15 जून से पानी के अभाव में ठप रोपनी: किसानों का संघर्ष और संकट का विश्लेषण
15 जून, यह वह तारीख है जो भारत के अधिकांश कृषि प्रधान क्षेत्रों, विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, धान की रोपनी के लिए एक 'डेडलाइन' या शुभ समय की तरह देखी जाती है। किसान अपने बिचड़े (धान की नर्सरी) को पूरी मुस्तैदी से तैयार कर लेते हैं, खेतों की जुताई कर उसे तैयार कर लेते हैं, लेकिन जब बारी आती है नन्हे पौधों को कीचड़ भरे खेतों में रोपने की, तो मुख्य खलनायक बनकर सामने आता है—पानी का अभाव।
इस साल भी स्थिति कमोबेश वैसी ही बनी हुई है। मानसून की बेरुखी और सिंचाई संसाधनों की विफलता के कारण लाखों किसान एक अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं।
संकट का स्वरूप: बिचड़ा तैयार, खेत सूखी मिट्टी
कृषि विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों का मानना है कि धान की रोपनी के लिए 15 जून से 15 जुलाई का समय सबसे उपयुक्त होता है। इस दौरान बिचड़े की आयु भी रोपनी के लिए परिपक्व (लगभग 20-25 दिन) हो जाती है।
बिचड़े की बर्बादी का डर: बिचड़ा तैयार होने के बाद उसे लंबे समय तक नर्सरी में नहीं छोड़ा जा सकता। यदि उसे समय पर नहीं रोपा गया, तो वह अपनी उर्वरक क्षमता खो देता है, पौधों की लंबाई बढ़ जाती है, और अंततः पैदावार में भारी गिरावट आती है।
खेतों की दरारें: जिन खेतों को पानी से लबालब होना चाहिए था, वे आज सूखकर चटक गए हैं। कंक्रीट जैसी कठोर मिट्टी में हल चलाना असंभव हो गया है, जिससे जुताई का खर्च भी दोगुना हो रहा है।
लागत में वृद्धि: जिन किसानों के पास पंपिंग सेट की सुविधा है, वे डीजल जलाकर सिंचाई करने को मजबूर हैं। बढ़ती डीजल की कीमतों ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया है।
पानी के अभाव के पीछे के मुख्य कारण
यह संकट केवल अचानक पैदा नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे कई दीर्घकालिक और तात्कालिक कारण जिम्मेदार हैं:
मानसून का विलंब: जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून के पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। बारिश अब या तो बहुत देर से आती है या एक ही बार में इतनी होती है कि बाढ़ आ जाती है।
भूजल स्तर में गिरावट: लगातार दोहन के कारण वाटर टेबल इतना नीचे चला गया है कि अधिकांश सरकारी और निजी नलकूप (Tubewells) या तो सूख गए हैं या पर्याप्त पानी नहीं दे पा रहे हैं।
नहरों का जीर्णोद्धार न होना: कई क्षेत्रों में नहरें मौजूद हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में वे कचरे से पटी पड़ी हैं। अंतिम छोर तक पानी नहीं पहुंचने के कारण किसानों को एक बड़ा हिस्सा सिंचाई से वंचित रह जाता है।
बिजली की समस्या: ग्रामीण क्षेत्रों में निर्बाध बिजली की कमी ने भी पंपिंग सेट के संचालन को प्रभावित किया है।
किसानों पर प्रभाव: मानसिक और आर्थिक मार
एक किसान के लिए रोपनी केवल एक कृषि कार्य नहीं, बल्कि पूरे साल की जीविका का आधार है।
आर्थिक बोझ: मजदूरी की लागत, डीजल का खर्च और खाद-बीज का निवेश सब कुछ दांव पर लगा है। यदि रोपनी में और देरी हुई, तो फसल तैयार होने में देरी होगी, जिससे आगामी रबी (गेहूं) की फसल पर भी असर पड़ेगा।
मानसिक तनाव: कर्ज लेकर खेती करने वाले छोटे किसान इस स्थिति में सबसे अधिक पिस रहे हैं। परिवार की जरूरतें और भविष्य की चिंता उन्हें अवसाद की ओर धकेल रही है।
मजदूरों का पलायन: गांव के खेतिहर मजदूर, जो रोपनी के समय काम की उम्मीद रखते थे, काम न मिलने के कारण शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।
संभावित समाधान और भविष्य की राह
इस विकट स्थिति से निपटने के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर ठोस प्रयासों की आवश्यकता है:
सरकारी हस्तक्षेप:
डीजल सब्सिडी: सरकार को तुरंत प्रभाव से किसानों को डीजल पर भारी सब्सिडी देनी चाहिए ताकि वे पंपिंग सेट के जरिए खेती कर सकें।
नहरों की सफाई: युद्धस्तर पर नहरों की खुदाई और सफाई का अभियान चलाया जाना चाहिए।
तकनीकी अपनाव:
एसआरआई (SRI) विधि: 'सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन' (SRI) तकनीक को बढ़ावा देना चाहिए, जिसमें कम पानी में अधिक उत्पादन होता है।
ड्रिप सिंचाई: धान के लिए भी सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों पर अनुसंधान और उन्हें अपनाने की आवश्यकता है।
जल संरक्षण (Water Harvesting):
खेतों के पास छोटे तालाबों का निर्माण और वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना होगा।
फसल विविधीकरण (Crop Diversification):
जिन क्षेत्रों में पानी की अत्यधिक कमी है, वहां किसानों को धान की जगह कम पानी वाली फसलों (जैसे मक्का, दलहन, या मोटे अनाज) की ओर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए
15 जून बीत चुका है और आसमान की ओर ताकते किसानों की आंखों में नमी कम, उम्मीद की किरण ज्यादा है। यह संकट हमें याद दिलाता है कि हमारी खाद्य सुरक्षा कितनी नाजुक है और यह सीधे तौर पर पर्यावरण और जल प्रबंधन से जुड़ी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो न केवल इस वर्ष की फसल प्रभावित होगी, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए भी एक बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा।