अकबरनगर नगर पंचायत में स्वच्छता अभियान की 'पोल', कचरा प्रबंधन के लिए रखे डब्बे खुद बने बीमारी का घर
अकबरनगर: केंद्र और राज्य सरकार के 'स्वच्छ भारत मिशन' के तहत नगर पंचायतों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने और कचरा प्रबंधन को दुरुस्त करने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन, अकबरनगर नगर पंचायत का जमीनी हाल इन दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है। आलम यह है कि शहर की सड़कों के किनारे कचरा उठाने के लिए लगाए गए कूड़ेदान (डस्टबिन) खुद गंदगी और संक्रमण के बड़े स्रोत बन चुके हैं।
स्वच्छता की जगह उपेक्षा का मंजर
अकबरनगर नगर पंचायत के विभिन्न मोहल्लों और मुख्य बाजारों में कूड़ेदान तो रख दिए गए हैं, लेकिन इनका रखरखाव भगवान भरोसे है। डस्टबिन की हालत यह है कि वे कचरे से पूरी तरह भर चुके हैं और उनके आसपास फैली दुर्गंध से राहगीरों का निकलना मुश्किल हो गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि डब्बे लगाने का उद्देश्य तो पूरा नहीं हुआ, बल्कि इनके कारण गंदगी का दायरा जरूर बढ़ गया है।
डब्बे के चारों ओर कचरा बिखरा रहता है, जो आवारा पशुओं के लिए दावत का केंद्र बन गया है। इससे न केवल शहर की सुंदरता पर ग्रहण लगा है, बल्कि मानसून के समय में यह स्थिति महामारी को बुलावा देने वाली है।
नियमित निगरानी का अभाव
इस बदहाली का सबसे बड़ा कारण नगर पंचायत प्रशासन की ओर से 'नियमित निगरानी' (Regular Monitoring) का अभाव है। सूत्रों के अनुसार, कचरा उठाने वाली गाड़ियों की आवाजाही का कोई तय समय या रूट चार्ट नहीं है। कई दिनों तक जब कचरा नहीं उठाया जाता, तो डस्टबिन ओवरफ्लो करने लगते हैं।
नागरिकों का आरोप है कि नगर पंचायत के सफाई कर्मचारी या तो आते नहीं हैं, या आते भी हैं तो केवल कागजी कोरम पूरा कर चले जाते हैं। कचरा प्रबंधन की इस लचर व्यवस्था के कारण पूरे इलाके में मच्छरों और मक्खियों की भरमार हो गई है, जिससे स्थानीय लोग बीमारियों के साये में जीने को मजबूर हैं।
प्रशासन का उदासीन रवैया
अकबरनगर के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कई बार इस समस्या को लेकर नगर पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि स्वच्छता सर्वेक्षण में बेहतर रैंकिंग लाने के लिए सिर्फ पोस्टर-बैनर लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर सफाई की व्यवस्था को सुदृढ़ करना होगा।
स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि वह हर वार्ड में कचरा उठाने के लिए एक निश्चित समय-सारणी निर्धारित करे और डस्टबिन के पास कचरे को जमा होने से रोकने के लिए नियमित निगरानी टीम तैनात करे। 'ड्राई वेस्ट' और 'वेट वेस्ट' को अलग-अलग करने के लिए भी लोगों को जागरूक करने की सख्त आवश्यकता है, जिसके लिए नगर पंचायत अभी तक कोई ठोस अभियान शुरू नहीं कर पाई है।
स्वच्छता ही सेवा का सपना कब होगा साकार?
अकबरनगर की जनता अब प्रशासन से यह सवाल पूछ रही है कि आखिर कब तक उन्हें इस बदबू और गंदगी के बीच रहना पड़ेगा? अगर समय रहते स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो यह छोटी सी लापरवाही एक बड़ी जनस्वास्थ्य समस्या में तब्दील हो सकती है। नगर पंचायत प्रतिनिधियों को अब राजनीतिक वादों से ऊपर उठकर शहर की स्वच्छता की जिम्मेदारी गंभीरता से लेनी होगी।