कानपुर के उर्सला अस्पताल में बड़ा प्रशासनिक घपला: महिला बंदी का 35 दिनों तक गुपचुप इलाज करते रहे ईएमओ; अस्पताल प्रबंधन को भनक तक नहीं लगी, अब मांगा गया स्पष्टीकरण; विशेषज्ञ डॉक्टरों को दरकिनार कर खुद ही इलाज कर रहे थे डॉक्टर

कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक सरकारी अस्पतालों में शुमार उर्सला अस्पताल (Ursula Hospital) से एक बेहद चौंकाने वाला और प्रशासनिक लापरवाही का सनसनीखेज मामला सामने आया है। अस्पताल के आपातकालीन चिकित्सा अधिकारी (EMO) की एक बड़ी और संदेहास्पद कार्यशैली उजागर हुई है, जहां एक महिला बंदी का पिछले 35 दिनों से पूरी तरह गुपचुप तरीके से इलाज किया जा रहा था। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस बात की भनक या आधिकारिक सूचना ईएमओ ने जिला अस्पताल के मुख्य प्रबंधन या उच्च अधिकारियों को देना जरूरी नहीं समझा। जब इस मामले का खुलासा हुआ तो स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। अब आरोपी ईएमओ से इस गंभीर लापरवाही को लेकर स्पष्टीकरण (Show Cause Notice) मांगा गया है। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि पेट में तेज दर्द से परेशान उस महिला बंदी का इलाज किसी गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट या अन्य विशेषज्ञ (Specialist) से कराने के बजाय, ईएमओ ने खुद ही अपने स्तर पर संभाल रखा था।

प्रकरण की शुरुआत: महिला बंदी और अस्पताल में भर्ती होने का खेल

यह पूरा मामला जेल में बंद एक महिला कैदी के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है, जिसे इलाज के नाम पर उर्सला अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन इसके बाद जो हुआ वह नियमों की खुली धज्जियां उड़ाने जैसा था।

पेट में तेज दर्द की शिकायत: संबंधित महिला बंदी को कुछ हफ़्तों पहले पेट में अत्यधिक और असहनीय दर्द की शिकायत हुई थी। जेल प्रशासन या पुलिस सुरक्षा के बीच उसे इलाज के लिए कानपुर के उर्सला अस्पताल लाया गया था।

इलाज के नाम पर लंबी अवधि: आमतौर पर आपातकालीन मामलों या कैदियों के इलाज के लिए एक निश्चित प्रक्रिया होती है, जिसमें अस्पताल प्रबंधन और जेल प्रशासन के बीच लगातार पत्राचार और रिकॉर्ड रखरखाव होता है। लेकिन इस मामले में महिला बंदी को अस्पताल में रखे हुए पूरे 35 दिन बीत गए और किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई।

ईएमओ की संदिग्ध भूमिका: 35 दिनों तक छिपाए रखा राज

उर्सला अस्पताल के ईएमओ (EMO) की भूमिका इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा संदग्ध और सवालों के घेरे में है।

प्रबंधन को सूचना न देना: अस्पताल के नियमों के अनुसार, यदि कोई कैदी या बंदी लंबी अवधि के लिए अस्पताल में भर्ती रहता है, तो इसकी नियमित सूचना मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) और अस्पताल प्रशासन को दी जानी चाहिए। लेकिन ईएमओ ने इस नियम को ताक पर रख 35 दिनों तक इस मामले को पूरी तरह गोपनीय बनाए रखा।

विशेषज्ञों को दरकिनार किया: एक महिला बंदी जो पेट के गंभीर दर्द से पीड़ित थी, उसका इलाज किसी वरिष्ठ सर्जन या पेट रोग विशेषज्ञ (Gastroenterologist) द्वारा किया जाना चाहिए था। इसके बजाय, ईएमओ ने खुद ही उसका उपचार करना उचित समझा। चिकित्सा जगत के जानकारों का मानना है कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह के बिना इस तरह का जोखिम उठाना न केवल मरीज की जान के साथ खिलवाड़ है, बल्कि यह चिकित्सीय आचार संहिता (Medical Ethics) के भी खिलाफ है।

कैसे हुआ इस बड़े खेल का खुलासा?

इतने लंबे समय तक कागजों और प्रशासनिक नजरों से छिपकर चल रहा यह खेल अचानक तब उजागर हुआ जब अस्पताल के भीतर आंतरिक समीक्षा और औचक निगरानी की प्रक्रिया तेज हुई।

अधिकारियों की सुगबुगाहट: जब अस्पताल के रिकॉर्ड की री-चेकिंग की गई और वार्डों का भौतिक सत्यापन हुआ, तब यह बात सामने आई कि एक महिला बंदी पिछले एक महीने से अधिक समय से चुपचाप अस्पताल के एक कोने में भर्ती है और उसका कोई आधिकारिक अपडेट प्रबंधन के पास दर्ज नहीं है।

फाइलों की पड़ताल: इसके बाद जब पड़ताल की गई तो पता चला कि यह पूरा प्रकरण संबंधित ईएमओ की देखरेख में बिना किसी उच्चाधिकारी की अनुमति के चल रहा था। इसके तुरंत बाद अस्पताल प्रशासन हरकत में आया और इस मामले की फाइल तलब की गई।

प्रशासनिक कार्रवाई और स्पष्टीकरण तलब

मामले की गंभीरता को देखते हुए उर्सला अस्पताल के मुख्य प्रबंधन ने कड़ा रुख अपनाया है और आरोपी डॉक्टर से जवाब तलब किया है।

कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice): अस्पताल प्रशासन ने संबंधित ईएमओ को औपचारिक रूप से नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि आखिर किस नियम के तहत महिला बंदी के इलाज को 35 दिनों तक गुप्त रखा गया और प्रबंधन को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई?

बड़ी कार्रवाई की तलवार: सूत्रों का कहना है कि यदि ईएमओ का जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो उनके खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) बैठाकर शासन स्तर पर कड़ी कार्रवाई की संस्तुति की जा सकती है, क्योंकि यह मामला जेल के नियमों और अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था दोनों से जुड़ा हुआ है।

कानपुर के उर्सला अस्पताल में एक महिला बंदी का 35 दिनों तक गुपचुप तरीके से इलाज किए जाने और इस बात की भनक प्रबंधन को न लगने देने का यह मामला प्रशासनिक अराजकता की पराकाष्ठा को दर्शाता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनदेखी कर खुद ही इलाज की कमान संभालने वाले ईएमओ की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर लापरवाही पर कितनी सख्त और नजीर पेश करने वाली कार्रवाई करता है।