नीतीश कुमार की 'प्रगति यात्रा' का तोहफा बना सफेद हाथी; 30 बेड की आधुनिक बिल्डिंग में डॉक्टरों की जगह गूंज रहा सन्नाटा, पटना दौड़ने को मजबूर मरीज!
बिहार की राजधानी पटना से सटे ग्रामीण इलाके दनियावां प्रखंड के तोप गांव से विकास के दावों की पोल खोलती एक बेहद ही चिंताजनक और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। बिहटा-सरमेरा मुख्य मार्ग के किनारे ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 8 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से एक अत्याधुनिक 30 बेड का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) भवन बनकर तैयार हुआ था। इस अस्पताल का उद्घाटन हुए पूरे 16 महीने (सवा साल से अधिक) बीत चुके हैं, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह है कि यह अस्पताल आज तक चालू नहीं हो सका है।
करोड़ों का यह आलीशान अस्पताल वर्तमान में केवल एक 'सफेद हाथी' और 'शो-पीस' बनकर रह गया है। अस्पताल की इस वीरान स्थिति को लेकर तोप गांव सहित आस-पास की दर्जनों पंचायतों के ग्रामीणों में सरकार और स्वास्थ्य विभाग (Health Department) के खिलाफ भारी आक्रोश है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब अस्पताल बनकर तैयार है, तो सरकार इसमें डॉक्टरों और नर्सों की नियुक्ति क्यों नहीं कर रही है?
'प्रगति यात्रा' का वो दिन: जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ने काटा था फीता
इस आधुनिक अस्पताल के इतिहास और वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो इसकी क्रोनोलॉजी प्रशासनिक सुस्ती को पूरी तरह बयां करती है:
21 फरवरी 2025 का वो दिन: तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी 'प्रगति यात्रा' के दौरान बड़े ही गौरव के साथ तोप गांव में इस 30 बेड वाले सुसज्जित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का फीता काटकर उद्घाटन किया था। उस समय मंच से बड़े-बड़े वादे किए गए थे कि अब दनियावां और फतुहा के सुदूर ग्रामीण इलाके के लोगों को इलाज के लिए पटना के बड़े अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
16 महीने का सन्नाटा: उद्घाटन की चमचमाती तस्वीरें अखबारों की सुर्खियां तो बनीं, लेकिन इसके बाद स्वास्थ्य विभाग इस भवन को ही भूल गया। आज 16 महीने बाद भी अस्पताल के ओपीडी (OPD), इमरजेंसी वार्ड और लेबर रूम के कमरों में केवल धूल फांक रही है।
डॉक्टरों की जगह तैनात हैं 'दो गार्ड', चूहों और चमगादड़ों का बसेरा
वर्तमान ग्राउंड रियलिटी यह है कि इस विशाल अस्पताल परिसर की रखवाली के लिए स्वास्थ्य विभाग ने डॉक्टरों की जगह दो सुरक्षा गार्डों (Security Guards) को तैनात कर रखा है।
खंडहर में तब्दील हो रहा इंफ्रास्ट्रक्चर: ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल चालू न होने के कारण करोड़ों रुपये की लागत से खरीदे गए आधुनिक मेडिकल उपकरण, बेड, और सर्जिकल सामग्रियां कमरों में बंद-बंद ही खराब हो रही हैं। अस्पताल परिसर के पीछे झाड़ियां उग आई हैं और शाम ढलते ही यह पूरा इलाका अंधेरे के साए में डूब जाता है। डॉक्टरों और मरीजों की चहल-पहल की जगह अब यहां आवारा पशुओं और चूहों का बसेरा हो चुका है।
एक नज़र में: तोप गांव सीएचसी (CHC) की जमीनी हकीकत
| मुख्य बिंदु | प्रशासनिक और ग्राउंड डेटा |
|---|---|
| अस्पताल का स्थान | तोप गांव, दनियावां प्रखंड (बिहटा-सरमेरा रोड, पटना ग्रामीण) |
| कुल निर्माण लागत | लगभग 8 करोड़ रुपये |
| अस्पताल की क्षमता | 30 बेड (अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस) |
| उद्घाटन की तिथि | 21 फरवरी 2025 (तत्कालीन सीएम नीतीश कुमार द्वारा) |
| वर्तमान स्थिति | पूरी तरह बंद, केवल दो सुरक्षा गार्ड तैनात |
| मुख्य मांग | डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की तत्काल नियुक्ति |
मरीजों की नियति: 'पटना चलो' या प्राइवेट क्लीनिकों में लुटो!
