बिहपुर के स्वतंत्रता सेनानी स्व. वीरो सिंह का नाम अब शिलापट्ट पर अंकित

बिहपुर (भागलपुर): स्वतंत्रता के सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इतिहास के पन्नों में कई ऐसे नायक गुमनाम रहे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था। इसी कड़ी में भागलपुर जिले के बिहपुर प्रखंड के एक महान स्वतंत्रता सेनानी, स्व. वीरो सिंह को मरणोपरांत वह सम्मान प्राप्त हुआ, जिसके वे दशकों से हकदार थे। 'अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं शहीद परिवार कल्याण महापरिषद' की पहल पर स्थानीय स्वराज आश्रम में आयोजित एक गरिमामय समारोह में उन्हें औपचारिक रूप से सम्मानित किया गया और उनका नाम स्वतंत्रता सेनानी शिलापट्ट पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया गया।

गुमनामी से गौरव तक का सफर

स्व. वीरो सिंह बिहपुर क्षेत्र के उन चुनिंदा नायकों में से थे जिन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उस दौर में अंग्रेजों के दमनकारी चक्र के बीच उन्होंने निडर होकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। हालांकि, आजादी के बाद के दशकों में वे मुख्यधारा की चर्चाओं से ओझल रहे।

उनके परिजनों का कहना है कि यह सम्मान उनके लिए किसी बड़े उत्सव से कम नहीं है। आजादी के 79 वर्ष बाद जब उनके दादा/पिता का नाम स्वराज आश्रम के शिलापट्ट पर अंकित हुआ, तो न केवल उनके परिवार के सदस्य बल्कि पूरा बिहपुर क्षेत्र गर्व से भर उठा।

अखिल भारतीय महापरिषद की ऐतिहासिक पहल

यह सम्मान कार्यक्रम 'अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं शहीद परिवार कल्याण महापरिषद' के राष्ट्रव्यापी अभियान का हिस्सा है। महापरिषद ने देश भर में उन स्वतंत्रता सेनानियों को खोजने और सम्मानित करने का बीड़ा उठाया है जो प्रशासनिक भूल या अन्य कारणों से अब तक आधिकारिक दस्तावेजों में उपेक्षित थे।

महापरिषद के प्रतिनिधियों ने बिहपुर स्थित स्वराज आश्रम में आयोजित कार्यक्रम में कहा, "वीरो सिंह जैसे सेनानियों ने आजादी की जो मशाल जलाई थी, उसी की रोशनी में आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं। उनका नाम शिलापट्ट पर अंकित करना मात्र एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाना है कि हमारी आजादी किन बलिदानों का परिणाम है।"

स्वराज आश्रम में उमड़ा जनसैलाब

स्वराज आश्रम, जो स्वयं बिहपुर के स्वतंत्रता संग्राम का एक जीवंत प्रतीक है, इस अवसर पर देशभक्ति के नारों से गूंज उठा। स्थानीय नागरिकों, युवाओं और स्कूली बच्चों की बड़ी उपस्थिति ने यह दर्शाया कि क्षेत्र के लोग अपने वीर नायकों के प्रति आज भी बेहद सम्मान का भाव रखते हैं।

शिलापट्ट पर वीरो सिंह का नाम अंकित किए जाने के समय कई बुजुर्गों की आंखें नम थीं। उन्होंने बताया कि वीरो सिंह का व्यक्तित्व बेहद सरल और त्यागी था। वे कभी भी सत्ता या पुरस्कार की लालसा नहीं रखते थे, लेकिन आज जब सरकार और संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है, तो समाज को एक सही दिशा मिली है।

युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत

इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य युवाओं को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के स्थानीय इतिहास से जोड़ना था। आज के डिजिटल युग में, जब युवा वर्ग अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, ऐसे आयोजन इतिहास के अनकहे अध्यायों को जीवंत करते हैं।

स्वराज आश्रम में मौजूद वक्ताओं ने कहा कि वीरो सिंह का जीवन संघर्ष और त्याग का एक ऐसा अध्याय है जिसे हर स्थानीय स्कूल के पाठ्यक्रम और लाइब्रेरी में स्थान मिलना चाहिए। यह शिलापट्ट अब केवल पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि बिहपुर की वीरता का 'ध्रुव तारा' है, जो मार्गदर्शन करता रहेगा।

स्वतंत्रता के 79वें वर्ष में स्व. वीरो सिंह को मिला यह सम्मान इस बात का प्रतीक है कि राष्ट्र अपने नायकों को कभी नहीं भूलता। भले ही इसमें देरी हुई, लेकिन यह सम्मान देश की उस विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिस पर भारत का भविष्य टिका है।

अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं शहीद परिवार कल्याण महापरिषद द्वारा शुरू किया गया यह अभियान निश्चित रूप से उन अन्य गुमनाम नायकों के लिए भी मार्ग प्रशस्त करेगा, जिनकी गाथाएं अभी भी बिहपुर और आसपास के गांव-देहातों की धूल में दबी हुई हैं।