अल्ट्रासाउंड के लिए स्ट्रेचर पर मरीजों की लंबी कतार, मरीजों की मुसीबतें बेहिसाब

भागलपुर: सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार के तमाम दावों के बीच भागलपुर के एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र से आई तस्वीरें सरकारी दावों की पोल खोल रही हैं। अल्ट्रासाउंड (USG) जांच के लिए मरीजों को घंटों स्ट्रेचर पर पड़े रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। अस्पताल परिसर में मरीजों की लगी लंबी कतार और स्ट्रेचर पर दर्द से कराहते लोगों की यह तस्वीर स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाती है।

दर्द और लाचारी का मंजर

अल्ट्रासाउंड विभाग के बाहर का नजारा हृदयविदारक है। ओपीडी के चक्कर काटने के बाद जब मरीजों को अल्ट्रासाउंड की सलाह दी जाती है, तो उनकी असली परीक्षा तब शुरू होती है। एक तरफ जहां भारी भीड़ है, वहीं दूसरी तरफ सीमित संसाधनों और तकनीकी खराबी के कारण मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कई मरीज ऐसे हैं जो चलने-फिरने में असमर्थ हैं, उन्हें स्ट्रेचर पर ही लिटाकर घंटों लाइन में रखा जा रहा है। भीषण गर्मी और अव्यवस्था के बीच मरीजों के परिजनों का सब्र अब जवाब देने लगा है।

अव्यवस्था का कारण: क्या है असल समस्या?

सूत्रों और स्थानीय लोगों की मानें तो अल्ट्रासाउंड विभाग में अव्यवस्था के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

तकनीकी खामियां: अस्पताल में अल्ट्रासाउंड मशीनें अक्सर खराब रहती हैं या बहुत पुरानी हैं, जिससे जांच की गति बहुत धीमी हो जाती है।

कर्मचारियों की कमी: रेडियोलॉजिस्ट या तकनीशियनों की भारी कमी के कारण जांच प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाती।

भारी दबाव: पूरे जिले और आसपास के क्षेत्रों के मरीज इसी केंद्र पर निर्भर हैं, जिससे मरीजों का अनुपात उपलब्ध संसाधनों के मुकाबले काफी अधिक हो जाता है।

प्रशासन के दावे और धरातल की सच्चाई

अस्पताल प्रबंधन की ओर से समय-समय पर 'सुधार' के दावे किए जाते हैं। हाल ही में डिजिटल व्यवस्था और टोकन सिस्टम लागू करने की बात कही गई थी, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस है। कतार में खड़ी एक महिला ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "सुबह 8 बजे से लाइन में लगे हैं, दोपहर के 2 बज गए, अभी तक नंबर नहीं आया। यहां कोई सुनने वाला नहीं है।"

स्ट्रेचर पर इलाज: स्वास्थ्य सुरक्षा से समझौता

स्ट्रेचर पर मरीजों का घंटों इंतज़ार करना न केवल उनके प्रति अमानवीय है, बल्कि यह संक्रमण (Infection) के खतरे को भी बढ़ाता है। एक ही स्ट्रेचर पर एक मरीज के बाद दूसरे मरीज को घंटों बिठाए रखना स्वच्छता के मानकों का भी उल्लंघन है। कई मरीज गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, जिन्हें तत्काल जांच की जरूरत है, लेकिन सिस्टम की सुस्ती उनकी जान पर भारी पड़ सकती है।

प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल

स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग को इस पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए।

वैकल्पिक व्यवस्था: जब मशीन खराब हो या भीड़ अधिक हो, तो क्या वैकल्पिक केंद्रों की सुविधा मरीजों को नहीं दी जा सकती?

अतिरिक्त संसाधन: यदि मरीजों का भार अधिक है, तो क्या पीपीपी मोड (PPP Mode) पर या अतिरिक्त मशीनें लगाकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता?

परिजनों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समाधान चाहिए। सरकार स्वास्थ्य योजनाओं के लिए करोड़ों का बजट जारी करती है, लेकिन वह बजट इन मरीजों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है? क्या अल्ट्रासाउंड के लिए मरीजों का तड़पना ही सरकारी अस्पताल की नियति बन चुकी है?

भागलपुर के स्वास्थ्य केंद्रों पर अल्ट्रासाउंड के लिए लगी यह लंबी कतारें केवल मरीजों की नहीं, बल्कि उस पूरी प्रणाली की विफलता है जो गरीबों को मुफ्त इलाज का सपना दिखाती है। जब तक बुनियादी संसाधनों—मशीनों की संख्या और मैनपावर—में वृद्धि नहीं होगी, तब तक मरीजों को इसी तरह स्ट्रेचर पर अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ेगा। समय आ गया है कि स्वास्थ्य विभाग इस दिशा में ठोस और तत्काल कदम