15 महीने पहले अगवा हुई दलित किशोरी मामले में पटना हाईकोर्ट सख्त, पुलिस से मांगी कार्रवाई रिपोर्ट
मुजफ्फरपुर। जिले में करीब 15 महीने पहले कथित रूप से अगवा हुई एक दलित किशोरी के मामले में पटना हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारियों से अब तक की गई कार्रवाई का विस्तृत ब्योरा मांगा है। अदालत ने पुलिस को चार सप्ताह के भीतर प्रतिशपथ पत्र (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया है कि जांच की वर्तमान स्थिति और अब तक उठाए गए कदमों की पूरी जानकारी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। किशोरी के परिजनों का आरोप है कि घटना के डेढ़ वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पुलिस अब तक न तो किशोरी का पता लगा सकी है और न ही मामले में प्रभावी कार्रवाई की गई है। उनका कहना है कि लगातार शिकायतों और गुहार के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिल पाया, जिसके बाद उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
15 महीने पहले हुई थी कथित अपहरण की घटना
याचिका में बताया गया है कि करीब 15 महीने पहले दलित समुदाय से आने वाली नाबालिग किशोरी अचानक लापता हो गई थी। परिजनों ने आशंका जताई थी कि उसका अपहरण किया गया है। घटना की जानकारी मिलने के बाद स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी और पुलिस से तत्काल कार्रवाई की मांग की गई थी।
परिवार का आरोप है कि प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद जांच अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ी। उनका कहना है कि समय बीतने के साथ जांच की रफ्तार और धीमी होती गई, जबकि किशोरी का अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका।
पिता ने पुलिस की कार्यशैली पर उठाए सवाल
किशोरी के पिता ने अदालत में दायर याचिका में आरोप लगाया है कि पुलिस ने मामले की गंभीरता के अनुरूप कार्रवाई नहीं की। उनका कहना है कि उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों से मुलाकात कर जांच में तेजी लाने की मांग की, लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।
याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि शुरुआत से ही पुलिस ने सक्रियता दिखाई होती, तो संभवतः किशोरी का जल्द पता लगाया जा सकता था। पिता ने अदालत से निष्पक्ष और प्रभावी जांच कराने की मांग की है।
हाईकोर्ट ने मांगा विस्तृत जवाब
मामले की सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन से पूछा कि अब तक जांच में क्या प्रगति हुई है और किशोरी की बरामदगी के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं।
अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह के भीतर प्रतिशपथ पत्र दाखिल कर पूरी कार्रवाई का विवरण प्रस्तुत करें। इसमें जांच की वर्तमान स्थिति, अब तक किए गए प्रयास, संभावित आरोपितों के खिलाफ उठाए गए कदम और आगे की कार्ययोजना का भी उल्लेख करने को कहा गया है।
परिवार को न्याय की उम्मीद
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। परिजनों का कहना है कि वे पिछले 15 महीनों से लगातार अपनी बेटी की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। उन्होंने प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से भी कई बार गुहार लगाई, लेकिन संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई।
परिवार का मानना है कि अब न्यायालय की निगरानी में जांच आगे बढ़ने से मामले में तेजी आएगी और सच्चाई सामने आ सकेगी।
पुलिस पर बढ़ा जवाबदेही का दबाव
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों पर मामले की अद्यतन स्थिति अदालत के समक्ष रखने की जिम्मेदारी बढ़ गई है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायालय द्वारा प्रतिशपथ पत्र मांगे जाने का अर्थ है कि जांच एजेंसी को अपने प्रत्येक कदम का स्पष्ट विवरण देना होगा।
यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही सामने आती है, तो अदालत आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।
मानवाधिकार और बाल सुरक्षा से जुड़ा मामला
विशेषज्ञों का कहना है कि नाबालिगों के अपहरण या लापता होने के मामलों में शुरुआती जांच बेहद महत्वपूर्ण होती है। समय पर कार्रवाई, तकनीकी साक्ष्यों का संग्रह, संभावित स्थानों पर छापेमारी और संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय से ऐसे मामलों के शीघ्र समाधान की संभावना बढ़ जाती है।
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि प्रत्येक लापता बच्चे के मामले में पुलिस को संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए ताकि पीड़ित परिवार को अनावश्यक मानसिक पीड़ा का सामना न करना पड़े।
कानूनी प्रक्रिया पर रहेगी नजर
अब इस मामले में सभी की निगाहें पुलिस द्वारा हाईकोर्ट में दाखिल किए जाने वाले प्रतिशपथ पत्र पर टिकी हैं। अदालत पुलिस की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद आगे की सुनवाई में आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।
यदि रिपोर्ट से अदालत संतुष्ट नहीं होती है, तो जांच में तेजी लाने, विशेष जांच टीम गठित करने या अन्य आवश्यक कदम उठाने संबंधी निर्देश भी दिए जा सकते हैं।
न्याय की उम्मीद में परिवार
करीब 15 महीने से अपनी बेटी की तलाश कर रहे परिवार के लिए हाईकोर्ट का यह आदेश उम्मीद की नई किरण लेकर आया है। परिवार चाहता है कि किशोरी का जल्द से जल्द पता लगाया जाए और यदि किसी ने अपराध किया है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई हो।
यह मामला एक बार फिर यह याद दिलाता है कि लापता और अपहरण से जुड़े मामलों में त्वरित, निष्पक्ष और प्रभावी जांच कितनी आवश्यक है। अदालत के हस्तक्षेप के बाद उम्मीद की जा रही है कि जांच में तेजी आएगी और लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवार को राहत मिल सकेगी।