भागलपुर का मानिक सरकार घाट बार-बार धंसती जमीन और संकट में पड़ते आशियाने

भागलपुर: प्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चटोपाध्याय का ननिहाल और ऐतिहासिक धरोहरों को संजोए हुए भागलपुर का 'मानिक सरकार घाट' क्षेत्र इन दिनों एक गंभीर त्रासदी के मुहाने पर खड़ा है। पिछले कुछ महीनों में यहाँ घटित दो प्रमुख घटनाओं ने न केवल स्थानीय निवासियों की रातों की नींद उड़ा दी है, बल्कि प्रशासन की लचर कार्यप्रणाली पर भी कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। गंगा के बढ़ते कटाव और बार-बार धंसती सड़क के कारण यहाँ रहने वाले करीब 50 से अधिक परिवारों के सिर पर हर पल मौत का साया मंडरा रहा है।

सिलसिलेवार हादसों की भयावहता

मानिक सरकार घाट मार्ग पिछले दो वर्षों में तीसरी बार ध्वस्त हुआ है। हाल के महीनों में हुई दो प्रमुख घटनाओं ने स्थिति को और भी विकराल बना दिया है। सड़क का लगभग 80 मीटर हिस्सा गंगा नदी की भेंट चढ़ चुका है और जमीन करीब 10 से 30 फीट तक नीचे धंस गई है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि सड़क के धंसने के साथ ही आसपास के मकानों की दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं, जिससे लोग अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।

प्रशासनिक लापरवाही का 'असर'

स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर निगम और जल संसाधन विभाग की 'कागजी खानापूर्ति' ही इस तबाही की जड़ है। 19 नवंबर 2023 को जब पहली बार यह सड़क धंसी थी, तब भी बड़े-बड़े आश्वासन दिए गए थे। मार्च 2025 में खानापूर्ति के नाम पर सड़क के कुछ हिस्सों की मरम्मत तो की गई, लेकिन कटाव को रोकने के लिए कोई 'स्थायी समाधान' नहीं निकाला गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि घाट पर 'बुडको' (BUDCO) द्वारा स्ट्राम वाटर ड्रेन के नाम पर बिना किसी निकास व्यवस्था के जो निर्माण कराया गया, वही अब इलाके के लिए काल बन रहा है। नाले का पानी ठीक से बाहर न निकल पाने के कारण रिसाव हो रहा है, जिससे मिट्टी की पकड़ कमजोर हो गई है और सड़क बार-बार धंस रही है।

दहशत के साये में जिंदगी

मानिक सरकार घाट रोड (बैकुंठनगर कॉलोनी) के निवासी विनय कुमार राय बताते हैं कि कॉलोनी में करीब सौ मकान हैं, जहां सैकड़ों लोग रहते हैं। सड़क टूटने के बाद से आवागमन पूरी तरह ठप सा हो गया है। दुपहिया और चारपहिया वाहनों का गुजरना तो दूर, अब तो पैदल चलना भी जानलेवा हो चुका है। हालिया घटना के बाद, एक परिवार को तो आनन-फानन में अपना घर छोड़कर पड़ोसियों के यहां शरण लेनी पड़ी क्योंकि उनके घर की दीवारें आंखों के सामने चटक रही थीं।

क्या कहता है प्रशासन?

घटना के बाद नगर आयुक्त शुभम कुमार ने मौके का निरीक्षण किया और अभियंताओं की टीम को स्थिति का जायजा लेने के लिए भेजा। उन्होंने बाढ़ नियंत्रण कार्य प्रमंडल (Flood Control Division) को पत्र लिखकर तत्काल 'जियो बैग्स' डालकर कटाव रोकने का निर्देश दिया है। मेयर डॉ. बसुंधरा लाल ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए रिटेनिंग वॉल का काम युद्धस्तर पर शुरू करने का आदेश दिया है, ताकि बारिश के मौसम से पहले इस इलाके को सुरक्षित किया जा सके।

समाधान की राह: चुनौतियां और भविष्य

भले ही प्रशासन अब हरकत में आया है, लेकिन स्थानीय निवासियों का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। लोगों का कहना है कि प्रशासन तब तक नींद से नहीं जागता जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए।

स्थायी समाधान की जरूरत: विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक नदी के तटबंध का वैज्ञानिक तरीके से सुदृढ़ीकरण (Strengthening) नहीं किया जाएगा, यह खतरा बना रहेगा।

अवैध निर्माण पर लगाम: घाट के किनारे धड़ल्ले से हो रहे अवैध निर्माण और फाउंडेशन कार्यों पर तत्काल रोक लगनी चाहिए, जो मिट्टी के कटाव को और बढ़ावा दे रहे हैं।

सीवरेज सिस्टम की जांच: जो सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की पाइपलाइन गंगा की ओर खिसक गई है, उसकी तत्काल मरम्मत आवश्यक है, अन्यथा यह पूरी बस्ती को दलदल में तब्दील कर देगी।

मानिक सरकार घाट की यह त्रासदी एक चेतावनी है। यदि समय रहते कटाव निरोधी कार्य और बेहतर इंजीनियरिंग समाधान नहीं अपनाए गए, तो भागलपुर का यह ऐतिहासिक इलाका नक्शे से मिट सकता है। प्रशासन को अब 'मरम्मत' नहीं, बल्कि 'पुनर्निर्माण' और 'सुरक्षा' पर ध्यान केंद्रित करना होगा, ताकि लोग चैन की सांस ले सकें।