पूर्णिया के राजमार्गों पर मौत का तांडव — छह माह में 100 से अधिक जानें, सिस्टम की बेरुखी और हादसों का सच

बिहार के पूर्णिया जिले की सड़कें इन दिनों खून से लाल हो रही हैं। नेशनल हाईवे (NH) से लेकर स्टेट हाईवे (SH) तक, रफ्तार का कहर हर दिन किसी न किसी परिवार के चिराग को बुझा रहा है। आंकड़ों की मानें तो इस साल के शुरुआती छह महीनों में ही पूर्णिया में सड़क हादसों के कारण 100 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवा दी । यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि सड़क सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े करती है।

हादसों का डरावना गणित

पूर्णिया में सड़क हादसों का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर जा रहा है। मई का महीना इस साल सबसे अधिक घातक साबित हुआ, जिसमें कुल 29 लोगों की मौत हुई। वहीं, अप्रैल और जून के महीनों में भी स्थिति कमोबेश वैसी ही रही, जहाँ हर महीने 21-21 लोगों की मौत के आंकड़े दर्ज किए गए ।

माहमौतों की संख्या
जनवरी17
फरवरी13
मार्च17
अप्रैल21
मई29
जून21
कुल (6 माह)118

(नोट: ये आंकड़े रिपोर्टों के आधार पर संकलित हैं)

सड़क हादसों के मुख्य कारण: जिम्मेदार कौन?

हादसों की पड़ताल करने पर कई स्तरों पर कमियां सामने आई हैं, जिन्हें मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है:

मानवीय लापरवाही (Human Error)

बेताहाशा रफ्तार: अधिकांश हादसों की जड़ ओवरस्पीडिंग है  चालक अपनी और दूसरों की जान की परवाह किए बिना वाहन दौड़ाते हैं।

ट्रैफिक नियमों की अनदेखी: सड़कों पर चेतावनी संकेत (Signage) लगे होने के बावजूद चालक इनका पालन नहीं करते। अधिकांश वाहन चालकों को इन संकेतों का अर्थ तक पता नहीं होता 

सुरक्षा उपायों का अभाव: बाइक चालकों में हेलमेट न पहनने और कार चालकों में सीट बेल्ट न लगाने की प्रवृत्ति जानलेवा साबित हो रही है

नशे में ड्राइविंग: नशा करके वाहन चलाना भी बड़ी दुर्घटनाओं का एक मुख्य कारण है

 सड़क इंजीनियरिंग और ढांचागत कमियां

खतरनाक मोड़ और झाड़ियां: सड़कों के खतरनाक मोड़ों पर सुरक्षा उपकरणों (रिफ्लेक्टर, क्रैश बैरियर) का अभाव है। कई जगह झाड़ियां उग आने से सड़क की दृश्यता (Visibility) कम हो गई है, जिससे रात के समय मोड़ का सही अंदाजा नहीं मिलता

अवैध कट और अतिक्रमण: ग्रामीण सड़कों का सीधे हाईवे से जुड़ना, सर्विस रोड पर अवैध दुकानों का कब्जा और वाहनों की अवैध पार्किंग ने हाईवे को खतरनाक बना दिया है 

क्रैश बैरियर का कटना: कई स्थानों पर हाईवे के क्रैश बैरियर लोगों द्वारा समय बचाने के लिए काट दिए गए हैं, जिससे वाहनों का सीधा प्रवेश हाईवे पर हो रहा है [1.3.2]।

 प्रशासनिक सुस्ती

निगरानी का अभाव: सड़क सुरक्षा समिति की बैठकों के दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर सुधार की गति धीमी है [1.3.1]।

साइनेज और जागरूकता की कमी: सड़कों पर साइनेज की खराब स्थिति और चालकों को प्रशिक्षित करने की दिशा में ठोस प्रयासों का अभाव [1.1.2]।

संवेदनशील स्थान और चुनौतियां

पूर्णिया-सहरसा एनएच, एनएच-31, और डगरूआ, बायसी व मरंगा थाना क्षेत्रों के आसपास के चौक-चौराहों को हादसों के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील (Black Spots) माना गया है  इन क्षेत्रों में ओवरब्रिज, अंडरपास या सुरक्षित क्रॉसिंग की कमी के कारण पैदल यात्रियों और छोटे वाहन चालकों के लिए हाईवे पार करना मौत के मुंह में जाने जैसा है 

समाधान की दिशा: क्या हो सकते हैं कदम?

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि हादसों को रोकने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

इंजीनियरिंग सुधार: सभी 'ब्लैक स्पॉट' पर ओवरब्रिज, फुटओवरब्रिज या अंडरपास का निर्माण हो। खतरनाक मोड़ों पर लगे सुरक्षा उपकरणों की नियमित मरम्मत और झाड़ियों की सफाई अनिवार्य हो ।

सख्त प्रवर्तन: ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना और लाइसेंस रद्द करने जैसी कार्रवाई हो। ओवरलोडिंग और अवैध पार्किंग के खिलाफ विशेष अभियान चले।

जन जागरूकता: चालकों को यातायात नियमों और साइनेज के प्रति शिक्षित करने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाएं 

पूर्णिया के राजमार्गों पर होने वाली ये मौतें महज आंकड़े नहीं, बल्कि परिवारों के उजड़ने की दर्दनाक कहानियां हैं। यदि समय रहते सड़क की इंजीनियरिंग में सुधार, नियमों का कड़ाई से पालन और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह 'मौत का तांडव' इसी तरह जारी रहेगा। सिस्टम की यह बेरुखी किसी और का नहीं, बल्कि आम आदमी की जान का सौदा कर रही है।