पौधरोपण का कड़वा सच: कागजी आंकड़ों से आगे धरातल की हकीकत; पूर्णिया में बीच संग्रहण से लेकर पौधों की रखवाली तक हर कदम पर चुनौती, आखिर कहाँ जाता है लाखों का बजट?
पूर्णिया (बिहार): पर्यावरण संरक्षण, ग्लोबल वार्मिंग से बचाव और धरती को हरा-भरा बनाने के लिए हर साल देश भर में बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाए जाते हैं। सरकारें और विभिन्न विभाग हर साल लाखों-करोड़ों पौधे लगाने का दावा करते हैं, लेकिन क्या कभी हमने यह जानने की कोशिश की है कि इनमें से कितने पौधे वास्तव में पेड़ बन पाते हैं? 'हिुस्तान' की विशेष पड़ताल और अभियान 'पौधरोपण का सच' के तहत पूर्णिया से सामने आई जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।
पूर्णिया के संवाददाता की रिपोर्ट के मुताबिक, नर्सरी में बीज संग्रहण से लेकर अंतिम चरण में पौधे लगाने और फिर उनकी उचित देखरेख तक हर कदम पर केवल खर्च ही खर्च है, लेकिन उससे भी कहीं अधिक अहम और कठिन चुनौती उनकी रखवाली (Maintenance and Protection) करना है। अमूमन अभियान के शुरुआती दिनों में जितनी धूमधाम से पौधे रोपे जाते हैं, कुछ ही महीनों बाद वे प्रशासनिक और विभागीय उदासीनता की भेंट चढ़ जाते हैं। आइए जानते हैं पूर्णिया के इस विशेष अभियान 'पौधरोपण का सच' के जरिए पौधों के जन्म से लेकर उनके पेड़ बनने तक के सफर की पूरी दास्तान, वित्तीय प्रबंधन की सच्चाइयों और संरक्षण में आ रही बाधाओं का विस्तृत विश्लेषण।
अभियान की शुरुआत: बीज संग्रहण से नर्सरी तक का खर्चीला सफर
पौधरोपण की पूरी प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होती जितनी कागजों पर दिखाई देती है। एक हरा-भरा पौधा तैयार होने से पहले कई कठिन चरणों से गुजरता है।
गुणवत्तापूर्ण बीज संग्रहण की चुनौती: सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण होता है जंगलों या सुरक्षित पेड़ों से उच्च कोटि के बीजों का संग्रहण (Seed Collection)। इसके लिए कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है, जो सही समय पर सही बीज चुन सकें।
नर्सरी में रखरखाव और खाद-पानी: बीज मिलने के बाद उन्हें नर्सरी में वैज्ञानिक तरीकों से बोया जाता है। मिट्टी तैयार करना, खाद डालना, समय पर सिंचाई करना और कीटों से बचाने के लिए कीटनाशकों का छिड़काव करना—इन सभी प्रक्रियाओं में भारी बजट खर्च होता है। महीनों की मेहनत के बाद जब पौधे रोपने लायक तैयार होते हैं, तब जाकर वे धरातल पर उतरने के योग्य बनते हैं।
पौधरोपण का मुख्य चरण: परिवहन और श्रम लागत
नर्सरी से पौधों को निकालकर उन्हें लक्षित स्थलों (सड़कों के किनारे, सरकारी परिसरों, जंगलों या पंचायत क्षेत्रों) तक पहुंचाना अपने आप में एक बड़ा लॉजिस्टिक टास्क है।
परिवहन और ढुलाई का खर्च: पौधों को बिना नुकसान पहुँचाए सुरक्षित रूप से ट्रांसपोर्ट करना खर्चीला होता है। इसके साथ ही गड्ढे खुदवाना, श्रमिकों (Labour) की मजदूरी और पौधे लगाने के दौरान होने वाले खर्च इस अभियान के वित्तीय आंकड़े को काफी बढ़ा देते हैं।
लक्ष्य प्राप्ति का दबाव: वन विभाग और अन्य संबंधित विभागों पर हर साल लाखों पौधे लगाने का टार्गेट होता है। इस दबाव के कारण कई बार जल्दबाजी में पौधे तो रोप दिए जाते हैं, लेकिन उनकी भौगोलिक अनुकूलता (Geographical Suitability) का पूरा ध्यान नहीं रखा जाता।
सबसे बड़ी चुनौती: पौधों की रखवाली और संरक्षण (Maintenance)
विशेषज्ञों और ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, पौधे लगा देना केवल 30 प्रतिशत काम है, असली चुनौती बाकी के 70 प्रतिशत काम यानी उनकी रखवाली और संरक्षण में निहित है।
ट्री गार्ड और पानी की कमी: पूर्णिया जैसे इलाकों में गर्मियों और अन्य महीनों में पौधों को नियमित रूप से पानी देना बहुत जरूरी होता है। बजट के अभाव में या मॉनिटरिंग की कमी के कारण कई पौधे पानी न मिलने से सूख जाते हैं। इसके अलावा, आवारा पशुओं (गाय, बकरी आदि) द्वारा पौधों को खा जाना सबसे बड़ा खतरा है। बिना मजबूत ट्री गार्ड या फेंसिंग के पौधे कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाते हैं।
जिम्मेदारी का अभाव: विभाग पौधे लगाकर अपनी इतिश्री मान लेते हैं, लेकिन उनकी देखरेख के लिए जमीनी स्तर पर कोई जवाबदेही तय नहीं होती। यही कारण है कि रोपे गए 100 पौधों में से बमुश्किल 20 से 30 पौधे ही जीवित बच पाते हैं, बाकी कागजों पर ही दम तोड़ देते हैं।
कागजी आंकड़े बनाम धरातल की हकीकत
पूर्णिया में चलाए जा रहे इस अभियान के तहत यह बात खुलकर सामने आई है कि वित्तीय वर्ष के अंत में बजट खपाने के लिए बड़े पैमाने पर पौधरोपण तो कर दिए जाते हैं, लेकिन उनके सर्वाइवल रेट (Survival Rate - जीवित रहने का प्रतिशत) की मॉनिटरिंग बेहद कमजोर है।
फंड का सही उपयोग या औपचारिकता: पर्यावरण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, यदि इसका सही सदुपयोग हो और पौधों की जियो-टैगिंग (Geo-tagging) व नियमित देखभाल सुनिश्चित की जाए, तो पूर्णिया और आसपास के जिलों की आबोहवा में काफी सुधार हो सकता है।
जन-भागीदारी की कमी: जब तक स्थानीय नागरिकों, स्कूलों और पंचायतों को इस अभियान से सीधे तौर पर नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक केवल सरकारी प्रयासों से शत-प्रतिशत सफलता मिलना असंभव है।
'हिन्दुस्तान' के इस विशेष अभियान 'पौधरोपण का सच' ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पूर्णिया में पौधे लगाना जितना आसान दिखता है, उन्हें जीवित रखना उतना ही बड़ा संघर्ष है। बीज संग्रहण से लेकर नर्सरी की देखरेख, ट्रांसपोर्टेशन और रोपण तक जहाँ भारी खर्च शामिल है, वहीं उनकी उचित रखवाली के बिना यह सारा निवेश व्यर्थ साबित हो रहा है। जरूरत इस बात की है कि विभाग केवल पौधे लगाने के कागजी आंकड़ों पर ध्यान न दे, बल्कि उनके संरक्षण के लिए मजबूत कार्ययोजना बनाए, तभी इस अभियान का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकेगा और हमारी धरती हरी-भरी बन सकेगी।