आरक्षण विवाद में लखेंद्र पासवान की एंट्री, चिराग और मांझी को दी नसीहत; बोले- परिवार से बाहर निकलकर समाज के लोगों को दें मौका
पटना। बिहार की राजनीति में आरक्षण के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के दो प्रमुख नेताओं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बीच जारी बयानबाजी अब थमती नजर नहीं आ रही है। दोनों नेताओं के बीच आरक्षण और दलित समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार राजनीतिक बहस देखने को मिल रही है। इसी बीच अब बिहार सरकार के मंत्री और भाजपा विधायक लखेंद्र पासवान ने इस विवाद में अपनी प्रतिक्रिया देकर राजनीतिक चर्चा को और गरमा दिया है।
लखेंद्र पासवान ने दोनों नेताओं को परिवार की राजनीति से बाहर निकलकर अपने समाज के अन्य लोगों को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों NDA के महत्वपूर्ण नेता हैं और उनके ऊपर अपने समाज को व्यापक राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की जिम्मेदारी भी है।
सोमवार को पटना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान लखेंद्र पासवान ने आरक्षण के मुद्दे पर भी स्पष्ट बयान दिया। उन्होंने दावा किया कि जब तक नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, तब तक आरक्षण की समीक्षा या उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ की बात ही नहीं उठती। उन्होंने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि इसे किसी की कृपा या खैरात के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
चिराग और मांझी के बीच बयानबाजी जारी
आरक्षण के मुद्दे पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच पिछले कुछ समय से राजनीतिक बयानबाजी जारी है। दोनों नेता अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण के साथ आरक्षण और दलित समाज के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं।
NDA के दोनों नेताओं के बीच इस बहस को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा है। गठबंधन में रहते हुए नेताओं के बीच इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
इसी बीच लखेंद्र पासवान ने दोनों नेताओं से संयम बरतने और समाज के व्यापक हित में काम करने की अपील की। उन्होंने कहा कि दोनों नेता बड़े राजनीतिक पदों पर हैं और उनके बयान का प्रभाव उनके समाज के साथ-साथ व्यापक राजनीतिक वातावरण पर भी पड़ता है।
'परिवार के दायरे से बाहर निकलने की जरूरत'
लखेंद्र पासवान ने कहा कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को अपने परिवार के दायरे से बाहर निकलकर समाज के दूसरे लोगों को भी राजनीतिक अवसर देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राजनीति में किसी एक परिवार तक अवसर सीमित नहीं रहना चाहिए। समाज के अन्य सक्षम और योग्य लोगों को भी संगठन और चुनावी राजनीति में आगे आने का अवसर मिलना चाहिए।
मंत्री ने दोनों नेताओं से सवाल किया कि उन्होंने अपने परिवार के अलावा अपने समाज के कितने लोगों को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाया है।
उनके इस बयान को बिहार की राजनीति में परिवारवाद और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा जा रहा है।
'अपने समाज के कितने लोगों को मौका दिया?'
लखेंद्र पासवान ने सवाल उठाया कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी अपने-अपने राजनीतिक दलों में अनुसूचित जाति समाज के कितने लोगों को आगे बढ़ने का अवसर दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यदि राजनीतिक दल सामाजिक न्याय और वंचित समाज की बात करते हैं तो उन्हें अपने संगठन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भी इसका उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि समाज में केवल कुछ लोगों का राजनीतिक रूप से मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को आगे लाने की जरूरत है जो अपने समाज की समस्याओं को बेहतर तरीके से समझते हों और उन्हें राजनीतिक मंच पर उठा सकें।
लखेंद्र पासवान ने इसी संदर्भ में दोनों नेताओं को व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की सलाह दी।
मांझी के परिवार का उदाहरण
लखेंद्र पासवान ने जीतन राम मांझी के परिवार का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके परिवार के कई सदस्य विधायक, विधान पार्षद या सांसद बन चुके हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि परिवार के कई लोगों को राजनीतिक अवसर मिल सकते हैं तो समाज के दूसरे लोगों को भी आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए।
मंत्री ने कहा कि राजनीति का उद्देश्य केवल परिवार को मजबूत करना नहीं होना चाहिए। समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के बीच से नए नेतृत्व को तैयार करना भी जरूरी है।
हालांकि, लखेंद्र पासवान की टिप्पणी का केंद्र किसी एक व्यक्ति पर व्यक्तिगत हमला करना नहीं, बल्कि राजनीतिक अवसरों के व्यापक वितरण का सवाल उठाना था।
मुसहर समाज को लेकर भी सवाल
लखेंद्र पासवान ने मुसहर समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीतिक नेतृत्व को समाज के वास्तविक हालात पर भी ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि समाज के एक बड़े हिस्से को आज भी शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसरों की जरूरत है तो उसके बीच से नए राजनीतिक नेतृत्व को आगे क्यों नहीं लाया जा रहा है।
