टीएमबीयू में 70 अतिथि शिक्षकों की सेवाएं जांच रिपोर्ट के आधार पर समाप्त; नाराज शिक्षकों का धरना-प्रदर्शन जारी, वहीं इनमें से 9 शिक्षकों का बीएसयूएससी (BSUSC) के माध्यम से नियमित पदों पर हुआ है चयन

भागलपुर, विशेष संवाददाता: तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों अतिथि शिक्षकों (Guest Teachers) की सेवा समाप्ति को लेकर भूचाल आया हुआ है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा एक विशेष जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर बड़ी कार्रवाई करते हुए 70 अतिथि शिक्षकों की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। इस अचानक और कड़े फैसले के बाद से प्रभावित शिक्षकों में भारी रोष व्याप्त है और वे अपनी बहाली तथा न्याय की मांग को लेकर लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सकारात्मक पहलू यह भी सामने आया है कि इन बर्खास्त किए गए शिक्षकों में से 9 शिक्षकों का चयन बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) की नई और पारदर्शी चयन प्रक्रिया के तहत नियमित सहायक प्राध्यापक के रूप में हो चुका है।

क्या है पूरा मामला? जांच रिपोर्ट और सेवा समाप्ति की पृष्ठभूमि

तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में पिछले कुछ महीनों से अतिथि शिक्षकों के नियोजन, रोस्टर पालन और उनकी शैक्षणिक योग्यताओं की जांच को लेकर एक उच्चस्तरीय प्रक्रिया चल रही थी:

जांच रिपोर्ट का आधार: विश्वविद्यालय प्रशासन को पूर्व में मिली शिकायतों और नियमों की समीक्षा के लिए एक जांच कमेटी गठित की गई थी। कमेटी द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में यह पाया गया कि कई कॉलेजों में नियमों को ताक पर रखकर या रोस्टर के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए अतिथि शिक्षकों को नियुक्त किया गया था।

70 शिक्षकों की विदाई: इसी जांच रिपोर्ट की अनुशंसाओं को आधार बनाते हुए टीएमबीयू प्रशासन ने एक झटके में 70 अतिथि शिक्षकों की सेवाएं समाप्त करने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया। इस आदेश के बाद से यूनिवर्सिटी कैंपस और संबंधित विभागों में हड़कंप मच गया है।

शिक्षकों का फूटा गुस्सा: प्रशासनिक भवन के समक्ष धरना-प्रदर्शन

सेवा समाप्त किए जाने से आहत अतिथि शिक्षक लगातार विरोध के रास्ते पर हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ मुखर होकर अपनी आवाज उठा रहे हैं:

अनिश्चितकालीन धरना: प्रभावित शिक्षक पिछले कई दिनों से विश्वविद्यालय मुख्यालय के मुख्य द्वार और प्रशासनिक भवन के समक्ष धरने पर बैठे हैं। उनका आरोप है कि बिना उनका पक्ष सुने और बिना किसी ठोस प्रशासनिक गलती के उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है।

रोजी-रोटी का संकट: प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों का कहना है कि वे पिछले कई वर्षों से पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ विश्वविद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे थे। अचानक इस तरह नौकरी छीने जाने से उनके सामने और उनके परिवार के समक्ष भीषण आर्थिक और मानसिक संकट खड़ा हो गया है। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की पुरजोर मांग की है।

राहत की खबर: 9 शिक्षकों का बीएसयूएससी (BSUSC) के जरिए नियमित चयन

इस पूरी उथल-पुथल और तनावपूर्ण स्थिति के बीच एक बेहद सुखद और राहत भरी खबर भी सामने आई है:

नियमित नियुक्ति: जिन 70 अतिथि शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की गई हैं, उनमें से 9 ऐसे मेधावी शिक्षक शामिल हैं जिन्होंने अपनी मेहनत और योग्यता के दम पर बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) की कठिन चयन प्रक्रिया को पास कर लिया है।

असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में वापसी: इन 9 शिक्षकों का चयन अब विभिन्न विश्वविद्यालयों में नियमित सहायक प्राध्यापक (Assistant Professor) के रूप में हो चुका है। शैक्षणिक जानकारों का मानना है कि भले ही अतिथि शिक्षक के रूप में उनकी सेवाएं समाप्त हुई हों, लेकिन आयोग के माध्यम से नियमित पद पर उनका चयन इस बात का प्रमाण है कि वे अकादमिक रूप से पूरी तरह योग्य और सक्षम हैं।

विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष और आगे की स्थिति

टीएमबीयू के प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई किसी व्यक्तिगत द्वेष के कारण नहीं, बल्कि उच्च न्यायालय के निर्देशों और राज्य सरकार के नियमों के अनुपालन में की गई जांच रिपोर्ट के आधार पर बाध्य होकर की गई है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी शिक्षक के पास अपने नियोजन से संबंधित कोई वैध और पुख्ता दस्तावेज या स्पष्टीकरण है, तो वे उचित माध्यम से अपनी बात रख सकते हैं, जिस पर नियमानुसार विचार किया जाएगा।

भागलपुर के टीएमबीयू में अतिथि शिक्षकों की सेवा समाप्ति का यह मामला विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था, नियमों के पालन और शिक्षकों के भविष्य के बीच एक बड़ा संघर्ष बन गया है। एक तरफ जहाँ नौकरी जाने से नाराज शिक्षक धरने पर बैठकर न्याय की गुहार लगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बीएसयूएससी के जरिए नियमित रूप से चयनित हुए 9 शिक्षकों की सफलता यह उम्मीद जगाती है कि प्रतिभा अंततः अपना मुकाम हासिल कर ही लेती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इन आंदोलित शिक्षकों की मांगों पर क्या अंतिम रुख अख्तियार करता है।