मुजफ्फरपुर की सड़कों पर मौत का सामान! खुलेआम फेंके जा रहे इस्तेमाल किए गए इंजेक्शन, रुई और पट्टियां; जैविक अपशिष्ट से महामारी का खतरा, सिस्टम लापरवाह

 उत्तर बिहार के प्रमुख शहरों और कस्बों में इस वक्त एक ऐसा गंभीर और जानलेवा संकट मंडरा रहा है, जिसे अमूमन लोग देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। शहर की मुख्य सड़कों के किनारे, घनी आबादी वाले मोहल्लों और खाली पड़े प्लॉटों में अवैध रूप से बायो-मेडिकल वेस्ट (Bio-Medical Waste - जैविक अपशिष्ट) फेंका जा रहा है। अस्पतालों, प्राइवेट क्लीनिकों और अवैध पैथोलॉजी लैबों द्वारा इस्तेमाल किए गए खतरनाक इंजेक्शन, खून से सनी रुई, एक्सपायर्ड दवाइयां, सिरिंज और पट्टियां बिना किसी सुरक्षा मानकों के सरेआम कचरे के ढेरों पर फेंकी जा रही हैं।

यह स्थिति तब है जब केंद्र और राज्य सरकार कचरा प्रबंधन और स्वच्छता को लेकर हर साल करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च करती है। खुलेआम फेंका गया यह मेडिकल कचरा न सिर्फ पर्यावरण को दूषित कर रहा है, बल्कि शहर में हेपेटाइटिस-बी, सी, एचआईवी (HIV) और त्वचा संबंधी भयानक महामारियों को सीधा आमंत्रण दे रहा है।

इस गंभीर लापरवाही, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियमों की धज्जियां उड़ने और जनता की जान से हो रहे इस खिलवाड़ पर ग्राउंड जीरो से तैयार की गई विस्तृत खोजी रिपोर्ट (Investigative Report) नीचे दी गई है।

 ग्राउंड जीरो रिपोर्ट: सड़कों के किनारे कैसे सज रहा है 'मौत का बाजार'

अगर आप शहर के विभिन्न इलाकों का दौरा करेंगे, तो आपको सरकारी और निजी अस्पतालों के पीछे या मुख्य हाईवे के किनारे सफेद रंग के प्लास्टिक के बोरे फटे हुए मिलेंगे। इन बोरों के अंदर से जो चीजें निकलकर सड़कों पर बिखर रही हैं, वे किसी भी आम नागरिक के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी हैं।

खतरनाक सिरिंज और सुइयां : राह चलते राहगीरों और विशेषकर नंगे पैर घूमने वाले आवारा पशुओं या कचरा चुनने वाले मासूम बच्चों के पैरों में ये संक्रमित सुइयां चुभ रही हैं।

खून से सनी रुई और पट्टियां: ऑपरेशन या ड्रेसिंग के बाद फेंकी गई संक्रमित रुई और पट्टियां हवा के जरिए उड़कर लोगों के घरों तक पहुंच रही हैं। बरसात के दिनों में यह पानी में घुलकर पूरे इलाके के भूजल (Groundwater) को जहरीला बना रही हैं।

मानव अंग और सड़े हुए अवशेष: कुछ जगहों पर तो ऑपरेशन के बाद निकले मानव शरीर के अवशेषों को भी साधारण कचरे में फेंक दिया जाता है, जिसे आवारा कुत्ते और कौवे नोंचते हैं और पूरे मोहल्ले में बीमारी फैलाते हैं।

 कचरा चुनने वाले मासूम बच्चे: संक्रमण के सीधे निशाने पर

इस लापरवाही की सबसे पहली और सबसे दर्दनाक मार उन गरीब और बेसहारा बच्चों पर पड़ रही है जो सुबह-सुबह अपनी पीठ पर बोरा लादकर प्लास्टिक और कबाड़ चुनने निकलते हैं।

चश्मदीदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का बयान: "ये बच्चे बिना ग्लव्स (दस्ताने) या जूतों के इन कचरे के ढेरों को खंगालते हैं। कई बार उन्हें पता नहीं होता और वे इस्तेमाल की गई सिरिंज से खेलने लगते हैं या कबाड़ के चक्कर में सुई उनके हाथों में चुभ जाती है। यह सीधे तौर पर इन मासूमों को एड्स (AIDS) या हेपेटाइटिस जैसी लाइलाज बीमारियों के मुंह में धकेलने जैसा है।"

