शिक्षकों को तैयार करने के लिए एनसीटीई ने शुरू किया 'एक्सपेरिमेंटल फैकेल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम'

नई दिल्ली/देशभर: भारत की शिक्षण व्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत होने जा रही है। नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) ने अब बीएड (B.Ed) पाठ्यक्रमों में 'भारतीय ज्ञान परंपरा' (Indian Knowledge System - IKS) को पूरी तरह से समाहित करने का निर्णय लिया है। इसी कड़ी में, शिक्षकों को इस नई पद्धति के अनुरूप ढालने के लिए एक महत्वाकांक्षी 'एक्सपेरिमेंटल फैकेल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम' (Experimental Faculty Development Program) की शुरुआत की गई है।

कार्यक्रम का मूल उद्देश्य: मल्टी-डिसिप्लिनरी दृष्टिकोण

इस कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य बीएड प्रशिक्षु शिक्षकों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर उन्हें 'मल्टी-डिसिप्लिनरी' (बहु-विषयक) विषयों को पढ़ाने में सक्षम बनाना है। एनसीटीई का मानना है कि आधुनिक शिक्षा में जब तक प्राचीन भारतीय मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समावेश नहीं होगा, तब तक सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।

इस प्रशिक्षण के माध्यम से शिक्षकों को यह सिखाया जाएगा कि कैसे वे विज्ञान, गणित, भाषा, नैतिकता और कला जैसे विभिन्न विषयों को भारतीय परिप्रेक्ष्य (Perspective) के साथ जोड़कर पढ़ा सकते हैं। यह कार्यक्रम शिक्षकों को एक 'इंस्ट्रक्टर' (अनुदेशक) से ऊपर उठाकर एक 'मेंटोर' (मार्गदर्शक) के रूप में विकसित करने की योजना है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप, यह पहल शिक्षा को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक प्रयास है। एनसीटीई के अधिकारियों के अनुसार, भारतीय ज्ञान परंपरा केवल इतिहास का विषय नहीं है, बल्कि यह एक तार्किक और प्रयोगात्मक विज्ञान है। चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट और चाणक्य जैसे विद्वानों की पद्धतियों को आज के क्लासरूम में कैसे लागू किया जाए, यही इस फैकेल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का मुख्य केंद्र बिंदु है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएं:

प्रयोगात्मक शिक्षण (Experimental Learning): जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह कार्यक्रम पूरी तरह से 'हैंड्स-ऑन' होगा। शिक्षकों को कक्षा में वाद-विवाद, केस स्टडी, और फील्ड वर्क के माध्यम से सिखाने की कला पर जोर दिया जाएगा।

समग्रता का समावेश: शिक्षकों को यह प्रशिक्षण दिया जाएगा कि कैसे वे पर्यावरण विज्ञान को प्राचीन वास्तुशिल्प से और आयुर्वेद के सिद्धांतों को आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान से जोड़कर छात्रों के सामने प्रस्तुत करें।

मूल्य-आधारित शिक्षा: इस प्रशिक्षण का एक बड़ा हिस्सा शिक्षकों में सहानुभूति, सामाजिक जिम्मेदारी और नेतृत्व के गुण विकसित करने पर केंद्रित है, ताकि वे भविष्य के नागरिकों को बेहतर संस्कार दे सकें।

बीएड कॉलेजों में क्या बदलेगा?

इस प्रोग्राम के सफल क्रियान्वयन के बाद, बीएड कॉलेजों का पाठ्यक्रम अधिक गतिशील और जीवंत होगा। भावी शिक्षक अब केवल रटने वाली पद्धति को बढ़ावा नहीं देंगे, बल्कि छात्रों में जिज्ञासा और तार्किक सोच (Critical Thinking) को प्रेरित करेंगे। यह पहल न केवल भारत की गौरवशाली विरासत को फिर से जीवंत करेगी, बल्कि देश को एक 'वैश्विक ज्ञान महाशक्ति' के रूप में स्थापित करने में भी मददगार साबित होगी।

हालांकि, इस बड़े बदलाव को लागू करना एक चुनौती भी है। इसके लिए देशभर के बीएड कॉलेजों में फैकल्टी को अपडेट करना होगा। एनसीटीई का लक्ष्य है कि आने वाले शैक्षणिक सत्र तक प्रत्येक बीएड संस्थान में कम से कम कुछ शिक्षक ऐसे हों, जो भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से मल्टी-डिसिप्लिनरी शिक्षा देने में पूरी तरह दक्ष हों।

शिक्षाविदों का मानना है कि यह बदलाव भारतीय शिक्षा जगत के लिए मील का पत्थर साबित होगा। यह उन शिक्षकों को तैयार करेगा जो तकनीक के साथ-साथ मूल्यों और परंपराओं का सही संतुलन बनाने में सक्षम होंगे।