तोप गांव और दनियावां के इस पूरे बेल्ट में कोई दूसरा बड़ा सरकारी अस्पताल नहीं है। इस वजह से इस पूरे इलाके के गरीब मरीजों के सामने दो ही रास्ते बचते हैं:
पीएमसीएच और एनएमसीएच की दौड़: यदि रात-बिरात किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है, या किसी को दिल का दौरा पड़ता है, या कोई सड़क दुर्घटना होती है, तो प्राथमिक उपचार तक के लिए मरीजों को 40 से 50 किलोमीटर दूर पटना के PMCH, NMCH या AIIMS ले जाना पड़ता है। कई बार तो अत्यधिक ट्रैफिक और दूरी के कारण मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
प्राइवेट डॉक्टरों की चांदी: इस सरकारी शून्यता का फायदा स्थानीय झोलाछाप डॉक्टर और निजी नर्सिंग होम उठा रहे हैं। गरीब ग्रामीणों को अपनी जमीन या गहने गिरवी रखकर निजी क्लीनिकों में महंगे दामों पर इलाज कराना पड़ रहा है।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा: "चुनाव में देंगे वोट की चोट"
अस्पताल को चालू कराने की मांग को लेकर तोप गांव के सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय युवाओं ने अब एक बड़ा आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी है। ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव और पटना के सिविल सर्जन को एक सामूहिक मांग पत्र भेजा है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कड़ा रुख:
"यह हमारे टैक्स के पैसों की सरेआम बर्बादी है। जब सरकार को यहां डॉक्टर और नर्स देने ही नहीं थे, तो 8 करोड़ रुपये फूंककर इस बिल्डिंग को क्यों खड़ा किया गया? क्या यह सिर्फ नेताओं के नाम की पट्टिका लगाने के लिए ड्रामा था? अगर एक महीने के भीतर इस अस्पताल में ओपीडी सेवा और डॉक्टरों की तैनाती नहीं की गई, तो हम सभी बिहटा-सरमेरा मुख्य मार्ग को पूरी तरह जाम करेंगे और आने वाले चुनावों का पूर्ण बहिष्कार करेंगे।"
क्या कहता है प्रशासनिक तंत्र? आश्वासन का पुराना राग
इस पूरे मामले पर जब पटना जिला स्वास्थ्य समिति और सिविल सर्जन कार्यालय से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो अधिकारियों ने हमेशा की तरह मानव संसाधन (Human Resources) की कमी का रोना रोया।
अधिकारियों का तर्क: स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों का कहना है कि बिहार में डॉक्टरों और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में एएनएम (ANM) व नर्सों के पदों पर बहाली की प्रक्रिया प्रक्रियाधीन है। तोप गांव सीएचसी के लिए पदों के सृजन (Post Creation) की फाइल राज्य मुख्यालय भेजी गई है।
आश्वासन: प्रशासन का दावा है कि वैकल्पिक व्यवस्था के तहत जल्द ही पास के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) से रोस्टर के आधार पर दो डॉक्टरों की प्रतिनियुक्ति (Deputation) कर यहां ओपीडी (OPD) सेवा शुरू कराने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि लोगों को तात्कालिक राहत मिल सके।
मुजफ्फरपुर से लेकर पटना ग्रामीण के दनियावां तक, स्वास्थ्य सेवाओं का यह ढांचागत खोखलापन नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा आईना है। तोप गांव में 8 करोड़ की लागत से बना यह भव्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश में इमारतें बनाना तो आसान है, लेकिन उनमें जीवन फूंकना (सेवाएं देना) आज भी फाइलों के जाल में फंसा हुआ है। तोप गांव के लोगों की मांग पूरी तरह जायज है। देखना यह है कि प्रशासन इस सोई हुई व्यवस्था को कब जगाता है और कब इस अस्पताल की शहनाई सचमुच मरीजों के लिए 'संजीवनी' बनती है!