शवदाह के बाद स्नान करने उतरे अधेड़ की डूबने से मौत, अंधेरे ने सर्च ऑपरेशन में डाला खलल

भागलपुर/कहलगांव: भागलपुर जिले के गंगा घाट पर एक बार फिर मातम पसर गया है। दाह संस्कार के बाद पवित्र गंगा में स्नान करने उतरे एक अधेड़ व्यक्ति की गहरे पानी में डूबने से दर्दनाक मौत हो गई। घटना के तुरंत बाद हड़कंप मच गया, लेकिन अंधेरा इतना घना था कि शव की तलाश में रात भर चली कोशिशें नाकाम रहीं। इस घटना ने एक बार फिर गंगा घाटों पर सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है।

घटना का विवरण: खुशी और मातम का मिला-जुला मंजर

मिली जानकारी के अनुसार, पीड़ित व्यक्ति अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ एक परिचित के अंतिम संस्कार में शामिल होने गंगा तट पर गया था। दाह संस्कार की सभी रस्में पूरी करने के बाद, परंपरा के अनुसार सभी परिजन स्नान करने के लिए गंगा में उतरे।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अधेड़ व्यक्ति गहरे पानी की ओर चला गया। अचानक उनका पैर फिसला या वे तेज बहाव की चपेट में आ गए, इस बात का अंदाजा कोई नहीं लगा पाया। जब उन्होंने मदद के लिए हाथ ऊपर उठाए, तो पास मौजूद अन्य लोगों ने उन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन देखते ही देखते वे पानी की तेज लहरों में ओझल हो गए। पल भर में शवदाह की राख की शांति, चीखों और कोहराम में बदल गई।

अंधेरे ने रोकी राह: सर्च ऑपरेशन में बाधा

घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय गोताखोरों और पुलिस की टीम मौके पर पहुंची। हालांकि, तब तक सूर्यास्त हो चुका था और घाट पर घना अंधेरा छा गया था।

प्रशासन की लाचारी: अंधेरे के कारण पानी के अंदर गोताखोरों का उतरना अत्यंत जोखिम भरा था, इसलिए रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

परिजनों का दर्द: रात भर गंगा के किनारे बिलखते परिजनों का दुख शब्दों से परे था। प्रशासन की ओर से रोशनी (फ्लड लाइट) की व्यवस्था करने की मांग की गई, ताकि कम से कम शव को ढूँढा जा सके, लेकिन नदी के गहरे बहाव और अंधेरे के कारण सर्च अभियान को अगले दिन सुबह तक के लिए टालना पड़ा।

गंगा घाटों की असुरक्षा: कौन है जिम्मेदार?

यह कोई पहली घटना नहीं है। भागलपुर और कहलगांव के गंगा घाटों पर हर साल दर्जनों लोग इसी तरह अपनी जान गंवाते हैं।

चेतावनी बोर्ड का अभाव: अक्सर घाटों पर पानी की गहराई और खतरनाक जगहों के बारे में कोई संकेत या चेतावनी बोर्ड नहीं लगा होता।

गोताखोरों की स्थायी नियुक्ति का अभाव: प्रशासन की ओर से संवेदनशील घाटों पर स्थायी रूप से गोताखोर या सुरक्षा कर्मियों की तैनाती नहीं है।

अंधेरे की समस्या: श्मशान घाट के पास शाम के समय पर्याप्त रोशनी न होना, दुर्घटनाओं को न्योता देता है।

प्रशासनिक उदासीनता और स्थानीय आक्रोश

स्थानीय निवासियों का कहना है कि बार-बार मांग करने के बावजूद घाटों के सुंदरीकरण और सुरक्षा व्यवस्था पर प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा है। एक स्थानीय नागरिक ने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा, "जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, प्रशासन जागता नहीं है। क्या दाह संस्कार के लिए आने वाले लोगों की सुरक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?"

सुबह का इंतजार: उम्मीद और अनिश्चितता

जैसे-जैसे रात बीतती गई, गंगा के किनारे मौजूद लोगों की भीड़ में बेचैनी बढ़ती गई। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि सुबह होते ही 'एसडीआरएफ' (SDRF) की टीम बुलाई जाएगी और आधुनिक उपकरणों के जरिए शव की तलाश की जाएगी। लेकिन परिजनों के लिए यह पूरी रात किसी युग के समान लंबी है। उनकी उम्मीदें उस गंगा की लहरों पर टिकी हैं, जिसने उनके अपने को अपने आगोश में ले लिया है।

 सबक लेने की जरूरत

यह घटना हमें याद दिलाती है कि गंगा का किनारा जितना पवित्र है, उतना ही खतरनाक भी। दाह संस्कार के बाद मानसिक रूप से विचलित और दुखी लोग अक्सर नियमों को भूल जाते हैं। प्रशासन को चाहिए कि वह न केवल श्मशान घाटों पर सुरक्षा घेरा बनाए, बल्कि वहां 'डेंजर जोन' चिह्नित करे और पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था सुनिश्चित करे।

मजबूरी में अंतिम संस्कार के लिए आने वाले लोगों को कम से कम सुरक्षित वापसी का अहसास तो होना चाहिए। फिलहाल, पूरा गांव उस दुर्भाग्यशाली व्यक्ति के शव के मिलने की प्रार्थना कर रहा है ताकि अंतिम रस्में पूरी हो सकें।