धान की रोपनी पर लगा ब्रेक, चिलचिलाती धूप में सूख रहे पौधे; बोरिंग का सहारा भी नाकाफी

शाहकुंड (भागलपुर): भागलपुर जिले के शाहकुंड प्रखंड और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। सावन का महीना करीब होने के बावजूद मानसून की बेरुखी और चिलचिलाती धूप ने किसानों के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खींच दी हैं। धान की रोपनी (Transplantation), जो अब तक जोरों पर होनी चाहिए थी, वर्षा के अभाव में पूरी तरह से ठप पड़ गई है। जिन किसानों ने कर्ज लेकर या अपनी जमा-पूंजी लगाकर धान के बिचड़े (नर्सरी) तैयार किए थे, वे अब तेज धूप और भीषण गर्मी के कारण खेतों में ही पीले पड़कर सूख रहे हैं।

आसमान से बरस रही आग, खेतों में पड़ रहीं दरारें

धान की खेती मुख्य रूप से पानी पर निर्भर करती है। आमतौर पर इस समय तक खेतों में लबालब पानी भरा होना चाहिए था और महिला-पुरुष मजदूर धान के पौधे रोपते नजर आने चाहिए थे। लेकिन, इस वर्ष स्थिति बिल्कुल विपरीत है।

सूखते खेत: बारिश न होने के कारण खेतों की नमी पूरी तरह खत्म हो गई है और मिट्टी में चौड़ी दरारें पड़ गई हैं।

पौधों का रुकता विकास: तेज धूप और लू के थपेड़ों के कारण नर्सरी में तैयार धान के पौधों का विकास (Growth) रुक गया है। पौधे न केवल छोटे रह गए हैं, बल्कि उनका रंग भी हरा से पीला और भूरा होने लगा है।

उचित समय का निकलना: कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, धान के बिचड़े 21 से 25 दिन के भीतर खेतों में रोप दिए जाने चाहिए। समय सीमा पार होने के बाद रोपे गए धान में कल्लों (Tillers) का विकास ठीक से नहीं हो पाता, जिससे अंततः पैदावार में भारी गिरावट आती है।

बोरिंग और पंपसेट का सहारा, लेकिन वह भी बेअसर

प्रतिकूल मौसम को देखते हुए कुछ संपन्न और प्रगतिशील किसानों ने निजी बोरिंग और डीजल पंपसेट के सहारे धान की रोपनी शुरू की है। लेकिन यह प्रयास भी 'ऊंट के मुंह में जीरा' साबित हो रहा है।

किसानों का कहना है कि वे रात भर पंपसेट चलाकर खेतों को पानी से भरते हैं, लेकिन दिन में सूरज की तपिश इतनी अधिक होती है कि दोपहर होते-होते खेत का सारा पानी भाप बनकर उड़ जाता है और खेत फिर से सूख जाते हैं। खेत सूखने के कारण रोपे गए धान के नए पौधे भी मुरझाने लगे हैं, जिससे किसानों की मेहनत और पैसा दोनों पानी में जा रहे हैं।

किसानों पर बढ़ता आर्थिक बोझ

शाहकुंड इलाके के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं, जिनकी आजीविका पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है। इस सूखे जैसी स्थिति ने उनकी आर्थिक कमर तोड़ कर रख दी है।

महंगा डीजल: लगातार पंपसेट चलाने के लिए भारी मात्रा में डीजल की आवश्यकता हो रही है, जिससे खेती की लागत (Input Cost) कई गुना बढ़ गई है।

मजदूरों का संकट: खेत में पानी न टिकने के कारण मजदूर भी रोपनी करने से कतरा रहे हैं, क्योंकि सूखी मिट्टी में पौधे रोपना अत्यंत कठिन होता है।

कर्ज का जाल: कई किसानों ने खाद, बीज और खेत की जुताई के लिए साहूकारों या बैंकों से कर्ज लिया था। अब फसल बर्बाद होने के डर से उन्हें कर्ज चुकाने की चिंता सताने लगी है।

कृषि विभाग की सलाह और किसानों की मांग

वर्तमान स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को कुछ एहतियाती कदम उठाने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक पर्याप्त वर्षा न हो, तब तक बड़े पैमाने पर रोपनी से बचना चाहिए। बिचड़ों को बचाने के लिए शाम के समय हल्की सिंचाई करने की सलाह दी गई है।

दूसरी ओर, शाहकुंड के किसानों ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से तत्काल सहायता की गुहार लगाई है। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

डीजल अनुदान: सरकार अविलंब किसानों के लिए डीजल अनुदान (Diesel Subsidy) की घोषणा करे ताकि वे बोरिंग के माध्यम से अपनी फसल बचा सकें।

निर्बाध बिजली आपूर्ति: कृषि फीडर से कम से कम 12 से 15 घंटे निर्बाध बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए ताकि बिजली चालित मोटर पंपों का उपयोग किया जा सके।

सूखा प्रभावित क्षेत्र की घोषणा: यदि अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश नहीं होती है, तो प्रखंड का सर्वेक्षण कराकर इसे सूखाग्रस्त घोषित किया जाए और किसानों को उचित मुआवजा दिया जाए।

 वरुण देव की कृपा का इंतजार

शाहकुंड के किसानों के लिए वर्तमान समय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। खेती किसानी केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यदि धान की फसल प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर न केवल किसानों की थाली पर पड़ेगा, बल्कि बाजारों में भी अनाज की कीमतों में उछाल देखने को मिलेगा। अब किसानों की आखिरी उम्मीद वरुण देव (बारिश के देवता) और सरकारी मदद पर टिकी है। देखना यह है कि क्या आने वाले दिनों में मानसून मेहरबान होता है, या फिर किसानों को एक और भयानक सूखे का सामना करना पड़ेगा।