फोरलेन सड़क के लिए गंगा किनारे कटे दो दर्जन से अधिक पेड़, विकास की रफ्तार या पर्यावरण पर बढ़ता खतरा?

पटना सिटी। भद्रघाट से दीदारगंज तक जेपी गंगा पथ के समानांतर बन रही प्रस्तावित फोरलेन सड़क को राजधानी के पूर्वी हिस्से के लिए एक बड़ी आधारभूत परियोजना माना जा रहा है। इस सड़क के निर्माण से जहां वर्षों से अशोक राजपथ पर लगने राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर सड़क निर्माण के लिए गंगा किनारे दो दर्जन से अधिक हरे-भरे पेड़ों की कटाई ने पर्यावरण संरक्षण को लेक वाले भीषण जाम से लोगों कोर नई बहस छेड़ दी है। स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने हरियाली के लगातार कम होने पर चिंता जताते हुए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

यातायात व्यवस्था को मिलेगी नई दिशा

पटना सिटी के भद्रघाट, महावीर घाट, चित्रगुप्त मंदिर, खाजेकलां, महाराज घाट और दीदारगंज के बीच बनने वाली यह फोरलेन सड़क जेपी गंगा पथ के समानांतर विकसित की जा रही है। लंबे समय से इस क्षेत्र के लोगों को अशोक राजपथ पर घंटों जाम में फंसना पड़ता है। सड़क संकरी होने और वाहनों की संख्या लगातार बढ़ने से लोगों का समय और ईंधन दोनों बर्बाद होते हैं। नई सड़क बनने के बाद राजधानी के पूर्वी हिस्से से आने-जाने वाले हजारों वाहनों को वैकल्पिक मार्ग मिलेगा, जिससे ट्रैफिक का दबाव कम होने की संभावना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना पूरी होने के बाद पटना सिटी, दीदारगंज, फतुहा और आसपास के इलाकों के लोगों को शहर के अन्य हिस्सों तक पहुंचने में काफी कम समय लगेगा। साथ ही मालवाहक वाहनों की आवाजाही भी अधिक सुगम हो सकेगी।

सड़क निर्माण के लिए काटे गए दर्जनों पेड़

फोरलेन सड़क के निर्माण कार्य के दौरान गंगा किनारे स्थित कई पुराने और विशाल पेड़ों को काटा गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार अब तक दो दर्जन से अधिक पेड़ हटाए जा चुके हैं, जिनमें पीपल, बरगद और अन्य छायादार वृक्ष शामिल हैं। कई स्थानों पर वर्षों पुराने पेड़ों को मशीनों की सहायता से काटा गया, जिससे क्षेत्र का प्राकृतिक स्वरूप भी प्रभावित हुआ है।

भद्रघाट, महावीर घाट, चित्रगुप्त मंदिर परिसर और महाराज घाट जैसे क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई साफ दिखाई दे रही है। इन पेड़ों के हटने से गंगा किनारे का हरित क्षेत्र पहले की तुलना में काफी कम नजर आने लगा है।

वन विभाग की अनुमति का दावा

परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सड़क निर्माण के लिए जिन पेड़ों को हटाया गया है, उन्हें वन विभाग से आवश्यक अनुमति प्राप्त करने के बाद ही काटा गया है। अधिकारियों के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों और सरकारी दिशानिर्देशों के अनुरूप अपनाई गई है।

उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं के दौरान यदि पेड़ हटाना अपरिहार्य हो जाता है तो इसके बदले प्रतिपूरक पौधारोपण की व्यवस्था भी की जाती है। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि पुराने और विशाल वृक्षों की भरपाई केवल नए पौधे लगाकर तुरंत नहीं की जा सकती।

पर्यावरणविदों ने जताई चिंता

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि गंगा किनारे स्थित पेड़ केवल हरियाली बढ़ाने का काम नहीं करते, बल्कि वे नदी के पारिस्थितिकी तंत्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। पीपल और बरगद जैसे बड़े वृक्ष गर्मी कम करने, वायु को शुद्ध रखने, पक्षियों को आश्रय देने और मिट्टी के कटाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होती रही तो आने वाले वर्षों में गंगा किनारे का तापमान बढ़ सकता है, जैव विविधता प्रभावित हो सकती है और पर्यावरणीय संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।

पेड़ों को स्थानांतरित करने की उठी मांग

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि सड़क निर्माण अत्यंत आवश्यक था तो बड़े और स्वस्थ पेड़ों को काटने के बजाय आधुनिक तकनीक के माध्यम से दूसरी जगह स्थानांतरित किया जा सकता था। देश के कई शहरों में ट्रांसलोकेशन तकनीक का उपयोग कर बड़े पेड़ों को सुरक्षित स्थान पर लगाया गया है।

लोगों का कहना है कि परियोजना की योजना बनाते समय ऐसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए था, जिससे विकास कार्य भी प्रभावित न हो और पर्यावरण को भी कम से कम नुकसान पहुंचे।

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शहर के विकास के लिए बेहतर सड़कें, पुल और आधुनिक आधारभूत संरचना आवश्यक होती है। लेकिन इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि विकास परियोजनाओं में हरियाली को लगातार नुकसान पहुंचता रहेगा तो भविष्य में प्रदूषण, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।

शहरी योजनाकारों का कहना है कि भविष्य की परियोजनाओं में ऐसी डिजाइन तैयार की जानी चाहिए, जिससे अधिकतम पेड़ों को बचाया जा सके। जहां पेड़ हटाना अनिवार्य हो, वहां उसके बदले पर्याप्त संख्या में पौधे लगाने के साथ-साथ उनके संरक्षण की भी प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।

स्थानीय लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया

क्षेत्र के कई लोगों ने सड़क निर्माण का स्वागत किया है। उनका कहना है कि नई फोरलेन सड़क बनने से वर्षों पुरानी ट्रैफिक समस्या का समाधान होगा और व्यापारिक गतिविधियों को भी गति मिलेगी। वहीं दूसरी ओर कई नागरिकों का कहना है कि विकास की कीमत पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर नहीं चुकाई जानी चाहिए।

कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि सड़क निर्माण के साथ-साथ दोनों किनारों पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जाए, ताकि भविष्य में हरियाली की भरपाई हो सके। उनका मानना है कि यदि प्रशासन और संबंधित एजेंसियां अभी से इस दिशा में ठोस कदम उठाएं तो विकास और पर्यावरण दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।

भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती

पटना तेजी से विस्तार कर रहा है और शहर में आधारभूत ढांचे को मजबूत बनाने के लिए कई बड़ी परियोजनाएं संचालित हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि विकास कार्यों के साथ पर्यावरणीय प्रभावों का भी गंभीर आकलन किया जाए। गंगा किनारे पेड़ों की कटाई ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या आधुनिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण साथ-साथ संभव है।

फिलहाल फोरलेन सड़क के निर्माण से लोगों को बेहतर यातायात सुविधा मिलने की उम्मीद है, लेकिन पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि हरियाली की भरपाई और संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में सड़क निर्माण के साथ व्यापक पौधारोपण, पुराने पेड़ों के संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की दिशा में ठोस पहल समय की सबसे बड़ी आवश्यकता मानी जा रही है।