उड़ती धूल और मिट्टी से स्थानीय ग्रामीण परेशान; ट्रैक्टरों पर त्रिपाल लगाने की मांग को लेकर लोगों में आक्रोश, प्रशासन से हस्तक्षेप की गुजारिश
बिहार के पूर्णिया जिले के अंतर्गत आने वाले ऐतिहासिक जलालगढ़ रेलवे स्टेशन (Jalalgarh Railway Station) के पास इन दिनों विभिन्न विकास कार्यों के तहत मिट्टी की कटाई और उसकी ढुलाई का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है। रेलवे या सड़क निर्माण से जुड़े इस कार्य से जहाँ एक तरफ क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास की उम्मीदें बंध रही हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर एक गंभीर जनसमस्या भी उत्पन्न हो गई है। मिट्टी ढोने वाले अनियंत्रित ट्रैक्टरों और भारी वाहनों के आवागमन के कारण पूरे इलाके में भारी मात्रा में धूल और मिट्टी (Dust and Mud Pollution) उड़ रही है, जिससे आसपास के राहगीरों और स्थानीय निवासियों का जीना मुहाल हो गया है।
परिस्थितियों से त्रस्त होकर ग्रामीणों ने अब आवाज उठानी शुरू कर दी है। ग्रामीणों की मुख्य माँग है कि मिट्टी ढोने वाले सभी ट्रैक्टरों और ट्रकों पर त्रिपाल (Tarpaulin Cover) अनिवार्य रूप से लगाया जाए ताकि ढुलाई के दौरान हवा में धूल न उड़े और सड़कें गंदी न हों। आइए जलालगढ़ रेलवे स्टेशन के पास चल रहे इस कार्य, स्थानीय लोगों की समस्याओं, प्रदूषण के दुष्प्रभावों और प्रशासनिक स्तर पर की जाने वाली कार्रवाई की मांग का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
समस्या की जड़: मिट्टी कटाई और बेलगाम ढुलाई का सिलसिला
विकास कार्यों के नाम पर जब सुरक्षा मानकों और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की जाती है, तो उसका सीधा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है।
अव्यवस्थित ढुलाई: जलालगढ़ रेलवे स्टेशन के समीप से बड़े पैमाने पर मिट्टी की कटाई की जा रही है और उसे ट्रकों तथा ट्रैक्टरों के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाया जा रहा है।
ढकने की व्यवस्था का अभाव: नियम यह कहता है कि खुले में किसी भी निर्माण सामग्री या मिट्टी को ले जाते समय उसे ऊपर से अच्छी तरह ढका जाना चाहिए, ताकि वह रास्ते में हवा के झोंकों से उड़कर आसपास के वातावरण को प्रदूषित न करे। लेकिन यहाँ धड़ल्ले से बिना ढके हुए ट्रैक्टर सरपट दौड़ रहे हैं, जिससे स्थिति बद से बदतर हो गई है।
स्थानीय लोगों की पीड़ा: उड़ती धूल से स्वास्थ्य और जनजीवन पर संकट
रेलवे स्टेशन के आसपास घनी आबादी और बाजार क्षेत्र होने के कारण इस धूल भरी स्थिति का प्रभाव बहुत व्यापक स्तर पर पड़ रहा है।
स्वास्थ्य पर बुरा असर: हवा में उड़ने वाले मिट्टी के महीन कण स्थानीय लोगों की सांसों के जरिए उनके फेफड़ों तक पहुँच रहे हैं, जिससे दमा, सांस की तकलीफ, खांसी और आँखों में जलन जैसी गंभीर बीमारियाँ फैलने का खतरा पैदा हो गया है। बुजुर्गों और छोटे बच्चों के लिए यह स्थिति और भी अधिक खतरनाक साबित हो रही है।
घरों और दुकानों का हाल: सड़कों के किनारे स्थित घरों और दुकानों के अंदर दिनभर धूल की मोटी परत जम जाती है। लोग अपने घरों के दरवाजे और खिड़कियाँ तक ठीक से खोल नहीं पा रहे हैं। इसके अलावा, खाने-पीने की दुकानों पर धूल उड़ने से खाद्य पदार्थों के दूषित होने का खतरा भी बना रहता है।
सड़कों पर कीचड़ और फिसलन: कई बार ट्रैक्टरों से मिट्टी सड़क पर गिर जाती है, जिससे हल्की नमी या पानी पड़ने पर वहाँ फिसलन बढ़ जाती है, जिससे दोपहिया वाहनों के चालकों के दुर्घटनाग्रस्त होने की आशंका बनी रहती है।
ग्रामीणों की प्रमुख मांग: ट्रैक्टरों पर अनिवार्य रूप से लगाया जाए त्रिपाल
इस विकट परिस्थिति से परेशान होकर स्थानीय ग्रामीणों और दुकानदारों ने एकजुट होकर प्रशासन से सख्त कदम उठाने की गुहार लगाई है।
त्रिपाल के उपयोग की माँग: ग्रामीणों का कहना है कि जब तक मिट्टी की ढुलाई का यह कार्य चलेगा, तब तक सभी ट्रैक्टरों और ढुलाई वाहनों पर त्रिपाल या प्लास्टिक शीट बांधना अनिवार्य किया जाए, ताकि मिट्टी हवा में न उड़े।
नियमित पानी का छिड़काव: इसके साथ ही ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि निर्माण एजेंसी द्वारा प्रभावित सड़कों पर नियमित रूप से पानी का छिड़काव (Water Sprinkling) कराया जाए, ताकि जमीन पर बैठी धूल हवा में न फैल सके।
गति सीमा तय हो: रेलवे स्टेशन मार्ग पर वाहनों की तेज रफ्तार और ओवरलोडिंग पर भी रोक लगाने की मांग की गई है, जिससे सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
जलालगढ़ रेलवे स्टेशन के पास चल रहे मिट्टी कटाई और ढुलाई कार्य से उपजी धूल-मिट्टी की समस्या अब असहनीय होती जा रही है। विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन जनता के स्वास्थ्य और पर्यावरण की कीमत पर नहीं। ग्रामीणों द्वारा ट्रैक्टरों पर त्रिपाल लगाने की मांग पूरी तरह से न्यायसंगत और तर्कसंगत है। स्थानीय प्रशासन और संबंधित ठेकेदार को इस मामले में तुरंत संज्ञान लेते हुए सुरक्षा और पर्यावरण मानकों का सख्ती से पालन कराना चाहिए, ताकि विकास की धूल से आम जनता का दम न घुटे और उन्हें राहत मिल सके।