मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में अंतर्राष्ट्रीय डिजीज ऑफ कोडिंग पर विशेष कार्यशाला आयोजित, स्वास्थ्य आंकड़ों में सुधार पर जोर
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले स्थित श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल (SKMCH) में अंतर्राष्ट्रीय डिजीज ऑफ कोडिंग (International Disease of Coding) को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। चिकित्सा क्षेत्र में आ रहे आधुनिकीकरण और डेटा प्रबंधन की महत्ता को ध्यान में रखते हुए आयोजित इस कार्यशाला में स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, सटीक और व्यवस्थित बनाने पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम के दौरान चिकित्सा जगत के कई प्रबुद्ध चिकित्सक और स्वास्थ्य कर्मी उपस्थित रहे।
बीमारी के पर्चों पर कोड लिखना अनिवार्य: डॉ. रंजीत कुमार
कार्यशाला को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता डॉ. रंजीत कुमार ने इस बात पर विशेष बल दिया कि अब समय आ गया है कि अस्पतालों में डॉक्टरों द्वारा मरीजों की बीमारी के पर्चों पर रोगों के निर्धारित कोड लिखे जाएं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पर्चे पर केवल बीमारी का नाम लिखने के बजाय उसका अंतर्राष्ट्रीय कोडिंग करना चिकित्सीय कार्यप्रणाली का एक अनिवार्य हिस्सा बनना चाहिए। इससे न केवल पर्चे की पठनीयता और स्पष्टता बढ़ती है, बल्कि विभिन्न बीमारियों के वर्गीकरण में भी एकरूपता आती है।
स्वास्थ्य आंकड़ों (Health Data) में होगा सुधार
डॉ. रंजीत कुमार ने कार्यशाला के दौरान रेखांकित किया कि अंतर्राष्ट्रीय डिजीज ऑफ कोडिंग प्रणाली को अपनाने से हमारे देश और राज्य के स्वास्थ्य आंकड़ों में अभूतपूर्व सुधार देखने को मिलेगा। वर्तमान समय में कई बार मैनुअल प्रविष्टि (Manual Entry) या अस्पष्ट लिखावट के कारण डेटा में त्रुटियां रह जाती हैं, जिससे सही बीमारी का आकलन करना कठिन हो जाता है। जब हर बीमारी का एक निश्चित और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत कोड दर्ज किया जाएगा, तो अस्पतालों के पास मरीजों का एक सटीक और डिजिटल डेटाबेस तैयार होगा, जिसका उपयोग भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों को तय करने में किया जा सकेगा।
रोगों की रोकथाम और अनुसंधान में मिलेगी मदद
कोडिंग प्रणाली लागू होने से न केवल डेटा प्रबंधन सुगम होगा, बल्कि यह भविष्य में विभिन्न संक्रामक और गंभीर रोगों की रोकथाम (Prevention of Diseases) के लिए ठोस रणनीति बनाने में भी मददगार साबित होगी। जब स्वास्थ्य विभाग के पास ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर बीमारियों के सही और स्पष्ट आंकड़े उपलब्ध होंगे, तो महामारी या किसी विशेष बीमारी के प्रकोप को समय रहते नियंत्रित किया जा सकेगा। इसके अलावा, मेडिकल रिसर्च और क्लीनिकल ट्रायल के क्षेत्र में काम कर रहे शोधकर्ताओं के लिए भी यह मानकीकृत डेटा अत्यधिक लाभकारी और विश्वसनीय होगा।