मायागंज रक्त केंद्र में 'रक्तदान के नाम पर कारोबार', जांच के घेरे में अस्पताल प्रबंधन
भागलपुर: जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (जेएलएनएमसीएच), जिसे स्थानीय रूप से 'मायागंज अस्पताल' के नाम से जाना जाता है, एक बार फिर शर्मसार हुआ है। मरीजों की जान बचाने के लिए बने अस्पताल के रक्त केंद्र (ब्लड बैंक) में दलालों का जाल फिर से फैल गया है। खबर है कि रक्त केंद्र के इर्द-गिर्द दलालों का एक संगठित गिरोह सक्रिय है, जो जरूरतमंद मरीजों के परिजनों से रक्त उपलब्ध कराने के नाम पर अवैध वसूली कर रहा है।
क्या है पूरा मामला?
अस्पताल के सूत्रों के अनुसार, दलाल गिरोह उन मरीजों के परिजनों को अपना शिकार बनाते हैं जिन्हें आपात स्थिति में तुरंत रक्त की आवश्यकता होती है। जब कोई लाचार परिजन काउंटर पर जाता है, तो उसे अक्सर "रक्त की कमी" या "प्रोसेसिंग में समय लगेगा" जैसी बातें कहकर टरका दिया जाता है। इसी बीच, अस्पताल परिसर में घात लगाए बैठे दलाल उनसे संपर्क साधते हैं और मोटी रकम लेकर रक्त की व्यवस्था कराने का 'वादा' करते हैं।
इस पूरे खेल में अस्पताल के कुछ निचले स्तर के कर्मियों की संलिप्तता से भी इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि दलालों को यह जानकारी तुरंत मिल जाती है कि किस ब्लड ग्रुप की मांग आई है और कौन सा परिजन परेशान है।
हैरान करने वाली कार्यप्रणाली
दलालों का यह नेटवर्क बेहद चालाकी से काम करता है:
मरीज के परिजनों को भ्रमित करना: काउंटर से मायूस होकर लौटने वाले परिजनों को दलाल एकांत में ले जाते हैं और अस्पताल की व्यवस्था की खामियों का डर दिखाते हैं।
रक्त के नाम पर अवैध वसूली: एक यूनिट रक्त के लिए दलाल गरीब परिजनों से 2,000 से 5,000 रुपये तक वसूल रहे हैं, जबकि सरकारी नियमों के अनुसार रक्त की प्रोसेसिंग फीस नाममात्र होती है।
बिचौलियों का गठजोड़: अक्सर ये दलाल अस्पताल के अंदर ही सक्रिय रहते हैं, जिससे मरीजों को लगता है कि ये लोग अस्पताल प्रशासन से जुड़े हैं और वे बिना सोचे-समझे उन्हें पैसे दे देते हैं।
प्रशासनिक चुप्पी और व्यवस्था की विफलता
मायागंज अस्पताल में रक्त की किल्लत की समस्या पुरानी है, लेकिन इस 'रक्त के व्यापार' ने प्रशासन की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्षों से अस्पताल प्रबंधन द्वारा दावे किए जाते हैं कि "रक्त की कोई कमी नहीं है", फिर भी दलाल सक्रिय कैसे हैं?
वरिष्ठ चिकित्सकों का कहना है कि दलाल अक्सर 'स्वैच्छिक रक्तदान' के नाम पर डोनर लाते हैं, लेकिन वास्तव में वे परिजनों को ही डोनर बनाने के लिए मजबूर करते हैं या बाहर से डोनर लाकर उनसे पैसे ऐंठते हैं। यह पूरी प्रक्रिया न केवल अनैतिक है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के मूल उद्देश्यों के खिलाफ है।
रक्त केंद्र की सुरक्षा और पारदर्शिता पर सवाल
अस्पताल के ब्लड बैंक में सीसीटीवी कैमरों के दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन दलालों की बेरोकटोक आवाजाही यह साबित करती है कि सुरक्षा व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है।
निगरानी का अभाव: ब्लड बैंक के पास तैनात सुरक्षाकर्मियों की भूमिका भी संदेह के दायरे में है।
डेटा प्रबंधन: रक्त की स्टॉक रिपोर्ट पारदर्शी तरीके से डिस्प्ले नहीं की जाती, जिससे दलालों को झूठ बोलने का मौका मिलता है कि "स्टॉक खाली है"।
कार्रवाई की मांग और भविष्य की चुनौती
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया है। सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने अस्पताल अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि:
रक्त केंद्र के आसपास पुलिस की तैनाती बढ़ाई जाए।
रक्त लेने आने वाले परिजनों के लिए 'टोकन सिस्टम' और 'रक्त उपलब्धता डिस्प्ले बोर्ड' अनिवार्य किया जाए।
दलालों के नेटवर्क की पहचान कर उन पर कानूनी कार्रवाई की जाए।
अस्पताल अधीक्षक ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच समिति बनाने का आश्वासन दिया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह जांच केवल फाइलों तक सिमटकर रह जाएगी या वास्तव में दलालों का यह नेटवर्क ध्वस्त हो पाएगा?
मानवता के नाम पर कलंक
रक्तदान को महादान माना जाता है, लेकिन मायागंज अस्पताल में इसे 'कारोबार' बना दिया गया है। जब कोई गरीब मरीज जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा होता है, तब ऐसे दलालों की सक्रियता मानवता के माथे पर कलंक है। मायागंज अस्पताल के प्रशासन को यह समझना होगा कि यदि वे इस दलाल-राज को नहीं रोक पाए, तो आम जनता का सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।