सन्हौला का रमासी गांव बना देश का पहला 'सिंदूर गांव'; बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) सबौर की अनूठी पहल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही है नई मजबूती
भागलपुर, विशेष संवाददाता: बिहार के कृषि क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी अध्याय की शुरुआत करते हुए भागलपुर जिले के सन्हौला प्रखंड स्थित रमासी गांव को देश के पहले 'सिंदूर गांव' (Sindoor Village) के रूप में विकसित किया गया है। सबौर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और किसानों की आय में बहुमुखी वृद्धि लाने के उद्देश्य से इस समग्र विकास मॉडल की परिकल्पना की गई है। इस अनूठी पहल के तहत रमासी गांव को 'उत्पाद विशेष स्मार्ट विलेज' के तौर पर पहचान दी गई है, जिससे न केवल इस क्षेत्र को एक विशिष्ट वैश्विक पहचान मिलेगी, बल्कि स्थानीय किसानों और महिलाओं के लिए रोजगार तथा उद्यमिता के नए द्वार खुलेंगे।
क्या है 'उत्पाद विशेष स्मार्ट विलेज' की परिकल्पना?
बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) के कुलपति प्रो. दुनिया राम सिंह की दूरदर्शी सोच के तहत राज्य के चुनिंदा गांवों की तस्वीर बदलने की योजना बनाई गई है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य गांवों को उनकी किसी विशिष्ट और पारंपरिक उपज के आधार पर एक खास पहचान दिलाना है:
गांव को विशिष्ट पहचान: इस अवधारणा के तहत हर चिह्नित गांव को एक विशेष कृषि उत्पाद (जैसे सिंदूर, जर्दालू आम, ड्रैगन फ्रूट आदि) से जोड़ा जा रहा है, ताकि उस गांव का नाम लेते ही वहां के मुख्य उत्पाद की ख्याति देश-दुनिया तक पहुंच सके।
आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण: किसानों को केवल पारंपरिक खेती तक सीमित न रखकर आधुनिक कृषि तकनीक, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, बेहतर बाजार प्रबंधन और मूल्य संवर्धन (Value Addition) से जोड़ा जा रहा है, ताकि उनकी आजीविका में सीधा और सकारात्मक सुधार हो सके।
रमासी गांव बना देश का पहला 'सिंदूर ग्राम'
सन्हौला प्रखंड का रमासी गांव अब देश का पहला ऐसा गांव बन गया है जिसे आधिकारिक तौर पर 'सिंदूर गांव' के रूप में विकसित किया जा रहा है:
सीता सिंदूर के पौधों का वृहद रोपण: इस अभियान की औपचारिक शुरुआत के दौरान रमासी गांव में किसान रविन्द्र कुमार के खेतों में एक एकड़ भूमि पर 7 से 8 महीने की आयु के 250 सीता सिंदूर के पौधे रोपे गए।
महिला किसानों का सशक्तिकरण: कार्यक्रम के दौरान लगभग 100 महिला किसानों के बीच सिंदूर के पौधों का निःशुल्क वितरण किया गया। इसके साथ ही उन्हें कृषि से जुड़े हॉर्टिकल्चर टूल किट, पावर नैपसैक स्प्रेयर और अन्य आधुनिक उपकरण भी उपलब्ध कराए गए, जो ग्रामीण महिलाओं को उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की नई राह दिखाएंगे।
वैज्ञानिक अनुसंधान की बड़ी सफलता: विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक डॉ. वी. शाजीदा बानो के पिछले तीन वर्षों के कड़े संघर्ष और शोध के बाद 'सीता सिंदूर' की इस तकनीक को प्रयोगशाला से निकालकर सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाया गया है। खास बात यह है कि विश्वविद्यालय ने सिंदूर प्रौद्योगिकी का पेटेंट और 'सीता सिंदूर' का जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग भी हासिल कर लिया है, जो इस क्षेत्र के लिए गर्व की बात है।
समारोह में दिग्गजों की मौजूदगी और किसानों में उत्साह
रमासी गांव में आयोजित इस भव्य उद्घाटन समारोह में कृषि जगत के कई दिग्गज और जनप्रतिनिधि शामिल हुए:
इस अवसर पर बीएयू के कुलपति डॉ. डीआर सिंह, कहलगांव विधायक ई. शुभानंद मुकेश, कृषि निदेशक डॉ. अनिल कुमार सहित विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक (डॉ. मो. फिजा अहमद, डॉ. एसके पाठक, डॉ. राजेश कुमार आदि) मौजूद रहे।
अतिथियों और वैज्ञानिकों ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि पारंपरिक फसलों के मुकाबले सिंदूर की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली साबित होगी।
स्थानीय किसानों और ग्रामीणों ने इस नई कृषि तकनीक को लेकर गहरी रुचि दिखाई। किसानों का कहना था कि पहली बार उनके गांव में इस तरह की व्यावसायिक और अनूठी खेती की शुरुआत हो रही है, जो भविष्य में उनकी आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल कर रख देगी।
अन्य उत्पादों के लिए भी गांवों को चिह्नित करने की तैयारी
रmaसी गांव की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद बिहार कृषि विश्वविद्यालय अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे गांवों की तलाश कर रहा है जहाँ विशिष्ट फसलों की बंपर पैदावार की संभावना हो:
जर्दालू आम और ड्रैगन फ्रूट की विशेष पैदावार: आने वाले दिनों में भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों में जर्दालू आम तथा ड्रैगन फ्रूट (कमलम) जैसी प्रीमियम फसलों के लिए भी विशेष गांवों को चिह्नित कर उन्हें स्मार्ट विलेज के रूप में विकसित किया जाएगा।
इससे भागलपुर के प्रसिद्ध कृषि उत्पादों को वैश्विक स्तर पर एक नई ब्रांडिंग मिलेगी और किसानों की आय कई गुना बढ़ जाएगी।
सन्हौला के रमासी गांव को 'सिंदूर गांव' के रूप में विकसित करने की यह पहल बिहार की कृषि क्रांति में एक मील का पत्थर साबित हो रही है। कृषि विज्ञान और ग्रामीण श्रम के इस अनूठे संगम से न केवल रमासी गांव आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रहा है, बल्कि यह पूरे देश के किसानों के लिए ग्रामीण आजीविका को सशक्त करने का एक नया मार्ग भी प्रशस्त कर रहा है।