1283 कर्मियों की फौज के बावजूद गंदगी का अंबार, योजना पूरी तरह बेअसर

मुंगेर: बिहार सरकार द्वारा राज्य को स्वच्छ और सुंदर बनाने की परिकल्पना के साथ शुरू की गई 'लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान' (LSBA) की चमक मुंगेर के गंगा तटीय दियारा क्षेत्र में पूरी तरह फीकी पड़ गई है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो यहाँ स्वच्छता व्यवस्था को चाक-चौबंद रखने के लिए एक बड़ी फौज तैनात है—दर्जनों पर्यवेक्षक और 1283 स्वच्छता कर्मी। लेकिन, इन भारी-भरकम आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर इतना गहरा है कि यह योजना क्षेत्र में पूरी तरह बेअसर साबित हो रही है।

आंकड़ों का जाल और जमीनी सन्नाटा

प्रशासनिक फाइलों में मुंगेर के दियारा क्षेत्र के लिए स्वच्छता कर्मियों की नियुक्ति एक बड़ी उपलब्धि के रूप में दर्ज है। 1283 स्वच्छता कर्मियों को विशेष कार्य सौंपे गए हैं, ताकि गांव-गांव से कचरा उठाव हो सके और गलियां स्वच्छ रहें। लेकिन जब संवाददाता नवीन कुमार झा ने क्षेत्र का दौरा किया, तो नजारा कुछ और ही था।

दियारा के गांवों की संकरी गलियों में कचरे का अंबार लगा है। नाली का पानी सड़कों पर बह रहा है और सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी के कारण बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने महीनों से किसी भी स्वच्छता कर्मी को झाड़ू लगाते या कचरा उठाते नहीं देखा है।

योजना के विफल होने के मुख्य कारण

दियारा की भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक सुस्ती ने इस योजना को 'सफेद हाथी' बना दिया है। इसके प्रमुख कारणों का विश्लेषण निम्न है:

 निगरानी का अभाव (Lack of Monitoring)

पर्यवेक्षकों की नियुक्ति तो की गई है, लेकिन उनकी उपस्थिति नगण्य है। 'ऑन-पेपर' स्वच्छता की रिपोर्टिंग करने वाले ये पर्यवेक्षक कभी क्षेत्र का औचक निरीक्षण करने नहीं आते। प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव ही इस विफलता की जड़ है।

संसाधनों का घोर अभाव

स्वच्छता कर्मियों को केवल नियुक्त कर देना ही काफी नहीं है। उनके पास कचरा ढोने के लिए आवश्यक ई-रिक्शा, कूड़ेदान (Dustbins), दस्ताने और सफाई के अन्य उपकरण ही नहीं हैं। जब कर्मियों के पास संसाधन ही नहीं होंगे, तो वे सफाई कैसे करेंगे?

 भौगोलिक चुनौती बनाम प्रशासनिक उदासीनता

दियारा इलाका मुख्य शहर से कटा हुआ है, लेकिन इसे बहाना बनाकर प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है। कचरा डंपिंग के लिए कोई ठोस जगह नहीं है, जिसके कारण सफाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है।

 'जियो-टैगिंग' और पारदर्शिता की कमी

आज के डिजिटल दौर में, यदि इन 1283 कर्मियों की उपस्थिति और उनके दैनिक कार्य की 'जियो-टैगिंग' (Geo-tagging) की जाए, तो सच्चाई तुरंत सामने आ जाएगी। लेकिन पारदर्शिता की कमी के कारण यह प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं की गई है।

क्या कहते हैं स्थानीय निवासी?

दियारा के ग्रामीणों का आक्रोश स्पष्ट है। उनका कहना है कि सरकारी रिकॉर्ड में उनका क्षेत्र 'ओडीएफ' (ODF) या 'स्वच्छ' घोषित कर दिया गया होगा, लेकिन हकीकत यह है कि उन्हें गंदगी के बीच ही जीवन जीना पड़ रहा है।

ग्रामीणों की पीड़ा: "हम हर बार सफाई की मांग करते हैं, लेकिन हमें केवल आश्वासन मिलता है। जब सरकारी फाइलों में सफाई कर्मचारी तैनात हैं, तो आखिर काम कौन कर रहा है? या फिर क्या यह केवल वेतन हड़पने का माध्यम है?"

सुधारात्मक कदम: अब क्या करना चाहिए?

यदि प्रशासन वास्तव में दियारा की तस्वीर बदलना चाहता है, तो उसे पुरानी लीक से हटकर नए उपाय अपनाने होंगे:

सोशल ऑडिट (Social Audit): प्रत्येक पंचायत में स्वच्छता कार्य का सोशल ऑडिट कराया जाए, जिसमें गांव के लोग स्वयं सफाई कार्य की गुणवत्ता की जांच करें।

प्रदर्शन आधारित भुगतान: वेतन केवल उपस्थिति पर नहीं, बल्कि कार्य के निष्पादन पर दिया जाए। यदि सफाई नहीं है, तो भुगतान रुकना चाहिए।

संसाधन उपलब्धता: सबसे पहले कचरा संग्रहण के लिए ई-रिक्शा और डोर-टू-डोर कलेक्शन की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित हो।

पर्यवेक्षकों की जवाबदेही: यदि किसी वार्ड या गांव में गंदगी मिलती है, तो संबंधित पर्यवेक्षक को सीधे उत्तरदायी ठहराकर उस पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।

मुंगेर का दियारा क्षेत्र स्वच्छता अभियान के नाम पर चल रहे 'खेल' का एक बड़ा उदाहरण बन गया है। 1283 कर्मियों की नियुक्ति केवल एक संख्या बनकर रह गई है, जिसका जनजीवन पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ रहा है। स्वच्छता अभियान की सफलता तब तक नहीं मिल सकती, जब तक प्रशासनिक तंत्र 'फाइल संस्कृति' से बाहर आकर 'फील्ड संस्कृति' को नहीं अपनाएगा।