जिले के 39 सरकारी स्कूल दो अलग-अलग पालियों में संचालित, 12 स्कूल सुबह 6:30 से और 27 स्कूल 7 बजे से हो रहे हैं शुरू

बिहार के शिक्षा विभाग और मुजफ्फरपुर जिले की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। जिले में बुनियादी सुविधाओं और आधारभूत संरचनाओं की कितनी कमी है, इसकी बानगी सरकारी स्कूलों की वर्तमान स्थिति को देखकर साफ लगाई जा सकती है। मुजफ्फरपुर जिले में कमरों (क्लासूम्स) की भीषण कमी के कारण मजबूरन 39 सरकारी स्कूलों को दो अलग-अलग पालियों (टू-शिफ्ट) में चलाना पड़ रहा है। जगह के अभाव और छात्रों की अधिक संख्या के चलते प्रशासन को यह अनोखा और बाध्यकारी कदम उठाना पड़ा है, जिससे छात्र-छात्राओं और शिक्षकों की दैनिक जीवनचर्या पर भी असर पड़ रहा है।

क्या है पूरा मामला? कमरों की कमी बना बड़ा संकट

यह पूरा मामला मुजफ्फरपुर जिले के विभिन्न ग्रामीण और शहरी इलाकों के सरकारी विद्यालयों से जुड़ा है। राज्य सरकार और शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और बच्चों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है।

कमरों का अभाव: जिले के कई ऐसे स्कूल हैं जहां नामांकित विद्यार्थियों की संख्या तो हजारों में है, लेकिन बैठने के लिए पर्याप्त संख्या में कमरे (क्लासरूम) उपलब्ध नहीं हैं। एक ही कमरे में दो-दो कक्षाओं के संचालन या जगह की तंगी के कारण पढ़ाई प्रभावित हो रही थी।

दो पालियों की व्यवस्था: इस विकट समस्या से निपटने और बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन के समन्वय से इन विद्यालयों में दो पालियों (Shifts) में कक्षाएं चलाने का निर्णय लिया गया।

दो पालियों में बंटे जिले के 39 स्कूल

आंकड़ों के मुताबिक, मुजफ्फरपुर जिले के कुल 39 सरकारी स्कूलों को इस दो-पाली व्यवस्था के तहत चलाया जा रहा है, जिन्हें दो अलग-अलग समय सारणी (Timings) में बांटा गया है:

सुबह 6:30 बजे से शुरू होने वाले स्कूल: जिले के कुल 12 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जिन्हें सुबह सबसे पहले यानी 6:30 बजे से संचालित किया जा रहा है, ताकि पहली पाली के छात्रों की कक्षाएं समय पर पूरी हो सकें।

सुबह 7:00 बजे से शुरू होने वाले स्कूल: इसके अलावा, शेष 27 सरकारी स्कूल सुबह 7:00 बजे से अपनी पहली पाली की शुरुआत कर रहे हैं।

इन अलग-अलग समय-सारणियों के कारण सुबह के वक्त बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों को आवागमन में भी काफी भागदौड़ करनी पड़ रही है।

छात्र-छात्राओं और अभिभावकों की बढ़ रही परेशानियां

कमरों की कमी के कारण लागू की गई इस दो-पाली व्यवस्था से भले ही स्कूलों का संचालन किसी तरह संभव हो पा रहा हो, लेकिन इसके व्यावहारिक पहलुओं के कारण बच्चों और उनके अभिभावकों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

समय का बंधन और दूरी: जो स्कूल सुबह 6:30 बजे या 7:00 बजे से संचालित हो रहे हैं, उनके लिए दूर-दराज के गांवों से आने वाले बच्चों को बहुत सुबह उठकर तैयार होना पड़ता है। खासकर ग्रामीण इलाकों की बालिकाओं और छोटे बच्चों के लिए इतनी सुबह स्कूल पहुँचना कई बार सुरक्षित और सुगम नहीं होता।

शिक्षकों पर दबाव: एक ही स्कूल को दो अलग-अलग पालियों में चलाने के कारण शिक्षकों की कार्य अवधि और प्रशासनिक प्रबंधन पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। कई बार एक ही शिक्षक को दोनों पालियों में अपनी सेवाएं देनी पड़ती हैं, जिससे वे थकान और मानसिक तनाव का शिकार होते हैं।

शिक्षा व्यवस्था पर सवाल और बुनियादी ढांचे की दरकार

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सरकारी स्कूलों की आधारभूत संरचना (Infrastructure) और विकास के दावों की पोल खोल कर रख दी है।

फंड के उपयोग पर सवाल: जानकारों और स्थानीय बुद्धिजीवियों का कहना है कि सरकार द्वारा शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए के बजट का प्रावधान किया जाता है, लेकिन धरातल पर स्कूलों में कमरों की ऐसी कमी यह दर्शाती है कि या तो योजनाओं का क्रियान्वयन सही से नहीं हुआ या फिर धन का सदुपयोग नहीं हो पाया।

स्थाई समाधान की मांग: शिक्षाविदों और अभिभावकों ने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से मांग की है कि केवल दो पालियों की अस्थायी व्यवस्था करने के बजाय, इन 39 स्कूलों में अतिरिक्त कमरों (Classrooms) का निर्माण जल्द से जल्द कराया जाए। जब तक नए भवनों या कमरों का निर्माण नहीं होता, तब तक बच्चों की शिक्षा सुचारू रूप से चलाना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।