बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) में नए व्यावसायिक कोर्सों का ठप पड़ना: एक गंभीर शैक्षणिक संकट

परिचय

मुजफ्फरपुर स्थित बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) में कागजी घोषणाओं और धरातलीय हकीकत के बीच की खाई एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा छात्रों के भविष्य को बेहतर बनाने और आधुनिक रोजगारपरक शिक्षा प्रदान करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, परंतु प्रशासनिक सुस्ती और राजभवन व राज्य सरकार के बीच समन्वय की कमी के चलते कई महत्वपूर्ण कोर्स केवल फाइलों और प्रस्तावों तक ही सीमित रह गए हैं।

हाल ही में यह बात सामने आई है कि विश्वविद्यालय में एमबीए (MBA) के अलावा पिछले वर्ष सीनेट द्वारा पारित किया गया फूड टेक्नोलॉजी (Food Technology) का कोर्स भी आज तक शुरू नहीं हो सका है। दिलचस्प बात यह है कि इन कोर्सों के संचालन के लिए करीब डेढ़ साल पहले ही सर्वोच्च निकाय यानी 'सीनेट' (Senate) से आधिकारिक मंजूरी मिल चुकी थी, लेकिन इसके बावजूद ये कोर्स हवा में ही लटक कर रह गए हैं।

एमबीए (MBA) विभाग के गठन की अधूरी कहानी और अड़चनें

विश्वविद्यालय प्रशासन ने लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व एक स्वतंत्र और नए मैनेजमेंट विभाग (Management Department) को खोलने की व्यापक घोषणा की थी। शुरुआती दौर में डिस्टेंस एजुकेशन के तहत तात्कालिक तौर पर कुछ कक्षाओं का संचालन शुरू भी किया गया था, परंतु यह पहल भी जल्द ही ठंडे बस्ते में चली गई।

कॉमर्स विभाग से अलग करने की योजना: बीआरएबीयू की योजना एमबीए कोर्स को पारंपरिक कॉमर्स विभाग से अलग निकालकर एक पूर्ण रूप से स्वतंत्र मैनेजमेंट विभाग के रूप में स्थापित करने की थी। इसके लिए विश्वविद्यालय स्तर पर पूरी तैयारी की गई थी, जिसमें शिक्षकों और शिक्षकेतर (non-teaching) कर्मचारियों की सूची तैयार कर विधिवत रूप से राज्य सरकार के पास अनुमोदन के लिए भेजी गई थी।

सेल्फ फाइनेंस मोड बनाम सामान्य विभाग: सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय इन नए पदों और कोर्सों को सामान्य सरकारी विभागों की तरह संचालित कराना चाहता था। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार का स्पष्ट निर्देश और प्रस्ताव था कि एमबीए जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को 'सेल्फ फाइनेंस मोड' (Self-Finance Mode) के तहत चलाया जाए। विश्वविद्यालय के इस प्रस्ताव और सरकार की नीतिगत अपेक्षा में तालमेल न बैठ पाने के कारण यह पूरा मामला बीच में ही अटक गया।

पोस्ट क्रिएशन कमेटी का प्रस्ताव: शिक्षकों और कर्मचारियों के पदों के सृजन के लिए विश्वविद्यालय ने 'पोस्ट क्रिएशन कमेटी' (Post Creation Committee) से भी प्रस्तावों को पास करा लिया था, परंतु अंततः राज्य सरकार द्वारा विश्वविद्यालय के जवाबों से पूरी तरह संतुष्ट न होने के कारण यह मामला गतिरोध का शिकार हो गया।

फूड टेक्नोलॉजी कोर्स का मामला और रसायन विभाग की निगरानी

एमबीए के साथ-साथ पिछले वर्ष ही स्नातकोत्तर (PG) स्तर पर फूड टेक्नोलॉजी का कोर्स शुरू करने का प्रस्ताव लाया गया था। इस कोर्स को विश्वविद्यालय के पीजी रसायन विज्ञान (Chemistry) विभाग के अंतर्गत और उनकी देखरेख में चलाए जाने की योजना बनाई गई थी।

