सालभर करते हैं मजदूरी या अन्य काम, लेकिन 'सावन' आते ही कांवरियों की सेवा और कमाई के लिए सज जाती है इनकी खास दुकानें
भागलपुर/सुल्तानगंज: सनातन संस्कृति और आस्था के महापर्व 'सावन' के महीने में देवघर और बासुकीनाथ जाने वाले कांवरियों का सैलाब पूरे बिहार और झारखंड की सड़कों पर उमड़ पड़ता है। उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसे सुल्तानगंज से लेकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक हर तरफ केसरिया रंग और 'बम-बम भोले' की गूंज सुनाई देती है। लेकिन इस आध्यात्मिक उल्लास के पीछे एक और बड़ी सच्चाई छिपी है, जो उन छोटे दुकानदारों और मौसमी व्यवसायियों की है, जो पूरे साल चाहे जो भी काम करें, लेकिन सावन के दो महीनों में अपनी मेहनत और कारोबार के दम पर पूरे साल की आजीविका का गणित बिठा लेते हैं। यहां तक कि कई दुकानदार तो इस सीजन में तरह-तरह की पूजन सामग्री, कपड़े और कांवर की वस्तुएं बेचने के लिए अपनी जमीन गिरवी रखने या कर्ज लेने तक से नहीं हिचकिचाते।
सालभर का इंतजार और सावन में 'व्यावसायिक क्रांति'
भागलपुर, सुल्तानगंज, और बांका के रास्ते देवघर जाने वाले मुख्य मार्गों पर सावन के सीजन में हजारों की संख्या में अस्थायी दुकानें सज जाती हैं। इनमें से अधिकांश दुकानदार ऐसे होते हैं जो साल के बाकी 10 महीने खेती-किसानी, दिहाड़ी मजदूरी, ऑटो चलाना, या छोटे-मोटे अन्य निजी कार्य करते हैं। लेकिन जैसे ही सावन का महीना नजदीक आता है, उनकी पूरी जीवनशैली बदल जाती है।
इन मौसमी दुकानदारों के लिए सावन का महीना किसी बड़े त्योहारी उत्सव से कम नहीं होता। वे महीनों पहले से इस बात की योजना बनाते हैं कि इस बार वे दुकान पर क्या बेचेंगे—जैसे कि भगवा वस्त्र, पीतांबर, कांवर के डंडे, रुद्राक्ष की मालाएं, अगरबत्ती, धूप, पूजा की थालियां, और तरह-तरह के श्रृंगार व सुरक्षा सामान। इन दो महीनों में होने वाली कमाई ही उनके परिवार के अगले कई महीनों के भरण-पोषण, बच्चों की पढ़ाई और शादियों जैसे खर्चों का मुख्य आधार बनती है।
पूंजी जुटाने के लिए जमीन गिरवी रखने या कर्ज लेने तक को मजबूर होते हैं दुकानदार
इस व्यवसाय का एक कड़वा सच यह भी है कि सावन में दुकान सजाने के लिए भारी-भरकम पूंजी (Investment) की आवश्यकता होती है। चूंकि साल के बाकी महीनों में इन छोटे दुकानदारों की आय बहुत सीमित या न के बराबर होती है, इसलिए सावन के स्टॉक (माल) को खरीदने के लिए उनके पास पर्याप्त नकदी नहीं होती।
स्थानीय दुकानदारों से बातचीत करने पर एक बेहद मार्मिक और चौंकाने वाला पहलू सामने आता है। अपनी दुकान सजाने और थोक में सामान खरीदने के लिए कई गरीब दुकानदार स्थानीय साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेने को मजबूर होते हैं। स्थिति यहां तक आ जाती है कि कई परिवार अपनी छोटी-मोटी जमीन का टुकड़ा या जेवरात (मृतिका/गिरवी रखकर या बेचकर) साहूकारों के पास गिरवी रख देते हैं या बेच देते हैं, ताकि वे सावन के बाजार में उतर सकें।
एक मौसमी दुकानदार, जो सुल्तानगंज में पिछले 15 सालों से कांवरियों की दुकानें लगाता है, नाम न छापने की शर्त पर बताता है, "सावन में दुकानदारी करने के लिए कम से कम 50 हजार से 2 लाख रुपये की पूंजी चाहिए होती है। बैंक हमें आसानी से लोन देते नहीं, इसलिए गांव के महाजनों से ऊंचे ब्याज पर पैसे उठाने पड़ते हैं या अपनी थोड़ी बहुत जमीन गिरवी रखनी पड़ती है। अगर सावन अच्छा निकल गया और बारिश या अन्य कारणों से बाधा नहीं आई, तो कर्ज चुक जाता है, वरना सालभर कर्ज के जाल में फंसे रहना पड़ता है।"
मौसम की मार और रिस्क का खेल
सावन के महीने में व्यापार करना मुनाफे का सौदा तो है, लेकिन इसमें जोखिम भी उतना ही बड़ा होता है। यह पूरा कारोबार पूरी तरह से मौसम और प्रशासन की व्यवस्था पर निर्भर करता है:
बारिश और कीचड़: यदि सावन के महीने में लगातार मूसलाधार बारिश होती है, तो घाटों और सड़कों पर कीचड़ फैल जाता है, जिससे कई बार कांवरियों की संख्या में अस्थायी गिरावट आ जाती है। ऐसे में दुकानदारों का रखा हुआ सामान (खासकर कपड़े और पूजा सामग्री) खराब होने का खतरा रहता है।
प्रशासनिक पाबंदियां: कई बार ट्रैफिक डायवर्जन या सुरक्षा कारणों से दुकानों को तय जगह से हटाने का दबाव होता है, जिससे बिक्री प्रभावित होती है।
उधार का जोखिम: कई बार स्थानीय खरीदार या कम पूंजी वाले व्यापारी आपस में उधार का सौदा करते हैं, जो समय पर न मिलने पर छोटे दुकानदारों की कमर तोड़ देता है।
आस्था के सहारे उम्मीदों की उड़ान
तमाम कठिनाइयों, कर्ज के बोझ और मौसम की अनिश्चितताओं के बावजूद इन छोटे दुकानदारों के चेहरे पर सावन के आते ही एक अलग ही चमक और उम्मीद दिखाई देती है। वे दिन-रात एक करके अपनी दुकानों पर ग्राहकों का इंतजार करते हैं। सुबह तड़के से लेकर देर रात तक कांवरियों की सेवा और उनकी जरूरत के सामान उपलब्ध कराने में वे अपनी सारी थकान भूल जाते हैं।
यह कहानी सिर्फ एक दुकान या एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि यह उन हजारों मेहनतकश परिवारों की गाथा है जो धर्म, आस्था और अपनी आजीविका के पहिए को एक साथ खींचते हैं। सालभर मजدूरी या अन्य छोटे-मोटे काम करने वाले ये लोग सावन में जब दुकानदारी करते हैं, तो वे केवल सामान नहीं बेचते, बल्कि अपनी उम्मीदों और परिवार के बेहतर भविष्य का सपना बुनते हैं। सावन का यह पावन महीना उनके जीवन में आर्थिक संघर्ष और धार्मिक आस्था का एक ऐसा अनूठा संगम लेकर आता है, जो सालभर के अंधेरे को दूर करने के लिए रोशनी की एक किरण साबित होता है।