स्वास्थ्य विभाग का बड़ा फैसला; मेडिकल कॉलेजों को भेजी जाएंगी 'एक्सपायरी के करीब' वाली दवाएं, जिलों में खपत सुनिश्चित करने के निर्देश

पटना: बिहार स्वास्थ्य विभाग ने राज्य की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था में दवाओं के प्रबंधन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक निर्णय लिया है। विभाग ने निर्देश जारी किया है कि जिन दवाओं की एक्सपायरी तिथि (Expiry Date) नजदीक है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर मेडिकल कॉलेजों को भेजा जाए। स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि मेडिकल कॉलेजों में मरीजों की संख्या और दवाओं की खपत अन्य स्वास्थ्य केंद्रों की तुलना में कहीं अधिक होती है, इसलिए इन दवाओं का उपयोग समय रहते सुनिश्चित किया जा सकेगा।

दवाओं की बर्बादी रोकने की कवायद

अक्सर देखा जाता है कि जिलों के छोटे अस्पतालों या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में दवाओं की खपत कम होने के कारण वे एक्सपायर हो जाती हैं, जिससे सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दवाओं की बर्बादी को शून्य करने के लिए यह 'रिलोकेशन' (पुनर्निर्धारण) नीति अपनाई गई है।

अब नई व्यवस्था के तहत, दवाओं की एक्सपायरी तिथि पर नजर रखने के लिए एक केंद्रीकृत डैशबोर्ड का उपयोग किया जाएगा। जिन दवाओं की वैधता अगले 3 से 6 महीने के भीतर समाप्त होने वाली है, उन्हें चिह्नित कर तुरंत उन संस्थानों में भेजा जाएगा जहां मरीजों का अधिक दबाव है।

मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पतालों के लिए नई गाइडलाइन

स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया है कि:

मेडिकल कॉलेज प्राथमिकता: चूंकि मेडिकल कॉलेजों में ओपीडी (OPD) और इमरजेंसी में प्रतिदिन हजारों मरीज पहुंचते हैं, इसलिए एक्सपायरी के करीब वाली दवाओं की खपत यहां बहुत तेजी से होती है।

अन्य जिलों में वितरण: जिन जिलों में मेडिकल कॉलेज नहीं हैं, वहां के सिविल सर्जन को निर्देश दिया गया है कि वे अपने जिला अस्पताल या अधिक रोगी संख्या वाले स्वास्थ्य केंद्रों की पहचान करें और इन दवाओं को वहां भेजें ताकि उनकी समय पर खपत हो सके।

निगरानी तंत्र: विभाग ने सभी जिला दवा भंडार प्रभारियों को निर्देश दिया है कि वे स्टॉक का साप्ताहिक मिलान करें और एक्सपायरी के करीब वाली दवाओं की सूची हर 15 दिनों में मुख्यालय को भेजें।

गुणवत्ता और मानक पर विभाग का स्पष्टीकरण

दवाओं के इस स्थानांतरण को लेकर विभाग ने स्पष्ट किया है कि इसका मतलब यह नहीं है कि मरीजों को पुरानी या खराब दवाएं दी जा रही हैं। अधिकारी ने कहा, "एक्सपायरी तिथि से पहले दवा पूरी तरह से प्रभावी और सुरक्षित होती है। हम केवल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन (Resource Optimization) कर रहे हैं ताकि सरकारी धन का दुरुपयोग न हो और किसी भी मरीज को दवा के अभाव में बाहर से दवा न खरीदनी पड़े।"

चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को निर्देश

विभाग ने डॉक्टरों से अपील की है कि वे ओपीडी में मरीजों को दवाएं लिखते समय स्टॉक की उपलब्धता को प्राथमिकता दें। साथ ही, फार्मासिस्टों को निर्देश दिया गया है कि वे 'फर्स्ट इन, फर्स्ट आउट' (FIFO) यानी जो दवा पहले आई है, उसे पहले इस्तेमाल करने के नियम का कड़ाई से पालन करें।

सुधार की उम्मीद

स्वास्थ्य विभाग के इस कदम का स्वागत करते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसे पूरी पारदर्शिता के साथ लागू किया गया, तो न केवल सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बोझ कम होगा, बल्कि अस्पतालों में 'शॉर्टेज' की समस्या भी दूर होगी। राज्य के सभी सिविल सर्जनों को 48 घंटे के भीतर अपने जिले के स्टॉक की रिपोर्ट साझा करने का आदेश दिया गया है।