बिहार में चीनी उद्योग को बढ़ावा देने की तैयारी, 10 मिलों को 809 लाख क्विंटल गन्ना पेराई का लक्ष्य; पश्चिम चंपारण की 5 मिलों पर सबसे बड़ा भार

पटना। बिहार सरकार ने गन्ना उद्योग को बढ़ावा देने और चीनी मिलों की कार्यक्षमता बढ़ाने की दिशा में 2026-27 पेराई सत्र के लिए बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। राज्य में फिलहाल कार्यशील 10 चीनी मिलों को मिलाकर कुल 809 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई का लक्ष्य दिया गया है। इस लक्ष्य के साथ सरकार ने न केवल चीनी मिलों की उत्पादन क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने की तैयारी की है, बल्कि उन जिलों में भी गन्ने की खेती को प्रोत्साहित करने की योजना बनाई है, जहां फिलहाल कोई चीनी मिल संचालित नहीं हो रही है।

इस वर्ष निर्धारित पेराई लक्ष्य में पश्चिम चंपारण जिले की पांच चीनी मिलों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। इन पांच मिलों को संयुक्त रूप से 526 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई का लक्ष्य दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि बिहार के गन्ना और चीनी उद्योग में पश्चिम चंपारण की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनी हुई है।

दिलचस्प बात यह है कि 2025-26 के पेराई सत्र में इन्हीं पांच चीनी मिलों ने मिलकर करीब 569 लाख क्विंटल से कुछ अधिक गन्ने की पेराई की थी। ऐसे में इस बार निर्धारित लक्ष्य को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि पिछले सत्र की वास्तविक पेराई की तुलना में अलग-अलग मिलों को कितना लक्ष्य दिया गया है और कुल राज्य स्तरीय लक्ष्य में बढ़ोतरी किस आधार पर की गई है।

सरकार के अनुसार इस बार लक्ष्य में अप्रत्याशित बढ़ोतरी का एक महत्वपूर्ण कारण केवल चीनी मिलों के आसपास के क्षेत्रों में गन्ने की खेती पर निर्भर रहना नहीं है। ऐसे जिलों में भी गन्ना उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है जहां फिलहाल कोई चीनी मिल नहीं है। इन क्षेत्रों में उत्पादित गन्ने का एक हिस्सा नजदीकी चीनी मिलों तक पहुंचाया जाएगा, जबकि शेष गन्ने का इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर गुड़ उद्योग में किया जा सकेगा।

2026-27 सत्र में 809 लाख क्विंटल पेराई का लक्ष्य

बिहार में आगामी गन्ना पेराई सत्र को लेकर सरकार ने व्यापक लक्ष्य निर्धारित किया है। राज्य की 10 कार्यशील चीनी मिलें मिलकर 809 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई करेंगी।

यह लक्ष्य केवल चीनी उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे राज्य में गन्ने की खेती का विस्तार, किसानों की आय बढ़ाना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और चीनी उद्योग के साथ-साथ गुड़ आधारित कारोबार को बढ़ावा देना भी प्रमुख उद्देश्य माना जा रहा है।

गन्ना एक ऐसी नकदी फसल है, जिसका सीधा संबंध किसानों की आमदनी और ग्रामीण रोजगार से है। चीनी मिलों के आसपास गन्ने की खेती अधिक होने से किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बाजार मिलता है और मिलों को नियमित रूप से कच्चा माल उपलब्ध होता है।

बिहार में गन्ना उद्योग मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी और उत्तर बिहार के कुछ जिलों में केंद्रित है। पश्चिम चंपारण इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण जिला माना जाता है।

पश्चिम चंपारण की पांच मिलों को 526 लाख क्विंटल का लक्ष्य

आगामी सत्र में पश्चिम चंपारण की पांच चीनी मिलों को संयुक्त रूप से 526 लाख क्विंटल गन्ना पेराई का लक्ष्य दिया गया है। राज्य के कुल 809 लाख क्विंटल लक्ष्य में यह हिस्सा काफी बड़ा है।

इससे पता चलता है कि पश्चिम चंपारण अभी भी बिहार के चीनी उद्योग का प्रमुख केंद्र है। जिले में गन्ने की खेती का व्यापक क्षेत्र होने के कारण यहां की चीनी मिलों को बड़ी मात्रा में गन्ना उपलब्ध होता है।

