टीबी मुक्त मुजफ्फरपुर: पोषण किट वितरण के साथ संकल्पबद्धता, डीएम ने दी जन-सहयोग की सीख
बिहार के मुजफ्फरपुर में 'टीबी मुक्त भारत' (निक्षय मित्र अभियान) को लेकर एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। हाल ही में जिले में समाजसेवी संस्थाओं की एकजुटता और प्रशासन के सक्रिय प्रयासों के परिणामस्वरूप 150 टीबी मरीजों के बीच पोषण किट का वितरण किया गया। यह पहल न केवल मरीजों को संबल प्रदान करने वाली है, बल्कि टीबी जैसी लाइलाज समझी जाने वाली बीमारी के प्रति समाज की धारणा को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य: दवा के साथ आहार
पोषण किट वितरण कार्यक्रम में मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी (DM) कुमार गौरव ने मुख्य रूप से भाग लिया। अपने संबोधन में उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही—"टीबी का उपचार केवल दवाओं पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसके लिए संतुलित पोषण (Balanced Nutrition) अनिवार्य है।"
अक्सर देखा गया है कि टीबी के मरीज दवाइयां तो ले लेते हैं, लेकिन शरीर में पोषक तत्वों की कमी के कारण वे कमजोरी का शिकार हो जाते हैं। प्रशासन और समाजसेवी संस्थाओं का यह साझा प्रयास उन मरीजों के लिए एक ढाल का काम कर रहा है, जो आर्थिक तंगी के कारण पौष्टिक आहार नहीं ले पा रहे थे।
150 मरीजों को नई उम्मीद
कार्यक्रम के दौरान 150 चयनित मरीजों को पोषण किट सौंपी गई। इन किटों में वह सभी आवश्यक सामग्री शामिल है जो टीबी के मरीज के रिकवरी दर को तेज कर सकती है, जैसे:
प्रोटीन युक्त दालें और सोयाबीन।
मूंगफली और गुड़ (जो आयरन और ऊर्जा का स्रोत हैं)।
अनाज (सत्तू, चना आदि)।
विटामिन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व।
यह किट न केवल मरीजों को बेहतर पोषण प्रदान करेगी, बल्कि उन्हें दवाइयों के साइड इफेक्ट्स से लड़ने की शारीरिक शक्ति भी देगी।
समाजसेवी संस्थाओं की भूमिका: एकजुटता का उदाहरण
टीबी उन्मूलन में सरकारी प्रयासों के साथ-साथ समाजसेवी संस्थाओं (NGOs) का योगदान अपरिहार्य है। मुजफ्फरपुर में विभिन्न संस्थाओं ने 'निक्षय मित्र' बनकर मरीजों को गोद लिया है। उनकी यह एकजुटता यह दर्शाती है कि टीबी केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जवाबदेही है। इन संस्थाओं का कार्य केवल किट वितरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे समय-समय पर मरीजों की काउंसलिंग और दवा लेने की निरंतरता (Compliance) पर भी नजर रख रही हैं।
टीबी मुक्त भारत: चुनौतियां और समाधान
भारत सरकार का लक्ष्य 2025 तक टीबी मुक्त भारत बनाना है। मुजफ्फरपुर प्रशासन इसी लक्ष्य को धरातल पर उतारने के लिए निरंतर प्रयासरत है। डीएम कुमार गौरव द्वारा जोर दिए गए बिंदुओं से स्पष्ट है कि टीबी नियंत्रण के लिए तीन प्रमुख स्तंभ आवश्यक हैं:
जागरूकता: टीबी के लक्षणों (जैसे दो सप्ताह से अधिक खांसी, वजन कम होना, रात में पसीना आना) के प्रति लोगों को जागरूक करना।
निरंतरता: मरीजों को यह समझाना कि छह से नौ महीने तक चलने वाली दवाइयों का कोर्स बीच में छोड़ना खतरनाक हो सकता है (Drug-Resistant TB का खतरा)।
पोषण: आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों तक पौष्टिक आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
सामाजिक भेदभाव मिटाने की आवश्यकता
टीबी मरीजों के प्रति समाज में व्याप्त 'कलंक' (Stigma) अभी भी एक बड़ी बाधा है। कई मरीज समाज के डर से अपनी बीमारी छिपाते हैं, जिससे वे न केवल अपनी जान जोखिम में डालते हैं, बल्कि दूसरों में भी संक्रमण फैलाते हैं। डीएम ने अपने संबोधन में लोगों से अपील की कि वे टीबी मरीजों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करें। जब समाज मरीजों को अपनाएगा, तभी वे बिना झिझक इलाज के लिए आगे आएंगे।
भविष्य की कार्ययोजना
मुजफ्फरपुर प्रशासन का अगला लक्ष्य जिले के अंतिम टीबी मरीज तक पहुंचना है। इसके लिए प्रशासन ने:
हर ब्लॉक स्तर पर टीबी स्क्रीनिंग शिविर आयोजित करने की योजना बनाई है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों को 'निक्षय मित्र' बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
डिजिटल मॉनिटरिंग के जरिए मरीजों के इलाज की प्रगति की निगरानी की जा रही है।
मुजफ्फरपुर का यह पोषण किट वितरण कार्यक्रम एक सफल 'मॉडल' के रूप में उभरा है। यह साबित करता है कि जब प्रशासन की इच्छाशक्ति और समाज सेवा का भाव मिल जाते हैं, तो बड़ी से बड़ी चुनौतियों को परास्त किया जा सकता है। टीबी मुक्त मुजफ्फरपुर का सपना तब तक पूरा नहीं होगा, जब तक हम एक-दूसरे के निक्षय मित्र बनकर एक-दूसरे का हाथ नहीं थामेंगे। यह पहल उन 150 परिवारों के लिए तो खुशहाली लाई ही है, साथ ही पूरे जिले के लिए एक संदेश है कि स्वस्थ समाज के निर्माण में हर व्यक्ति की भागीदारी महत्वपूर्ण है।