पूर्णिया में समावेशी शिक्षा पर अभिभावक संगोष्ठी का आयोजन: दिव्यांग बच्चों के प्रति सम्मान और समान व्यवहार पर जोर, शिक्षकों और अभिभावकों ने साझा किए विचार

पूर्णिया: बिहार के पूर्णिया जिले में समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) को बढ़ावा देने और समाज के हर वर्ग के बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। हाल ही में जिले के एक प्रतिष्ठित विद्यालय परिसर में 'अभिभावक संगोष्ठी' (Parent-Teacher Meeting) का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (दिव्यांग बच्चों) के प्रति समाज और परिवार के दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव लाना तथा उन्हें सामान्य बच्चों के समान शैक्षणिक और सामाजिक अवसर प्रदान करना था। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं के माता-पिता, शिक्षकों और प्रबुद्ध नागरिकों ने हिस्सा लिया।

संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य: समावेशी शिक्षा की महत्ता

आज के समय में शिक्षा केवल साक्षरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर बच्चे के सर्वांगीण विकास का माध्यम है। समावेशी शिक्षा का अर्थ है कि शारीरिक या मानसिक रूप से भिन्नता रखने वाले बच्चे भी सामान्य बच्चों के साथ एक ही कक्षा में बैठकर शिक्षा ग्रहण करें। पूर्णिया में आयोजित इस संगोष्ठी में वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि दिव्यांग बच्चों को किसी भी रूप में हीन भावना का शिकार नहीं होने देना चाहिए।

विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने अपने संबोधन में अभिभावकों को संबोधित करते हुए कहा कि दिव्यांग बच्चों के प्रति सम्मान और उनके साथ समान व्यवहार करना हमारा नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है। जब तक परिवार और समाज बच्चों को बराबर का दर्जा नहीं देंगे, तब तक उनका पूर्ण मानसिक और सामाजिक विकास संभव नहीं है।

शिक्षक-शिक्षिकाओं द्वारा शिक्षा, अनुशासन और सहयोगात्मक व्यवहार पर मार्गदर्शन

संगोष्ठी के दौरान विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने अभिभावकों के साथ विस्तार से चर्चा की और बच्चों की परवरिश से जुड़े कई अहम पहलुओं पर प्रकाश डाला:

शिक्षा के प्रति जागरूकता: शिक्षकों ने अभिभावकों को बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजने और उनकी पढ़ाई-लिखाई पर घर पर भी ध्यान देने की सलाह दी।

अनुशासन का महत्व: बच्चों के जीवन में अनुशासन की भूमिका को समझाते हुए शिक्षकों ने कहा कि प्यार और अनुशासन का संतुलन ही बच्चों को एक बेहतर इंसान बनाता है।

सहयोगात्मक व्यवहार: दिव्यांग या विशेष बच्चों के साथ घर और विद्यालय दोनों जगहों पर सहयोगात्मक और आत्मीय व्यवहार अपनाने पर जोर दिया गया, ताकि वे हीनता का शिकार न हों और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी और अनुभव साझा करना

इस संगोष्ठी की सबसे खास बात यह रही कि इसमें अभिभावकों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपने विचार साझा किए। कई अभिभावकों ने माना कि इस तरह के आयोजनों से उन्हें अपने बच्चों की परवरिश और उनकी मानसिक स्थिति को समझने में बहुत मदद मिलती है। कुछ अभिभावकों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे पहले दिव्यांग बच्चों को लेकर थोड़े संकोच में रहते थे, लेकिन शिक्षकों के मार्गदर्शन के बाद अब वे अपने बच्चों को लेकर अधिक जागरूक और आत्मविश्वासी महसूस कर रहे हैं।

निष्कर्ष और भविष्य की रूपरेखा

संगोष्ठी के अंत में विद्यालय प्रशासन ने सभी अभिभावकों का आभार व्यक्त किया और यह संकल्प लिया कि भविष्य में भी इस तरह के जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता रहेगा। समावेशी शिक्षा के इस प्रयास से पूर्णिया के शैक्षिक परिदृश्य में एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है, जिससे न केवल विशेष बच्चों का मनोबल बढ़ रहा है, बल्कि समाज में समरसता और संवेदनशीलता की भावना भी मजबूत हो रही है।