2025-26 में इन पांच मिलों ने संयुक्त रूप से 569 लाख क्विंटल से कुछ अधिक गन्ने की पेराई की थी। पिछले सत्र की वास्तविक पेराई और नए सत्र के निर्धारित लक्ष्य के बीच तुलना करने पर यह साफ होता है कि इस बार लक्ष्य निर्धारण में केवल पिछली मिल पेराई को आधार नहीं बनाया गया है।

सरकार ने व्यापक स्तर पर गन्ना उत्पादन बढ़ाने और दूसरे जिलों को भी इस फसल से जोड़ने की रणनीति तैयार की है।

बिना चीनी मिल वाले जिलों में भी बढ़ेगी गन्ने की खेती

नए लक्ष्य की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गन्ने की खेती के दायरे को चीनी मिल वाले जिलों से बाहर भी बढ़ाने की तैयारी है।

बिहार के कई ऐसे जिले हैं जहां गन्ने की खेती होती है, लेकिन वहां कोई चीनी मिल नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में किसानों के सामने गन्ना बेचने के लिए स्थानीय स्तर पर सीमित विकल्प रहते हैं। परिवहन लागत अधिक होने के कारण किसानों को कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है।

अब सरकार इन जिलों में भी गन्ना खेती का लक्ष्य तय कर रही है। इसका उद्देश्य किसानों को गन्ने की खेती के लिए प्रोत्साहित करना और राज्य में कुल उत्पादन बढ़ाना है।

हालांकि, बिना स्थानीय चीनी मिल वाले जिलों में उत्पादित गन्ने को बाजार तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए नजदीकी मिलों से परिवहन व्यवस्था और खरीद प्रणाली को बेहतर बनाना जरूरी होगा।

कुछ गन्ना चीनी मिलों में जाएगा, बाकी गुड़ उद्योग में खपेगा

सरकार की योजना में गन्ने के उपयोग के लिए चीनी मिलों के अलावा गुड़ उद्योग को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

जिन क्षेत्रों में चीनी मिल नहीं है, वहां पैदा होने वाले पूरे गन्ने को चीनी मिल तक पहुंचाना व्यावहारिक नहीं होगा। ऐसे में उत्पादन का एक हिस्सा आसपास की चीनी मिलों तक भेजा जा सकता है और बाकी गन्ने का इस्तेमाल स्थानीय गुड़ उद्योग में किया जा सकता है।

इस व्यवस्था से किसानों को अपनी उपज के लिए वैकल्पिक बाजार मिलेगा। यदि स्थानीय स्तर पर गुड़ निर्माण को बढ़ावा दिया जाता है तो छोटे कारोबारियों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

गुड़ उद्योग अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर भी शुरू किया जा सकता है। गांवों में छोटे कोल्हू और प्रसंस्करण इकाइयों के माध्यम से गन्ने से गुड़ तैयार किया जाता है। इससे किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए केवल चीनी मिलों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

किसानों को मिल सकता है खेती का बेहतर विकल्प

गन्ने की खेती किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है। यदि राज्य में गन्ने की खरीद और भुगतान व्यवस्था बेहतर होती है तो किसान इसे अधिक लाभकारी विकल्प के रूप में अपना सकते हैं।

2026-27 के लक्ष्य के तहत बिना चीनी मिल वाले जिलों को भी खेती के दायरे में लाने से किसानों के सामने फसल विविधीकरण का विकल्प बढ़ सकता है।

हालांकि, किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल गन्ने की कीमत, समय पर भुगतान और बाजार की उपलब्धता का रहेगा। यदि इन तीनों क्षेत्रों में व्यवस्था मजबूत होती है तो गन्ना उत्पादन बढ़ाने की सरकारी योजना को जमीन पर बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

चीनी मिलों की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर

809 लाख क्विंटल गन्ना पेराई का लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है जब चीनी मिलें निर्धारित क्षमता के अनुसार काम करें। इसके लिए मिलों में मशीनरी, तकनीकी व्यवस्था, श्रमिकों और गन्ना आपूर्ति की समुचित तैयारी आवश्यक होगी।

पेराई सत्र शुरू होने से पहले मिलों को अपने प्लांट और मशीनरी की मरम्मत तथा रखरखाव का काम पूरा करना होता है। किसी मिल में तकनीकी खराबी आने पर पेराई प्रभावित हो सकती है और किसानों को भी अपनी फसल बेचने में परेशानी होती है।

इसलिए आगामी सत्र से पहले चीनी मिलों की तैयारियों पर विशेष ध्यान देना होगा।

गन्ना ढुलाई सबसे बड़ी चुनौती

गन्ने की खेती का क्षेत्र बढ़ने के साथ उसके परिवहन की चुनौती भी बढ़ेगी। चीनी मिलों से दूर स्थित जिलों में किसानों को अपनी फसल मिल तक पहुंचाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है।

