भागलपुर में गूंजेगी 'संपूर्ण क्रांति' की हुंकार! गांधी शांति प्रतिष्ठान में आज मनेगा 'आपातकाल दिवस'; याद किए जाएंगे लोकतंत्र के वो 21 काले महीने

 भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे काले और दमनकारी अध्याय 'आपातकाल' (Emergency 1975) की बरसी पर सिल्क सिटी भागलपुर में एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। शहर के हृदय स्थली में स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र (Gandhi Peace Foundation) में आज यानी 25 जून को 'आपातकाल दिवस' (काला दिवस) के रूप में मनाया जाएगा।

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में लगाए गए आपातकाल और उसके खिलाफ उठी 'संपूर्ण क्रांति' (Total Revolution) की चिंगारी को याद करने के लिए यह दिन बेहद महत्वपूर्ण है। संपूर्ण क्रांति आंदोलनकारी मंच और गांधी शांति प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम को लेकर शहर के प्रबुद्धजीवियों, जेपी सेनानियों (JP Freedom Fighters) और नई पीढ़ी के युवाओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है।

इस ऐतिहासिक दिन के महत्व, कार्यक्रम की रूपरेखा और भागलपुर के 'संजय कुमार' द्वारा दी गई विस्तृत जानकारी के आधार पर तैयार इनसाइड रिपोर्ट नीचे दी गई है।

 25 जून 1975: वह तारीख जिसने भारतीय लोकतंत्र को झकझोर दिया

कार्यक्रम की तैयारियों को लेकर जानकारी देते हुए 'संपूर्ण क्रांति आंदोलनकारी मंच' के वरिष्ठ सदस्य और प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता संजय कुमार ने बताया कि 25 जून की रात भारतीय इतिहास की सबसे लंबी और अंधेरी रातों में से एक थी।

आपातकाल की घोषणा: इसी दिन आधी रात को देश में आंतरिक अशांति के नाम पर 'आपातकाल' लागू कर दिया गया था। नागरिकों के मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) छीन लिए गए थे।

भागलपुर का ऐतिहासिक कनेक्शन: जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) ने इस तानाशाही के खिलाफ 'संपूर्ण क्रांति' का शंखनाद किया था, तो भागलपुर और पूरे अंग प्रदेश के युवाओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों ने जेल जाने की परवाह किए बिना इस आंदोलन में खुद को झोंक दिया था। भागलपुर की जेलें उस वक्त जेपी सेनानियों से भर गई थीं।

गांधी शांति प्रतिष्ठान में क्या होगा खास? कार्यक्रम का खाका

संजय कुमार के अनुसार, हर साल की तरह इस साल भी इस दिवस को पूरी गंभीरता और वैचारिक मंथन के साथ मनाया जा रहा है। कार्यक्रम को मुख्य रूप से तीन सत्रों में विभाजित किया गया है:

जेपी सेनानियों का सम्मान : इस संगोष्ठी (Seminar) में भागलपुर और आस-पास के जिलों के उन बुजुर्ग आंदोलनकारियों को आमंत्रित किया गया है, जिन्होंने 1975 में लोकतंत्र की रक्षा के लिए लाठियां खाई थीं और महीनों जेल में बिताए थे। उन्हें सम्मानित कर उनके अनुभवों को रिकॉर्ड किया जाएगा।

'लोकतंत्र की चुनौतियां' विषय पर सेमिनार: देश के जाने-माने इतिहासकार, वरिष्ठ पत्रकार और विचारक इस बात पर चर्चा करेंगे कि आज के दौर में लोकतंत्र कितना सुरक्षित है और 1975 की गलतियों से हमें क्या सीख लेनी चाहिए।

युवा संवाद (Youth Interface) : आज की सोशल मीडिया और डिजिटल पीढ़ी को यह बताना बेहद जरूरी है कि जिस 'अभिव्यक्ति की आजादी' (Freedom of Speech) का वे इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे बचाने के लिए उनके बुजुर्गों ने कितनी बड़ी कुर्बानी दी थी।

 "जब प्रेस पर लगा पहरा और जेल बने नेताओं के घर"—संजय कुमार की जुबानी

आंदोलनकारी मंच के नेताओं और संजय कुमार ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को यह जानना आवश्यक है कि आपातकाल के दौरान देश की क्या स्थिति थी। उन्होंने कुछ प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया:

सेंसरशिप का दौर: अखबारों को छापने से पहले सरकारी अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती थी। जो सरकार के खिलाफ लिखता, उसकी बिजली काट दी जाती थी या प्रेस को सील कर दिया जाता था।

नेताओं की सामूहिक गिरफ्तारी: जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस और लालू प्रसाद यादव समेत देश के हजारों विपक्षी नेताओं को बिना किसी वारंट के जेल में डाल दिया गया था।

भागलपुर की भूमिका: भागलपुर के स्थानीय नेताओं और छात्रों ने भूमिगत (Underground) होकर पर्चे छपवाए और जनता के बीच बांटे ताकि आंदोलन की आग ठंडी न पड़े।

 आपातकाल का काला इतिहास: एक नजर में

कालखंड / घटनामुख्य प्रभाव (Major Impact)लोकतंत्र पर असर
अवधि (Duration)25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 (21 महीने)देश में पूरी तरह से तानाशाही व्यवस्था लागू रही।
नागरिक अधिकारअनुच्छेद 21 (Right to Life) समेत सभी मौलिक अधिकार निलंबित।पुलिस को किसी को भी बिना कारण हिरासत में लेने की छूट मिली (MISA एक्ट)।
प्रतिरोध (Resistance)जेपी के नेतृत्व में 'संपूर्ण क्रांति' का नारा बुलंद हुआ।देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी) के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

 आज के संदर्भ में क्यों प्रासंगिक है यह आयोजन?

गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र में आयोजित हो रहे इस 'आपातकाल दिवस' का मकसद केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि वर्तमान को सचेत करना भी है।

आयोजकों का मुख्य संदेश:

“सच्चा लोकतंत्र वही है जहां असहमति के स्वर (Voices of Dissent) का सम्मान हो। भागलपुर का गांधी शांति प्रतिष्ठान हमेशा से वैचारिक स्वतंत्रता का केंद्र रहा है। इस कार्यक्रम के जरिए हम समाज को यह याद दिलाना चाहते हैं कि सजग नागरिक ही लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी होते हैं। अगर जनता सो जाएगी, तो तानाशाही किसी भी रूप में वापस आ सकती है।”

भागलपुर के गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित होने वाला यह 'आपातकाल दिवस' महज एक रस्मी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े नागरिक प्रतिरोध की महागाथा है। संजय कुमार और संपूर्ण क्रांति आंदोलनकारी मंच का यह साझा प्रयास सराहनीय है, क्योंकि यह आयोजन इतिहास की उन गलतियों की याद दिलाता है जिन्हें कभी दोहराया नहीं जाना चाहिए। भागलपुर की धरती से उठने वाला यह वैचारिक संदेश पूरे बिहार और देश के युवाओं को लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति और अधिक जागरूक और जिम्मेदार बनाएगा।