 क्या कहता है कानून? 'बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल' की धज्जियां उड़तीं

भारत सरकार के बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स (Bio-Medical Waste Management Rules, 2016) के तहत अस्पतालों के कचरे को नष्ट करने के कड़े और स्पष्ट नियम हैं। इसके तहत कचरे को चार रंगों की थैलियों में बांटना अनिवार्य है:

थैली का रंग (Bag Color)किस प्रकार का कचरा?नष्ट करने का सही तरीका
पीला (Yellow Bag)खून से सनी रुई, पट्टियां, मानव अंग, एक्सपायर्ड दवाएं।इसे सीधे भस्मीकरण (Incineration) यानी उच्च तापमान पर जलाया जाना चाहिए।
लाल (Red Bag)प्लास्टिक का कचरा जैसे ग्लूकोज की बोतलें, सिरिंज, ट्यूबिंग।इन्हें ऑटोक्लेव या रीसायकल करने से पहले रसायनों से विसंक्रमित करना जरूरी है।
नीला/सफेद (Blue/White)नुकीली चीजें, सुइयां, ब्लेड, कांच की शीशियां।इन्हें पंचर-प्रूफ कंटेनरों में डालकर सुरक्षित रूप से नष्ट करना होता है।

 

जमीनी हकीकत: निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के संचालक इस पूरी प्रक्रिया पर होने वाले खर्च (कचरा निस्तारण एजेंसी की फीस) को बचाने के लिए रात के अंधेरे में साधारण नगर निगम के कचरे के डिब्बे में या सड़कों के किनारे इसे फेंकवा देते हैं।

 नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रहस्यमयी चुप्पी

इस पूरे खेल में स्थानीय प्रशासन और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

साधारण कचरा गाड़ियों में लोडिंग: नियमानुसार, नगर निगम की सामान्य गाड़ियां इस मेडिकल कचरे को नहीं उठा सकतीं। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि सफाईकर्मी बिना किसी सुरक्षा किट के, हाथों से इस खतरनाक कचरे को सामान्य गीले-सूखे कचरे के साथ मिलाकर डंपिंग यार्ड में ले जाते हैं।

निरीक्षण का अभाव: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास यह जांचने का जिम्मा है कि किस अस्पताल के पास वैध लाइसेंस है और वह अपना कचरा कहां नष्ट कर रहा है। लेकिन महीनों तक किसी भी नर्सिंग होम या पैथोलॉजी लैब का औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) नहीं किया जाता, जिससे इनके हौसले बुलंद हैं।

 जनता में भारी आक्रोश: "महामारी फैली तो जिम्मेदार कौन?"

सड़कों के किनारे फेंके जा रहे इस जैविक अपशिष्ट के कारण स्थानीय निवासियों में भारी गुस्सा व्याप्त है। लोगों का कहना है कि शाम होते ही इस कचरे से इतनी भयानक बदबू उठती है कि घरों की खिड़कियां बंद करनी पड़ती हैं। आवारा जानवर इस कचरे को घसीटकर बीच सड़क पर ले आते हैं, जिससे बाइक और साइकिल सवारों के दुर्घटनाग्रस्त होने और संक्रमित होने का खतरा हर सेकंड बना रहता है।

स्थानीय नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने अगले एक हफ्ते के भीतर इस अवैध डंपिंग को नहीं रोका और संबंधित अस्पतालों को चिन्हित कर उन पर भारी जुर्माना नहीं लगाया, तो वे उग्र आंदोलन और सड़क जाम करने को मजबूर होंगे।

 सड़कों के किनारे फेंका जा रहा यह मेडिकल कचरा महज एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह एक सामूहिक आपराधिक कृत्य (Criminal Act) है। अस्पताल जीवन देने के लिए होते हैं, लेकिन चंद रुपयों की बचत के लिए इस तरह मौत का सामान सड़कों पर बिखेरना मानवता के खिलाफ अपराध है। स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन को तुरंत एक्शन में आना चाहिए। सीसीटीवी कैमरों की मदद से रात में कचरा फेंकने वाले वाहनों को जब्त किया जाए और ऐसे अस्पतालों के लाइसेंस रद्द किए जाएं, तभी जाकर हमारे शहर और हमारे बच्चे इस अदृश्य मौत के जाल से सुरक्षित रह पाएंगे!