किसानों को पर्याप्त समय और उचित वोल्टेज के साथ मिले बिजली: कृषि क्षेत्र की बदहाली पर उठी गंभीर आवाज, सिंचाई संकट से जूझ रहे अन्नदाताओं ने प्रशासन से लगाई गुहार

 

देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। एक तरफ जहां मौसम की बेरुखी और प्राकृतिक आपदाएं खेती-किसानी को प्रभावित कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बिजली विभाग की लचर व्यवस्था और अघोषित बिजली कटौती ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। कृषि प्रधान क्षेत्रों में इन दिनों किसानों की एक ही सबसे बड़ी और मुखर मांग गूंज रही है—"किसानों को पर्याप्त समय तक और उचित वोल्टेज के साथ बिजली दी जाए।"

कमजोर वोल्टेज और बिजली की आंख-मिचौली के कारण खेतों में लगी फसलें सूखने के कगार पर पहुंच गई हैं। ट्यूबवेल और बोरिंग पंप समय पर न चल पाने के कारण अन्नदाताओं के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं। ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति की बदतर स्थिति को लेकर किसानों में भारी आक्रोश व्याप्त है, और वे प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक अपनी फरियाद लेकर पहुंच रहे हैं।

क्या है पूरा मामला? (कृषि फीडर की बदहाली और वोल्टेज की समस्या)

बिहार और आसपास के ग्रामीण अंचलों में कृषि कार्यों के लिए सरकार द्वारा अलग से कृषि फीडर (Agriculture Feeder) के जरिए बिजली आपूर्ति करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।

अघोषित और लचर बिजली कटौती: किसानों का कहना है कि कागजों पर भले ही कृषि फीडरों को 8 से 10 घंटे बिजली देने का प्रावधान हो, लेकिन असलियत में उन्हें बमुश्किल 3 से 4 घंटे ही बिजली मिल पा रही है। वह भी ऐसी अनियमित तरीके से कि मोटर चालू करना तक मुमकिन नहीं होता।

लो-वोल्टेज की गंभीर समस्या: जिन इलाकों में बिजली आती भी है, वहां वोल्टेज इतना अधिक डाउन (Low Voltage) रहता है कि किसानों के महंगे स्टार्टर, ट्रांसफार्मर और पंपिंग सेट या तो जल जाते हैं या फिर पानी खींचने में असमर्थ साबित होते हैं।

सिंचाई का समय और फसल की बर्बादी: धान की रोपाई और मक्का या अन्य फसलों की पलेवा व सिंचाई के इस अहम दौर में पानी न मिलने से फसलें सूखने लगी हैं। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते बिजली आपूर्ति में सुधार नहीं किया गया, तो उन्हें भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ेगी।

किसानों का दर्द और प्रशासनिक उदासीनता

अन्नदाता जो दिन-रात पसीना बहाकर देश का पेट भरते हैं, उन्हें अपनी फसलों की सिंचाई के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

डीजल की महंगाई से दोहरी मार: बिजली न मिलने और कम वोल्टेज के कारण किसानों को मजबूरी में महंगे डीजल का उपयोग कर पंपसेट चलाने पड़ रहे हैं। डीजल की आसमान छूती कीमतों ने खेती की लागत को इतना बढ़ा दिया है कि अब किसान कर्ज के दलदल में फंसते जा रहे हैं।

विभाग की अनदेखी: किसानों का आरोप है कि उन्होंने कई बार स्थानीय बिजली उपकेंद्र (Power Sub-Station) और कनीय अभियंता (Junior Engineer) को इस समस्या से अवगत कराया, लेकिन हर बार सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले। ट्रांसफार्मर जलने पर महीनों तक उसे बदला नहीं जाता है।

धरना-प्रदर्शन की चेतावनी: यदि स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो विभिन्न किसान संगठनों और ग्रामीण क्षेत्रों के अन्नदाताओं ने बिजली कार्यालयों के घेराव और उग्र आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

सरकार और विद्युत बोर्ड की क्या है जिम्मेदारी?

कृषि क्षेत्र को पटरी पर रखने के लिए सरकार द्वारा रियायती दरों पर बिजली देने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की कमी इन योजनाओं को असफल बना रही है।

बुनियादी ढांचे में सुधार की जरूरत: ग्रामीण क्षेत्रों में जर्जर तारों, पुराने ट्रांसफार्मरों और ओवरलोडिंग की समस्या को दूर किए बिना पर्याप्त वोल्टेज मिल पाना असंभव है। विद्युत बोर्ड को चाहिए कि वह कृषि फीडरों की क्षमता का विस्तार करे।

निर्धारित समय-सारणी का पालन: सरकार और ऊर्जा विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को रोस्टर के अनुसार तय घंटों तक पूरी क्षमता के साथ बिजली मिले, ताकि वे अपनी फसलों को समय पर पानी दे सकें।

 

"किसानों को पर्याप्त समय तक वोल्टेज के साथ बिजली दें" यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि देश के करोड़ों अन्नदाताओं की वह पुकार है जो उनकी जीविका और अस्तित्व से जुड़ी हुई है। खेती किसानी बचेगी तभी देश का पेट भरेगा। समय आ गया है कि ऊर्जा विभाग और प्रशासन इस गंभीर समस्या को प्राथमिकता के आधार पर ले, ग्रामीण अंचलों में लो-वोल्टेज की समस्या का स्थायी समाधान करे और किसानों को निर्बाध बिजली उपलब्ध कराए, ताकि वे राहत की सांस ले सकें।