बिहार के विश्वविद्यालयों में शिक्षक बहाली की नई नियमावली पर गरमाई सियासत और शिक्षा जगत का पारा; टीएमबीयू में अतिथि शिक्षकों और अभ्यर्थियों का जोरदार विरोध, हाईकोर्ट से लेकर सड़कों तक मचा बवाल
भागलपुर, वरीय संवाददाता: बिहार के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति और चयन प्रक्रिया को लेकर लाई गई नई नियमावली ने राज्य के शैक्षणिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। विशेष रूप से भागलपुर स्थित तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) समेत राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में इस नई नियमावली को लेकर भारी असंतोष देखने को मिल रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन, अतिथि शिक्षकों (Guest Teachers) और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे मेधावी युवाओं के बीच इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां सरकार इस नई व्यवस्था को पारदर्शी और समयबद्ध बनाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ शैक्षणिक संगठनों और अभ्यर्थियों ने इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के मानकों के विपरीत बताते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
क्या है पूरा विवाद और नई नियमावली की मुख्य बातें?
बिहार के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में स्थायी एवं संविदा आधारित असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए हाल ही में नई नियमावली लाई गई है। इस नई व्यवस्था के तहत राज्य के नए और पुराने अंगीभूत महाविद्यालयों में शिक्षकों के चयन के लिए नए दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। लेकिन, जैसे ही इस नियमावली के प्रावधान सार्वजनिक हुए, विश्वविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों और नौकरी की आस लगाए बैठे युवाओं ने इसका पुरजोर विरोध शुरू कर दिया।
विरोध करने वाले संगठनों और अभ्यर्थियों के अनुसार, इस नई नियमावली में कई ऐसे प्रावधान जोड़े गए हैं जो न केवल पुराने अनुभवी शिक्षकों के हितों के खिलाफ हैं, बल्कि यूजीसी रेगुलेशन (UGC Regulations) के मानदंडों से भी मेल नहीं खाते हैं।
अतिथि शिक्षकों और अभ्यर्थियों की प्रमुख आपत्तियां और मांगें
भागलपुर के टीएमबीयू परिसर में अतिथि शिक्षक संघ के बैनर तले शिक्षकों ने प्रशासनिक भवन के समक्ष जोरदार प्रदर्शन किया और नई नियमावली की प्रतियों को जलाकर अपना रोष प्रकट किया। उनकी मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित थीं:
यूजीसी गाइडलाइंस के उल्लंघन का आरोप: शिक्षकों का कहना है कि स्थायी और नियमित असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए अलग-अलग नियम लाना और यूजीसी के तय मानकों को दरकिनार करना पूरी तरह अनुचित है। पूर्व में बनी नियमावली (जैसे 2020 के प्रावधान) के अनुसार नियुक्तियां होनी चाहिए थीं।
आयु सीमा का मुद्दा: नई नियमावली में नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा को घटाकर कम किए जाने पर अभ्यर्थियों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि पिछले कई वर्षों से नियमित बहाली न होने के कारण हजारों योग्य और अनुभवी उम्मीदवार पहले ही ओवरएज होने की कगार पर हैं। पूर्व की नियुक्तियों में अधिकतम आयु सीमा अधिक हुआ करती थी, जिसे दोबारा बहाल किया जाना चाहिए।
अनुभव और शोध अंकों की अनदेखी: संविदा आधारित या नए पदों पर चयन प्रक्रिया के दौरान वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे अतिथि शिक्षकों के शिक्षण अनुभव (Teaching Experience) और शोध पत्रों (Research Papers) को उचित वेटेज न दिए जाने से शिक्षकों में भारी निराशा है। लंबे समय से कम मानदेय पर पढ़ा रहे शिक्षकों का कहना है कि उनके अनुभव को नजरअंदाज करना उनके साथ अन्याय है।
मैट्रिक और इंटर के अंकों को तरजीह देना: चयन प्रक्रिया में अकादमिक रिकॉर्ड के तहत शुरुआती कक्षाओं (मैट्रिक और इंटर) के अंकों को अधिक प्राथमिकता दिए जाने और यूजीसी-नेट/पीएचडी के स्तर पर पारदर्शिता के अभाव को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं।
हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला, कानूनी जंग की तैयारी
विरोध केवल सड़कों और विश्वविद्यालयों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मामला अब पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) की देहरी तक पहुंच गया है। हाल ही में राज्य के नए राजकीय डिग्री कॉलेजों के लिए संविदा आधारित असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति प्रक्रिया और नई गाइडलाइंस के खिलाफ अभ्यर्थियों द्वारा हाईकोर्ट में याचिका (Writ Petition) दायर की गई है। याचिककर्ताओं के वकीलों का कहना है कि विज्ञापनों और चयन प्रक्रिया में रोस्टर नियमों की अनदेखी की जा रही है और यूजीसी के नियमों के अक्षरशः पालन के सरकारी संकल्पों का उल्लंघन हो रहा है।
विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार का पक्ष
दूसरी ओर, शासन और प्रशासनिक तंत्र का मानना है कि इन नई नियमावलियों का उद्देश्य उच्च शिक्षा में आ रही सुस्ती को दूर करना और खाली पड़े पदों को तेजी से भरना है। सरकार का तर्क है कि पारदर्शी और आधुनिक चयन प्रक्रिया अपनाने से विश्वविद्यालयों में योग्य फैकल्टी की उपलब्धता सुनिश्चित होगी, जिससे अंततः छात्रों का शैक्षणिक हित पूरा होगा। हालांकि, बढ़ते विरोध और कानूनी दांवपेंच के बीच शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय के अधिकारियों पर इस नीति में संशोधन या पुनर्विचार करने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
भागलपुर सहित पूरे बिहार के विश्वविद्यालयों में शिक्षक बहाली की नई नियमावली को लेकर उपजा यह विवाद इस बात का प्रमाण है कि उच्च शिक्षा की नीतिगत व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया कितनी संवेदनशील है। एक तरफ जहां सरकार प्रशासनिक कसावट और तीव्र बहाली की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षक और युवा अपने भविष्य को लेकर चिंतित और आंदोलित हैं। यदि समय रहते इस गतिरोध को संवाद के जरिए नहीं सुलझाया गया, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और अधिक व्यापक रूप ले सकता है, जिसका सीधा असर राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।