राज्यसभा में गूंजा बिहार की बाढ़ और कटाव का गंभीर मुद्दा: सांसद डॉ. धर्मशीला गुप्ता ने नेपाल से आने वाली नदियों के जलप्रवाह और गाद (Silt) की समस्या को किया उजाग
नई दिल्ली / पटना: देश के सर्वोच्च सदन राज्यसभा (Rajya Sabha) में बिहार की एक सबसे बड़ी और विकराल प्राकृतिक समस्या को जोर-शोर से उठाया गया है। बिहार से ताल्लुक रखने वाली माननीया राज्यसभा सांसद डॉ. धर्मशीला गुप्ता (Dr. Dharmshila Gupta) ने संसद के सत्र के दौरान बिहार में हर वर्ष आने वाली भीषण बाढ़ और नदी के कटाव (River Erosion) की गंभीर समस्या पर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। सांसद ने सदन को बताया कि नेपाल से बहकर आने वाली नदियों में अत्यधिक जलप्रवाह और भारी मात्रा में जमा होने वाली गाद (Silt/Sediment) के कारण बिहार के कई जिले हर साल तबाही का मंजर झेलने को मजबूर होते हैं। बाढ़ की यह समस्या साल-दर-साल अधिक भयावह होती जा रही है, जिसके चलते सैकड़ों गांव जलमग्न हो जाते हैं और लाखों बेघर लोग राहत शिविरों में शरण लेने के लिए विवश हो जाते हैं। इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सदन में हुई चर्चा ने एक बार फिर केंद्र और राज्य स्तर पर दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन की आवश्यकता को रेखांकित कर दिया है।
बिहार में बाढ़ की समस्या: नेपाल से आने वाली नदियां और गाद का संकट
बिहार को 'नदियों का मायका' कहा जाता है, जहाँ उत्तर दिशा से बहकर आने वाली कई प्रमुख नदियां नेपाल से प्रवेश करती हैं। डॉ. धर्मशीला गुप्ता ने अपने संबोधन में इसी भौगोलिक सच्चाई और उसके दुष्प्रभावों को रेखांकित किया।
नेपाल से आने वाली नदियों का कहर: कोसी, गंडक, बागमती, कमला, और अबरार जैसी नदियां जब नेपाल से भारी उफान के साथ बिहार के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं, तो वे अपने साथ अपार जलराशि लेकर आती हैं। जलस्तर में अचानक हुई यह वृद्धि तटबंधों (Embankments) पर भारी दबाव बनाती है।
गाद (Silt) का जमना और नदियों की घटती गहराई: सांसद ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि इन नदियों के तलहटी में पिछले कई वर्षों से लगातार गाद (सिल्ट) जमा होती जा रही है, जिसके कारण नदियों की जल-धारण क्षमता (Water Carrying Capacity) लगातार घटती जा रही है। थोड़ा सा भी अतिरिक्त पानी आने पर नदियां अपने तयशुदा रास्तों से बाहर निकलकर रिहायशी इलाकों और उपजाऊ खेतों में तबाही मचा देती हैं।
हर साल की तबाही: जलमग्न गांव और राहत शिविरों की दास्तान
मानसून के दिनों में बिहार के उत्तर और पूर्वोत्तर हिस्से के कई जिले जैसे मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सीतामढ़ी, मधुबनी, और कोसी-सीमांचल के इलाके जलप्रलय का शिकार बन जाते हैं।
लाखों लोगों का विस्थापन: हर साल बाढ़ के विकराल रूप धारण करने के कारण हजारों एकड़ में लगी खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं और लाखों की संख्या में ग्रामीण परिवार बेघर हो जाते हैं। लोगों को अपना आशियाना छोड़कर ऊंचे स्थानों या सरकारी राहत शिविरों (Relief Camps) में शरण लेनी पड़ती है।
कटाव की मार से उजड़ते घर: बाढ़ के साथ-साथ नदियों द्वारा किया जाने वाला तीव्र कटाव (Erosion) और भी खतरनाक साबित होता है। नदियां रातों-रात उपजाऊ जमीनों, पक्के मकानों और सड़कों को अपने आगोश में समा लेती हैं, जिससे ग्रामीण परिवार पूरी तरह सड़क पर आ जाते हैं।
सांसद डॉ. धर्मशीला गुप्ता की प्रमुख मांगें और सुझाव
राज्यसभा में इस गंभीर मुद्दे को उठाते हुए सांसद डॉ. धर्मशीला गुप्ता ने केंद्र सरकार से मांग की कि इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए युद्ध स्तर पर और अंतरराष्ट्रीय समन्वय के साथ कदम उठाए जाने चाहिए। उनके द्वारा रखे गए प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
नेपाल के साथ उच्चस्तरीय जल कूटनीति: चूंकि इन नदियों का उद्गम स्थल नेपाल में है, इसलिए भारत सरकार को नेपाल के साथ मिलकर एक स्थायी जल आयोग या तंत्र विकसित करना चाहिए ताकि समय रहते पानी के प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण पर कार्य किया जा सके।
सिल्ट मैनेजमेंट पॉलिसी (गाद प्रबंधन नीति): नदियों की तطلहटी से गाद निकालने (Desiltting) के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए, ताकि नदियों की गहराई बढ़ाई जा सके और पानी का सहज प्रवाह सुनिश्चित हो सके।
मजबूत तटबंधों का निर्माण और रखरखाव: बिहार में बने पुराने और जर्जर तटबंधों का समय पर उच्चीकरण और आधुनिकीकरण किया जाए ताकि बाढ़ के दौरान उनके टूटने का खतरा न रहे।
बाढ़ पीड़ितों के लिए त्वरित पुनर्वास: हर साल बाढ़ और कटाव से प्रभावित होने वाले परिवारों को समय पर उचित मुआवजा और स्थायी पुनर्वास की सुविधा दी जाए।
राज्यसभा सांसद डॉ. धर्मशीला गुप्ता द्वारा बिहार की बाढ़ और कटाव की समस्या को राष्ट्रीय मंच पर उठाया जाना एक बेहद सराहनीय और समसामयिक कदम है। यह केवल एक राज्य विशेष की समस्या नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन से जुड़ा एक बड़ा विषय है। जब तक नेपाल से आने वाली नदियों के जलप्रवाह और गाद की समस्या का कोई ठोस, वैज्ञानिक और स्थायी समाधान नहीं खोजा जाता, तब तक बिहार के लाखों लोगों को हर साल इस प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ता रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक दूरदर्शी कार्ययोजना तैयार करें ताकि 'बिहार के शोक' कहे जाने वाले इन जलस्रोतों को वरदान में बदला जा सके।