एलएनएमयू के पीजी राजनीति विज्ञान विभाग में ‘भारत की विदेश नीति और समकालीन परिदृश्य’ पर विशेष व्याख्यान, विशेषज्ञों ने वैश्विक चुनौतियों और कूटनीति पर डाला प्रकाश

दरभंगा न्यूज।
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (एलएनएमयू) के स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान विभाग में रविवार को ‘भारत की विदेश नीति और समकालीन परिदृश्य’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और विभिन्न संकायों के शिक्षकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। व्याख्यान के दौरान भारत की विदेश नीति के ऐतिहासिक विकास, वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों, बदलते अंतरराष्ट्रीय संबंधों तथा भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई।

मुख्य वक्ता प्रो. सत्यनारायण प्रसाद ने अपने व्याख्यान में कहा कि भारत की विदेश नीति केवल कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा, आर्थिक विकास, वैश्विक सहयोग, सामरिक हितों और सांस्कृतिक मूल्यों का भी महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के सामने अनेक चुनौतियां थीं, जिनके बीच देश ने अपनी विदेश नीति की मजबूत नींव रखी।

आजादी के समय विदेश नीति को मिला प्रारंभिक स्वरूप

प्रो. सत्यनारायण प्रसाद ने बताया कि वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत को एक ऐसी विदेश नीति तैयार करनी थी जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के साथ-साथ विश्व शांति और सहयोग को भी बढ़ावा दे। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में भारत ने गुटनिरपेक्षता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने की नीति अपनाई।

उन्होंने कहा कि उस समय विश्व शीत युद्ध के दौर से गुजर रहा था, जहां दो महाशक्तियों के बीच वैचारिक और सामरिक प्रतिस्पर्धा चरम पर थी। ऐसे समय में भारत ने किसी भी शक्ति गुट का हिस्सा बनने के बजाय स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति अपनाई, जिसने उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भूमिका पर चर्चा

व्याख्यान के दौरान प्रो. प्रसाद ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत ने विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक मंच पर मजबूती से उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुटनिरपेक्ष नीति ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की।

उन्होंने कहा कि समय के साथ वैश्विक परिस्थितियां बदलीं, लेकिन भारत ने अपने मूल सिद्धांतों—शांति, सहयोग, संप्रभुता के सम्मान और परस्पर हितों—को हमेशा प्राथमिकता दी।

बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका

प्रो. सत्यनारायण प्रसाद ने कहा कि वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गई है। वैश्वीकरण, तकनीकी विकास, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक प्रतिस्पर्धा जैसे नए मुद्दे विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक मंचों पर उसकी भूमिका लगातार मजबूत हुई है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत की सक्रिय भागीदारी उसकी बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रमाण है।

पड़ोसी देशों के साथ संबंधों का महत्व

व्याख्यान में भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर भी चर्चा की गई। प्रो. प्रसाद ने कहा कि पड़ोसी देशों के साथ स्थिर और सकारात्मक संबंध किसी भी देश की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उन्होंने सीमा सुरक्षा, व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और क्षेत्रीय सहयोग के महत्व को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और विकास को भी प्रोत्साहित करना है।

छात्रों को बताया विदेश नीति का व्यावहारिक महत्व

विशेष व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों को विदेश नीति के व्यावहारिक पक्षों से भी परिचित कराया गया। प्रो. प्रसाद ने बताया कि विदेश नीति का प्रभाव केवल सरकारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर व्यापार, शिक्षा, रोजगार, निवेश, तकनीकी सहयोग और आम नागरिकों के जीवन पर भी पड़ता है।

उन्होंने छात्रों से कहा कि वैश्विक घटनाओं को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इतिहास, राजनीति और अर्थव्यवस्था का समग्र अध्ययन आवश्यक है।

शोध और अकादमिक विमर्श को मिलेगा बढ़ावा

कार्यक्रम में उपस्थित विभागीय शिक्षकों ने कहा कि इस प्रकार के विशेष व्याख्यान विद्यार्थियों के ज्ञानवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे शोधार्थियों और छात्रों को विषय की गहराई से समझ विकसित करने का अवसर मिलता है और समकालीन मुद्दों पर अकादमिक चर्चा को बढ़ावा मिलता है।

शोधार्थियों ने भी वक्ता से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विषयों, भारत की कूटनीतिक रणनीति और भविष्य की विदेश नीति संबंधी संभावनाओं पर प्रश्न पूछे, जिनका विस्तृत उत्तर दिया गया।

प्रश्नोत्तर सत्र रहा आकर्षण का केंद्र

व्याख्यान के बाद आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहा। विद्यार्थियों ने भारत की वैश्विक भूमिका, संयुक्त राष्ट्र में सुधार, क्षेत्रीय सहयोग, आर्थिक कूटनीति, सामरिक साझेदारी, नई विश्व व्यवस्था और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़े कई प्रश्न पूछे।

प्रो. प्रसाद ने सभी प्रश्नों का विस्तार से उत्तर देते हुए कहा कि भारत की विदेश नीति समय के साथ बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को लगातार विकसित कर रही है, लेकिन राष्ट्रीय हित और रणनीतिक स्वायत्तता उसके मूल आधार बने हुए हैं।

विभागाध्यक्ष ने जताया आभार

कार्यक्रम के अंत में विभागाध्यक्ष ने मुख्य वक्ता, उपस्थित शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय समय-समय पर इस प्रकार के अकादमिक कार्यक्रम आयोजित करता रहेगा ताकि विद्यार्थियों को समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर विशेषज्ञों से सीधे संवाद का अवसर मिलता रहे।

उन्होंने विद्यार्थियों से नियमित रूप से ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेने और विषयों का गंभीर अध्ययन करने का आग्रह किया।

विद्यार्थियों को मिला नई सोच का अवसर

कार्यक्रम में शामिल विद्यार्थियों ने कहा कि व्याख्यान के माध्यम से उन्हें भारत की विदेश नीति के ऐतिहासिक विकास, वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं को समझने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम न केवल परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी होते हैं, बल्कि वैश्विक राजनीति को समझने में भी मदद करते हैं।

विशेष व्याख्यान ने विद्यार्थियों के बीच अंतरराष्ट्रीय संबंधों और भारतीय विदेश नीति के प्रति नई जिज्ञासा और रुचि उत्पन्न की। शिक्षकों ने आशा व्यक्त की कि इस तरह के अकादमिक आयोजन भविष्य में भी जारी रहेंगे और विश्वविद्यालय में बौद्धिक विमर्श की परंपरा को और मजबूत करेंगे।