निचले इलाकों के कई गांव अब भी जलमग्न, ऊंचे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर ग्रामीण; धान की फसल बर्बाद होने से किसानों पर टूटा दुखों का पहाड़, प्रशासन से लगाई राहत की गुहार
बिहार के कोसी और सीमांचल क्षेत्र में बाढ़ की विभीषिका हर साल स्थानीय लोगों के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं होती। सहरसा जिले के सलखुआ प्रखंड से इस वक्त एक बेहद चिंताजनक और गंभीर स्थिति सामने आ रही है। हालांकि पिछले चार दिनों से कोसी नदी के जलस्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन इसके बावजूद निचले इलाकों में बाढ़ का संकट ज्यों का त्यों बना हुआ है। नदियाँ उफन कर भले ही थोड़ा पीछे हटी हों, लेकिन गांवों और खेतों में छोड़ा गया पानी अभी भी लोगों की जिंदगियों को तबाह कर रहा है। सलखुआ के कई दूरदराज के गांव पूरी तरह से जलमग्न हैं, जिसके कारण ग्रामीण अपने घरों को छोड़कर ऊंचे स्थानों, तटबंधों और सड़कों के किनारे प्लास्टिक की झोपड़ियां डालकर शरण लेने को मजबूर हो गए हैं। खेतों में लहलहाती धान की फसलें पानी में डूबकर सड़ चुकी हैं, जिससे किसानों की महीनों की मेहनत और पूंजी पलभर में बर्बाद हो गई है।
क्या है सलखुआ की जमीनी हकीकत और जलस्तर घटने के बाद भी क्यों है संकट?
सामान्य तौर पर आम लोगों की यह धारणा होती है कि नदी का जलस्तर घटने से बाढ़ का खतरा टल जाता है, लेकिन कोसी के भौगोलिक आंचल में यह नियम अक्सर उल्टा साबित होता है। जब कोसी नदी का जलस्तर घटता है, तो भारी मात्रा में पानी निचले इलाकों के गड्ढों, खेतों और बस्तियों में फंसकर रह जाता है।
गांवों में जलभराव की स्थिति: सलखुआ प्रखंड के कई तटबंध के भीतर बसे गांवों में अभी भी दो से तीन फीट तक पानी जमा हुआ है। पानी की निकासी का कोई उचित प्राकृतिक या कृत्रिम रास्ता न होने के कारण यह जलभराव स्थानीय लोगों के लिए एक स्थाई नरक बन गया है।
संपर्क मार्ग टूटे: गांवों के चारों तरफ पानी भर जाने के कारण मुख्य सड़क मार्ग से उनका संपर्क पूरी तरह कट गया है। आवागमन के लिए ग्रामीणों के पास एकमात्र सहारा केवल छोटी नावें बची हैं, जिनकी संख्या भी आवश्यकता से काफी कम है। बच्चों का स्कूल जाना और बीमार लोगों को अस्पताल पहुँचाना इस समय सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
किसानों की कमर टूटी: धान की फसलें तबाह और भुखमरी की आशंका
इस बाढ़ और जलभराव का सबसे विनाशकारी असर क्षेत्र के किसानों पर पड़ा है। वर्तमान समय धान की खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है, लेकिन खेतों में कई दिनों से पानी भरे रहने के कारण धान की खड़ी फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई हैं।
फसलों का सड़ना: किसान भाईयों ने कर्ज लेकर और अपनी जमा-पूंजी लगाकर धान की रोपनी की थी। लेकिन पानी के लगातार जमा रहने से पौधे सड़ चुके हैं और खेतों में केवल कीचड़ व बर्बाद फसल के अवशेष बचे हैं।
आर्थिक तंगाई और कर्ज का बोझ: फसल बर्बाद होने के बाद किसानों के सामने अपने परिवार के भरण-पोषण और बैंक या महाजनों का कर्ज चुकाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। किसानों का कहना है कि इस साल उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ी है—पहले बाढ़ का प्रकोप और अब जलस्तर घटने के बाद फसलों के नुकसान का दर्द।
ग्रामीणों का छलका दर्द: राहत और मुआवजे की पुरजोर मांग
बाढ़ के इस संकट से जूझ रहे सलखुआ के दर्जनों गांवों के ग्रामीणों में स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति भारी आक्रोश देखा जा रहा है। लोगों का आरोप है कि बाढ़ के चार दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक पर्याप्त मात्रा में सरकारी राहत सामग्री (सूखा राशन, पॉलीथिन शीट और सामुदायिक रसोई) उन तक नहीं पहुँच पाई है।
मच्छरों और संक्रामक बीमारियों का खतरा: जलमग्न इलाकों में पानी के सड़ने से उठने वाली दुर्गंध और मच्छरों के भारी प्रकोप के कारण अब मलेरिया, डायरिया और चर्म रोगों जैसी बीमारियों का खतरा तेजी से मंडराने लगा है। स्वास्थ्य विभाग की कोई भी मेडिकल टीम अभी तक इन दूरदराज के इलाकों में नहीं पहुँची है।
पशुओं के चारे की समस्या: इंसानों के साथ-साथ मवेशियों के लिए भी चारे का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। ऊंचे स्थानों पर शरण लिए किसानों के सामने अपने पालतू पशुओं को बचाने की बड़ी चुनौती है।
जिला प्रशासन और सरकार से अपेक्षाएं
सलखुआ के पीड़ित ग्रामीणों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन से तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने की मांग की है:
त्वरित राहत वितरण: सभी प्रभावित परिवारों तक युद्ध स्तर पर सूखा राशन, शुद्ध पेयजल और राहत सामग्रियां पहुंचाई जाएं।
क्षति का आकलन और मुआवजा: कृषि विभाग की टीमों को भेजकर बर्बाद हुई धान की फसलों का त्वरित आकलन किया जाए और पीड़ित किसानों को उचित मुआवजा व आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।
स्वास्थ्य और सैनिटाइजेशन: जलमग्न क्षेत्रों में ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव किया जाए और प्रभावित गांवों में मोबाइल मेडिकल टीमें तैनात की जाएं ताकि समय रहते लोगों का इलाज हो सके।
सलखुआ में कोसी नदी के जलस्तर में गिरावट के बावजूद बाढ़ के संकट का बने रहना यह बताता है कि आपदा प्रबंधन केवल बाढ़ के आने पर नहीं, बल्कि उसके बाद की स्थिति से निपटने के लिए भी उतनी ही मुस्तैदी की मांग करता है। यदि समय रहते प्रशासन ने प्रभावितों तक राहत नहीं पहुँचाई और किसानों की सुध नहीं ली, तो यह मानसूनी विभीषिका क्षेत्र के लोगों को लंबे समय तक आर्थिक और मानसिक पीड़ा देती रहेगी। सलखुआ की जनता अब केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि ठोस और त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई की उम्मीद लगाए बैठी है।