होंगे।
सरकार की बड़ी पहल
राज्य सरकार का मानना है कि केवल डिग्री देने से रोजगार की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में ऐसा बदलाव किया जा रहा है जिससे छात्र पढ़ाई के साथ-साथ कार्य अनुभव भी प्राप्त कर सकें।
उच्च शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन इस योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए उद्योगों, कंपनियों और विभिन्न संस्थानों के साथ समन्वय स्थापित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। आने वाले समय में विभिन्न क्षेत्रों की कंपनियों के साथ समझौते (एमओयू) भी किए जा सकते हैं ताकि विद्यार्थियों को पर्याप्त अप्रेंटिसशिप अवसर मिल सकें।
मुख्यमंत्री ने भी की सराहना
उच्च शिक्षा से संबंधित बैठक में इस कार्यक्रम की जानकारी प्रस्तुत की गई, जिसकी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी सराहना की। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि नई व्यवस्था से बिहार के युवाओं को आधुनिक उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किया जा सकेगा।
छात्रों के लिए क्यों है फायदेमंद?
इस कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को कई महत्वपूर्ण लाभ मिलेंगे—
- स्नातक के साथ व्यावहारिक कार्य अनुभव।
- हर महीने ₹12,300 का स्टाइपेंड।
- उद्योगों और कंपनियों में काम करने का अवसर।
- डिग्री के साथ रोजगार के लिए बेहतर तैयारी।
- प्रशिक्षण के अंक डिग्री में शामिल होंगे।
- आत्मविश्वास और पेशेवर कौशल का विकास।
- नौकरी मिलने की संभावना में वृद्धि।
- उद्योग और शिक्षा के बीच बेहतर समन्वय।
बिहार की उच्च शिक्षा में नया अध्याय
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है तो बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। अब छात्र केवल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पढ़ाई के दौरान ही अपने करियर की मजबूत नींव रख सकेंगे।
यह पहल न केवल विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता और व्यावहारिक अनुभव देगी, बल्कि राज्य में कौशल आधारित शिक्षा को भी नई दिशा प्रदान करेगी। आने वाले वर्षों में यह मॉडल अन्य विश्वविद्यालयों और राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। बिहार सरकार की यह पहल युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने, उद्योगों की जरूरतों को पूरा करने और शिक्षा को रोजगार से सीधे जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।