उनका कहना था कि केवल राजनीतिक मंचों पर समाज के अधिकारों की चर्चा करने से बदलाव नहीं आएगा। समाज के अधिक से अधिक लोगों को संगठन, राजनीति और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना होगा।
आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताया
आरक्षण के मुद्दे पर लखेंद्र पासवान ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरक्षण संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि इसे किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की ओर से दी जाने वाली खैरात नहीं समझना चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि जब तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, तब तक आरक्षण की समीक्षा या उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
उनके इस बयान को आरक्षण को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि NDA सरकार के रहते आरक्षण व्यवस्था को लेकर समाज के लोगों को आशंकित होने की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि, आरक्षण से जुड़े किसी भी बड़े बदलाव का विषय संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा होता है और इस पर राजनीतिक बयानबाजी अक्सर व्यापक बहस को जन्म देती है।
'सिर्फ चर्चा करने से कुछ नहीं होगा'
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच जारी बयानबाजी पर प्रतिक्रिया देते हुए लखेंद्र पासवान ने कहा कि इस मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा चर्चा हो रही है।
उन्होंने कहा कि केवल बयान देने या बहस करने से किसी समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। यदि वास्तव में समाज के हितों की चिंता है तो राजनीतिक दलों और नेताओं को ठोस कदम उठाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि समाज के लोगों को राजनीतिक अवसर देना, संगठन में जिम्मेदारी देना और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
इस्तीफे की मांग को बताया फिजूल
लखेंद्र पासवान ने इस विवाद के दौरान सामने आई इस्तीफे की मांग को भी फिजूल बताया। उनका कहना था कि राजनीतिक मतभेदों और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा के बीच इस्तीफे की मांग करना समाधान नहीं है।
उन्होंने नेताओं से अपील की कि वे मुद्दों को राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तथा ऐसी बयानबाजी से बचें जिससे गठबंधन के भीतर अनावश्यक तनाव पैदा हो।
NDA में शामिल दलों और नेताओं के बीच अलग-अलग मुद्दों पर मतभेद सामने आते रहे हैं, लेकिन गठबंधन की एकजुटता बनाए रखना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
NDA के भीतर सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस
लखेंद्र पासवान के बयान के बाद NDA के भीतर सामाजिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व को लेकर बहस का एक नया पहलू सामने आया है।
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों अपने-अपने सामाजिक आधार और राजनीतिक प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में लखेंद्र पासवान का यह कहना कि दोनों नेताओं को अपने परिवार से बाहर निकलकर समाज के दूसरे लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए, सीधे तौर पर राजनीतिक नेतृत्व के विस्तार का मुद्दा उठाता है।
यह बहस केवल बिहार तक सीमित नहीं है। देश की राजनीति में लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि वंचित और पिछड़े समुदायों के भीतर से कितने नए नेता सामने आ रहे हैं और राजनीतिक दल उन्हें कितनी जिम्मेदारी दे रहे हैं।
आने वाले दिनों में बढ़ सकती है बयानबाजी
लखेंद्र पासवान के बयान के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की ओर से इस पर क्या प्रतिक्रिया आती है।
यदि दोनों नेताओं की ओर से पलटवार होता है तो आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही बहस और तेज हो सकती है। वहीं, यदि मामला यहीं शांत होता है तो NDA के भीतर इस मुद्दे पर आगे बातचीत का रास्ता खुल सकता है।
फिलहाल लखेंद्र पासवान ने दोनों नेताओं को व्यक्तिगत और पारिवारिक दायरे से ऊपर उठकर समाज के व्यापक हितों पर ध्यान देने की सलाह दी है।
राजनीतिक विवाद से ज्यादा सामाजिक प्रतिनिधित्व पर जोर
लखेंद्र पासवान के पूरे बयान का मुख्य केंद्र आरक्षण विवाद के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व रहा। उन्होंने कहा कि गरीब और वंचित समाज के लोगों को केवल वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उनके अनुसार, यदि समाज के लोगों को वास्तविक राजनीतिक शक्ति देनी है तो उन्हें नेतृत्व के अवसर भी देने होंगे। इसके लिए राजनीतिक दलों को नए चेहरों को आगे लाना होगा और संगठन में जिम्मेदारियां देनी होंगी।
कुल मिलाकर, आरक्षण को लेकर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच जारी बयानबाजी में अब लखेंद्र पासवान की एंट्री ने विवाद को नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। उन्होंने एक ओर आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए इसके साथ छेड़छाड़ की संभावना को खारिज किया, वहीं दूसरी ओर दोनों NDA नेताओं को परिवार की राजनीति से बाहर निकलकर समाज के अन्य लोगों को आगे बढ़ाने की सलाह दी।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी इस टिप्पणी पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या NDA के भीतर आरक्षण तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर कोई साझा राजनीतिक रुख सामने आता है।