आनन-फानन में तैयार हुआ सिलेबस: छात्रों के रुझान और बाजार में फूड टेक्नोलॉजी की मांग को देखते हुए इसके लिए एक नया पाठ्यक्रम (Syllabus) बहुत कम समय में तैयार किया गया। प्रक्रियागत औपचारिकताएं पूरी करते हुए इस सिलेबस को एकेडमिक काउंसिल और सीनेट से भी बेहद जल्दबाजी में पारित करा लिया गया।

सरकार के सवालों पर विश्वविद्यालय का मौन या असंतोषजनक जवाब: सूत्रों के मुताबिक, जब इस नए कोर्स का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास भेजा गया, तो सरकार ने इस पाठ्यक्रम के बजट, आधारभूत संरचना (infrastructure), और संचालन प्रक्रिया को लेकर कुछेक स्पष्ट सवाल विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रखे। विश्वविद्यालय की ओर से जो जवाब भेजे गए, वे उच्चाधिकारियों और सरकार को संतुष्ट करने में नाकाम रहे। परिणामस्वरूप, फूड टेक्नोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण और आधुनिक विषय को हरी झंडी नहीं मिल सकी और यह भी सेल्फ फाइनेंस के दायरे में उलझकर रह गया।

सीनेट की स्वीकृति के बाद पहले भी लटके हैं कई कोर्स

बीआरए बिहार विश्वविद्यालय में यह पहली बार नहीं हुआ है कि नीतिगत निर्णयों और सीनेट की मुहर लगने के बावजूद कोई कोर्स शुरू न हो पाया हो। पूर्व के वर्षों का रिकॉर्ड भी इस बात गवाही देता है कि विवि प्रशासन ने कागजों पर तो कई नए कोर्स पास कराए, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए गए।

पूर्व कुलपति के कार्यकाल की योजनाएं: पूर्व कुलपति प्रो. हनुमान प्रसाद पांडेय के कार्यकाल के दौरान लगभग चार अलग-अलग तरह के एमबीए और मैनेजमेंट से जुड़े नए पाठ्यक्रमों को सीनेट की मंजूरी दिलाई गई थी। वर्ष 2020 में ये कोर्स पास हुए और इनके सिलेबस भी तैयार कर लिए गए, लेकिन आज स्थिति यह है कि वे सभी पाठ्यक्रम केवल कागजों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

मास कम्युनिकेशन का हस्र: विश्वविद्यालय के कई अंगीभूत और संबद्ध कॉलेजों में मास कम्युनिकेशन (Mass Communication) जैसे लोकप्रिय और रोजगारपरक कोर्सों को शुरू करने की बात सीनेट बैठकों में उठी और पास भी की गई, परंतु आज दिनांक तक न तो विश्वविद्यालय परिसर में और न ही किसी कॉलेज में इसकी कक्षाएं ढंग से शुरू हो पाई हैं।

विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष

इस पूरे मामले पर जब विश्वविद्यालय के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो छात्र कल्याण संकाय के अध्यक्ष (DSW) प्रो. आलोक प्रताप सिंह ने अपनी बात रखते हुए कहा कि नए कोर्सों के सुचारू संचालन और उनकी विधिवत मंजूरी के लिए राज्य सरकार के पास प्रस्ताव भेजा जा चुका है। विश्वविद्यालय प्रशासन सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप सभी आपत्तियों और बिंदुओं पर स्पष्टीकरण दे रहा है। जैसे ही शासन स्तर से अंतिम स्वीकृति (Approval) प्राप्त होगी, इन पाठ्यक्रमों को शुरू करने की दिशा में त्वरित गति से कार्य आरंभ कर दिया जाएगा।

बीआरएबीयू में मैनेजमेंट और फूड टेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक कोर्सों का लंबे समय से लंबित रहना यह दर्शाता है कि उच्च शिक्षा में प्रशासनिक संवेदनशीलता और पारदर्शिता की कितनी कमी है। एक तरफ जहां छात्र आधुनिक युग में रोजगारपरक और तकनीकी डिग्रियां पाने के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विश्वविद्यालय और शासन के बीच की खींचतान के कारण बहुमूल्य समय बर्बाद हो रहा है। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी कार्यशैली में सुधार लाकर सरकार के साथ समन्वय बेहतर नहीं करता है, तो इस प्रकार के प्रस्ताव भविष्य में भी सिर्फ कागजी घोड़े ही दौड़ाते रहेंगे।