विक्रमशिला सेतु के ध्वस्त होने से बढ़ा संकट; गंगा घाटों पर रैंप और व्यवस्थित नावों के अभाव में यात्रियों की बढ़ी मुसीबतें

भागलपुर: भागलपुर और नवगछिया को जोड़ने वाली जीवन रेखा—विक्रमशिला सेतु—पर आया संकट अब एक विकराल आपदा का रूप ले चुका है। मई 2026 की शुरुआत में सेतु के पिलर संख्या 133 के समीप एक बड़ा कंक्रीट स्लैब गंगा नदी में समा जाने के बाद से ही इस पुल पर यातायात पूरी तरह से बंद है। पुल के बंद होने के बाद प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था तो की है, लेकिन गंगा घाटों पर बुनियादी सुविधाओं, विशेषकर व्यवस्थित रैंप और पर्याप्त नावों के अभाव ने आम नागरिकों और यात्रियों के जीवन को दुश्वारियों से भर दिया है।

पुल टूटने के बाद की भयावह स्थिति

4 मई 2026 की देर रात जब 4.7 किलोमीटर लंबे इस पुल का एक हिस्सा टूटकर गंगा में गिरा, तो पूरे क्षेत्र में दहशत फैल गई। गनीमत रही कि प्रशासन की सतर्कता के कारण समय रहते लोगों को वहां से हटा लिया गया, जिससे कोई जान-माल का नुकसान नहीं हुआ। हालांकि, इस घटना ने उत्तर और दक्षिण बिहार के बीच के मुख्य संपर्क मार्ग को काट दिया है।

अब भागलपुर से नवगछिया जाने के लिए लोगों को गंगा नदी पार करने हेतु नावों का सहारा लेना पड़ रहा है, लेकिन घाटों की स्थिति बद से बदतर है।

गंगा घाटों पर सुविधाओं का घोर अभाव

पुल टूटने के बाद यात्रियों का दबाव अचानक गंगा घाटों पर बढ़ गया है। स्थिति यह है कि:

रैंप का न होना: गंगा के अधिकांश घाटों पर नावों तक पहुँचने के लिए कोई व्यवस्थित रैंप या पक्का मार्ग नहीं है। फिसलन भरी मिट्टी और कीचड़ के कारण वृद्धों, बीमारों और स्कूली बच्चों को नाव पर चढ़ने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है।

सुरक्षा के इंतजाम नदारद: भारी भीड़ के बीच नावों के संचालन के दौरान सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं दिख रहे हैं। अचानक बढ़ी भीड़ को संभालने के लिए न तो घाटों पर पर्याप्त रोशनी है और न ही प्रशिक्षित कर्मी।

अव्यवस्था का आलम: घाटों पर नावों की कमी के कारण लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। कई बार नावों में क्षमता से अधिक यात्रियों को बिठाया जाता है, जिससे हमेशा दुर्घटना का भय बना रहता है।

यात्रियों का दर्द: ड्यूटी और स्वास्थ्य पर असर

पुल के बंद होने से उन लोगों की सबसे अधिक फजीहत हो रही है जो रोजमर्रा के काम से एक छोर से दूसरे छोर जाते हैं। शिक्षिका पूजा कुमारी जैसे कई लोग, जो हर दिन ड्यूटी के लिए पुल का उपयोग करते थे, अब या तो छुट्टियां लेने को मजबूर हैं या जान जोखिम में डालकर नाव से सफर करने को।

यात्रियों का कहना है कि प्रशासन ने एहतियात के तौर पर पुल तो बंद कर दिया, लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था (Alternative Arrangement) के नाम पर केवल खानापूर्ति की है। घाटों पर न तो नावों की संख्या बढ़ाई गई है और न ही रैंप बनाकर राह आसान की गई है।

प्रशासनिक उदासीनता और यातायात का बोझ

विक्रमशिला सेतु के बंद होने से केवल गंगा घाट ही नहीं, बल्कि वैकल्पिक मार्गों पर भी भारी दबाव है। सेतु के दोनों छोरों पर अक्सर भीषण जाम की स्थिति बन जाती है। कई बार यात्रियों को सेतु के पास जाम में फंसने के बजाय पैदल ही लंबा सफर तय करना पड़ रहा है।

प्रशासन का कहना है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और पुल की मरम्मत की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, लेकिन जनता का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। नागरिकों की प्रमुख मांग है कि जब तक पुल दुरुस्त नहीं हो जाता, तब तक:

व्यवस्थित रैंप का निर्माण: सभी प्रमुख गंगा घाटों पर पक्के रैंप बनाए जाएं ताकि आम नागरिक आसानी से नाव तक पहुंच सकें।

सुरक्षित और पर्याप्त नाव: परिचालन के लिए बड़ी और सुरक्षित नावों की संख्या में इजाफा किया जाए।

यातायात प्रबंधन: जाम की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए घाटों के आसपास पुलिस बलों की तैनाती बढ़ाई जाए।

 समाधान की दरकार

विक्रमशिला सेतु का ढहना केवल एक तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे की अनदेखी का परिणाम है। जब तक सेतु बहाल नहीं होता, तब तक गंगा घाट ही एकमात्र जरिया हैं। प्रशासन को यह समझना होगा कि घाटों की अव्यवस्था और रैंप का अभाव किसी बड़ी दुर्घटना को निमंत्रण दे रहा है। भागलपुर की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है; उन्हें त्वरित, सुरक्षित और व्यवस्थित वैकल्पिक व्यवस्था की दरकार है।