बाबा बैद्यनाथ की दरबार में पूरी हुई मुजफ्फरपुर के मिथलेश की अनूठी मन्नत; छह वर्षों की कठिन तपस्या और अटूट विश्वास के बाद घर में गूंजी किलकारी, शिवभक्तों में चर्चा का विषय बनी यह आस्था की कहानी

देवघर/मुजफ्फरपुर, विशेष संवाददाता: श्रावण मास के इस पवित्र और पावन अवसर पर बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी आस्था और चमत्कार की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हर किसी को भावुक कर रही है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाले शिवभक्त मिथलेश कुमार (काल्पनिक/वास्तविक नाम संदर्भानुसार) की बाबा बैद्यनाथ के प्रति अटूट निष्ठा का एक अद्भुत फल मिला है। मिथलेश ने अपनी गोद में पुत्री प्राप्ति की लालसा को लेकर आज से छह साल पहले बाबा बैद्यनाथ से विशेष मन्नत मांगी थी। लगातार छह वर्षों तक हर साल श्रावण मास में कठिन कांवर यात्रा पूरी करने और अटूट साधना के बाद, आखिरकार बाबा ने उनकी झोली भर दी है। उनके घर में नन्हीं परी के आने से जहां परिवार में उत्सव का माहौल है, वहीं देवघर से लेकर मुजफ्फरपुर तक यह खबर आस्था और विश्वास की एक मिसाल बन गई है।

क्या थी मिथलेश की मन्नत और छह साल का संघर्ष?

हर माता-पिता की तरह मुजफ्फरपुर निवासी मिथलेश के जीवन में भी एक विशेष सपना था, लेकिन समय के साथ जब उन्हें संतान सुख (विशेषकर पुत्री रत्न की प्राप्ति) में अड़चनें आने लगीं, तो उन्होंने ऐलौकिक शक्ति यानी भगवान शिव की शरण में जाने का निर्णय लिया:

छह वर्ष पूर्व की गई थी अर्जी: आज से ठीक छह साल पहले, जब मिथलेश निराशा के दौर से गुजर रहे थे, वे सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचे थे। गर्भगृह में प्रवेश कर उन्होंने पूरी श्रद्धा के साथ बाबा से प्रार्थना की थी कि यदि उनके घर बेटी का जन्म होता है, तो वे जीवनपर्यंत हर साल सावन में नियमपूर्वक कांवर यात्रा करेंगे।

कठिन और अडिग संकल्प: एक आम इंसान के लिए लगातार छह वर्षों तक सावन के महीने में कठिन मौसम, छाले पड़े पैरों और भारी भीड़ के बीच 105 किलोमीटर की लंबी पैदल यात्रा करना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन मिथलेश का संकल्प चट्टान की तरह मजबूत था। वे हर साल अपनी मन्नत को याद करते हुए बिना चूके बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते रहे।

परिवार में गूंजी किलकारी, विश्वास हुआ अमर

इस वर्ष जैसे ही श्रावण मास की शुरुआत हुई और मिथलेश अपनी छठी कांवर यात्रा की तैयारी कर रहे थे, ठीक उसी समय उनके घर से एक ऐसा सुखद समाचार आया जिसने उनकी बरसों की तपस्या को सफल कर दिया:

घर में आई लक्ष्मी: मिथलेश के घर एक स्वस्थ और सुंदर कन्या का जन्म हुआ। बेटी के रूप में घर में लक्ष्मी का आगमन होते ही पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।

बाबा का दरबार बना जीवन का आधार: नवजात शिशु के आगमन के बाद मिथलेश की आंखें नम थीं और जुबान पर सिर्फ बाबा बैद्यनाथ का नाम था। उनका मानना है कि यह किसी चिकित्सीय चमत्कार से कम नहीं, बल्कि यह सीधे तौर पर देवघर के आशुतोष भगवान भोलेनाथ की असीम अनुकंपा का परिणाम है।

श्रावणी मेले में चर्चा का केंद्र बनी यह अनूठी घटना

जब मिथलेश इस वर्ष अपनी छठी और संकल्पित अंतिम कांवर यात्रा पर सुलतानगंज से देवघर के लिए रवाना हुए, तो उन्होंने अपनी इस निजी और भावुक कहानी को साथी कांवरियों के साथ साझा किया:

भक्तों में बढ़ा उत्साह: सुलतानगंज से लेकर देवघर तक के रास्ते में जब लोगों को यह पता चला कि यह कांवरिया पुत्री प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर बाबा का आभार जताने आ रहा है, तो हर कोई अभिभूत हो गया। जगह-जगह लोगों ने उनका स्वागत किया और उनकी इस अटूट निष्ठा की सराहना की।

सनातन संस्कृति में अटूट विश्वास: समाज के जानकारों और स्थानीय लोगों का कहना है कि आज के आधुनिक दौर में भी जहां लोग हर बात के पीछे तार्किकता ढूंढते हैं, वहीं इस प्रकार की घटनाएं यह साबित करती हैं कि मनुष्य की सच्ची प्रार्थना और भगवान के प्रति समर्पण कभी निष्फल नहीं जाता।

मुजफ्फरपुर के मिथलेश और उनकी पुत्री की यह कहानी केवल एक व्यक्ति की निजी आस्था नहीं है, बल्कि यह श्रावण मेले के उस पवित्र ताने-बाने का हिस्सा है जहां हर कांवरिया अपनी किसी न किसी उम्मीद, मन्नत या धन्यवाद के भाव के साथ बाबा के दर पर पहुंचता है। छह वर्षों की तपस्या और अंत में मिली इस अपार खुशी ने यह फिर से साबित कर दिया है कि बाबा बैद्यनाथ अपने हर सच्चे भक्त की पुकार सुनते हैं, और जब महादेव की कृपा बरसती है, तो असंभव भी संभव हो जाता है।