गन्ना जल्दी खराब होने वाली फसल है। कटाई के बाद उसे समय पर मिल तक पहुंचाना जरूरी होता है। लंबे समय तक खेत या परिवहन में पड़े रहने से गन्ने की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और किसानों को नुकसान हो सकता है।

इसलिए सरकार और चीनी मिलों को गन्ना ढुलाई के लिए प्रभावी परिवहन नेटवर्क तैयार करना होगा। नजदीकी मिलों के साथ किसानों को जोड़ने और संग्रह केंद्र बनाने जैसी व्यवस्था भी उपयोगी साबित हो सकती है।

गुड़ उद्योग को मिलेगा नया अवसर

गन्ने के अतिरिक्त उत्पादन को स्थानीय गुड़ उद्योग से जोड़ने की योजना बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में एक नया आर्थिक अवसर पैदा कर सकती है।

गुड़ की मांग बिहार के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी रहती है। यदि राज्य में गुड़ की गुणवत्ता, पैकेजिंग और बाजार व्यवस्था को बेहतर किया जाए तो स्थानीय स्तर पर तैयार गुड़ को बड़े बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है।

इसके लिए छोटे गुड़ उत्पादकों को तकनीकी सहायता, बेहतर उपकरण, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने की जरूरत होगी।

गन्ने से केवल चीनी ही नहीं, बल्कि गुड़, खांडसारी और अन्य उत्पाद भी तैयार किए जा सकते हैं। इससे गन्ना आधारित अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ सकता है।

ग्रामीण रोजगार पर भी पड़ेगा असर

गन्ना उद्योग का प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता। खेत में बुवाई और कटाई से लेकर गन्ने की ढुलाई, चीनी मिलों में काम, गुड़ निर्माण और संबंधित कारोबार तक बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है।

यदि 2026-27 में गन्ने की खेती का क्षेत्र बढ़ता है और 809 लाख क्विंटल पेराई का लक्ष्य हासिल होता है तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गतिविधियां बढ़ सकती हैं।

विशेष रूप से उन जिलों में जहां अभी चीनी मिल नहीं है, वहां गुड़ उद्योग और गन्ना परिवहन से स्थानीय रोजगार के नए अवसर बन सकते हैं।

लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी होगी बेहतर समन्वय व्यवस्था

सरकार द्वारा लक्ष्य निर्धारित करना पहला कदम है। इसे हासिल करने के लिए कृषि विभाग, गन्ना उद्योग विभाग, चीनी मिल प्रबंधन, किसान और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा।

किसानों को समय पर बीज और तकनीकी सलाह उपलब्ध करानी होगी। चीनी मिलों को खरीद और पेराई की तैयारी पहले से करनी होगी। परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना होगा और किसानों को भुगतान समय पर सुनिश्चित करना होगा।

बिना इन व्यवस्थाओं के केवल लक्ष्य निर्धारित करने से उत्पादन और पेराई में अपेक्षित बढ़ोतरी हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

बिहार के चीनी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण होगा 2026-27 सत्र

2026-27 का गन्ना पेराई सत्र बिहार के चीनी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य ने 10 कार्यशील चीनी मिलों के लिए कुल 809 लाख क्विंटल पेराई का लक्ष्य तय किया है। इसमें पश्चिम चंपारण की पांच मिलों को 526 लाख क्विंटल का बड़ा लक्ष्य दिया गया है।

इस बार लक्ष्य निर्धारण की खास बात यह है कि उन जिलों को भी गन्ना उत्पादन योजना में शामिल किया गया है जहां वर्तमान में चीनी मिलें नहीं हैं। वहां उत्पादित गन्ने का एक हिस्सा नजदीकी चीनी मिलों तक पहुंचाया जाएगा, जबकि बाकी का उपयोग गुड़ उद्योग में किया जा सकता है।

यदि किसानों को बेहतर बाजार, उचित कीमत, समय पर भुगतान और सुचारु परिवहन सुविधा मिलती है तो यह पहल बिहार के गन्ना क्षेत्र के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

कुल मिलाकर सरकार की रणनीति केवल चीनी उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं दिखती, बल्कि गन्ने को आधार बनाकर किसानों, चीनी मिलों, गुड़ उत्पादकों और ग्रामीण रोजगार को जोड़ने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है। अब सबसे बड़ी चुनौती इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करने की होगी।