कानपुर पुलिस का अनूठा कारनामा: हुलिया बदलकर पिछले 40 साल से पुलिस को चकमा दे रहे फरार अपराधी को वोटर आईडी के जरिए किया गिरफ्तार; 32 वर्ष की उम्र में तीन किशोरियों को भगाने के मामले में हुई थी सजा, अब 72 साल की उम्र में चढ़ा खाकी के हत्थे; हाईकोर्ट में जवाब दाखिल करने का था भारी दबाव

कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर कमिश्नरेट पुलिस ने अपराध जगत और कानून की लंबी पैरोकार का एक ऐसा हैरान करने वाला अध्याय लिखा है, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। पिछले 40 वर्षों से पुलिस और कानून की नजरों से बचकर छिपते-फिरते रहने वाले एक शातिर फरार अपराधी को कानपुर पुलिस ने आखिरकार तकनीकी सर्विलांस और एक वोटर आईडी कार्ड (Voter ID Card) के जरिए दबोच लिया है। जिस वक्त इस अपराधी को सजा सुनाई गई थी, उसकी उम्र महज 32 वर्ष थी और उस पर तीन किशोरियों को बहला-फुसलाकर भगा ले जाने का गंभीर आरोप था। अब ठीक 40 साल बाद, जब इस अपराधी की उम्र 72 वर्ष हो चुकी है, वह कानपुर पुलिस के हत्थे चढ़ा है। इस गिरफ्तारी ने एक तरफ जहां पुलिस की लंबे समय से चली आ रही तलाश को विराम दिया है, वहीं दूसरी तरफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर जवाब दाखिल करने के भारी प्रशासनिक दबाव के बीच यह सफलता बेहद अहम मानी जा रही है।

जुर्म की शुरुआत: 32 साल की उम्र और तीन किशोरियों का अपहरण मामला

यह सनसनीखेज मामला आज से चार दशक पहले का है, जब उत्तर प्रदेश के कानपुर क्षेत्र में इस अपराधी ने एक ऐसा अपराध किया था जिसने समाज को झकझोर कर रख दिया था।

मुकदमे और सजा का दौर: पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, करीब 40 साल पहले इस आरोपी पर तीन किशोरियों को अवैध रूप से बहला-फुसलाकर भगा ले जाने (Abduction) का गंभीर मामला दर्ज किया गया था। उस समय आरोपी की उम्र लगभग 32 वर्ष थी।

अदालत का फैसला और फरार होना: निचली अदालत ने इस मामले में लंबी सुनवाई के बाद आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। लेकिन सजा के ऐलान से ठीक पहले या कानूनी प्रक्रिया के बीच ही यह शख्स पुलिस की गिरफ्त से बच निकला और भूमिगत (Underground) हो गया। तब से लेकर आज तक पुलिस फाइल में वह एक 'वांटेड' और भगोड़ा अपराधी बना हुआ था।

छिपने की शातिर चाल: हुलिया बदलकर काट रहा था जिंदगी

चार दशकों तक कानून की पकड़ से दूर रहना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन इस आरोपी ने अपनी पहचान छुपाने के लिए ऐसे पैंतरे अपनाए कि पुलिस वर्षों तक अंधेरे में तीर चलाती रही।

बदला हुआ हुलिया: पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तारी से बचने के लिए इस शख्स ने अपना पूरा हुलिया बदल लिया था। उसने अपनी पहचान और ठिकाने लगातार बदले, ताकि स्थानीय स्तर पर भी किसी को उस पर शक न हो सके। उसने उत्तर प्रदेश के बाहर या अलग-अलग इलाकों में छिपकर अपनी जिंदगी बिताई।

पुलिस की पुरानी फाइलें: चूंकि यह मामला दशकों पुराना था, इसलिए इसके दस्तावेज भी पीले पड़ चुके थे और मौजूदा पुलिसकर्मियों के लिए यह एक 'अंधेरे में तीर चलाने' जैसा था। लेकिन पुलिस ने अपनी तकनीकी और खुफिया तंत्र (Intelligence Network) का जाल बिछाना बंद नहीं किया था।

वोटर आईडी बना मास्टर-की: कैसे बिछाया गया गिरफ्तारी का जाल?

इस पूरे ऑपरेशन की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि पुलिस ने आधुनिक तकनीक और पारंपरिक छानबीन का बेहतरीन तालमेल बिठाया।

हाईकोर्ट के दबाव का असर: मानसूनी या नियमित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत, इस तरह के पुराने पेंडिंग मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा लगातार जवाब तलब किया जा रहा था। कोर्ट के सख्त रुख और जवाब दाखिल करने के बढ़ते दबाव के कारण कानपुर पुलिस पर इन पुराने भगोड़ों को ढूंढ निकालने का भारी दबाव था।

वोटर आईडी कार्ड से सुराग: पुलिस की विशेष टीम ने जब इस पुराने मामले की फाइलों को खंगालना शुरू किया और तकनीकी सर्विलांस की मदद ली, तो उन्हें एक नया वोटर आईडी कार्ड मिला। इसी मतदाता पहचान पत्र और डिजिटल पदचिह्नों (Digital Footprints) के आधार पर पुलिस असली ठिकाने तक पहुँचने में कामयाब रही। जब पुलिस ने दबिश दी, तो 32 साल का वह युवा अपराधी अब 72 साल का एक वृद्ध व्यक्ति बन चुका था।

गिरफ्तारी के बाद कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक राहत

72 साल के इस बुजुर्ग अपराधी के पकड़े जाने के बाद कानपुर पुलिस महकमे में राहत की सांस ली गई है, क्योंकि इससे अदालत में जवाब दाखिल करने का रास्ता साफ हो गया है।

कानूनी कार्रवाई: गिरफ्तारी के बाद आरोपी को संबंधित अदालत के समक्ष पेश किया गया, जहाँ से उसे कागजी कार्रवाई पूरी करते हुए न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में जेल भेज दिया गया है।

हाईकोर्ट में रिपोर्ट: चूंकि अदालत द्वारा इस मामले में कड़ा रुख अपनाया गया था, इसलिए पुलिस अब हाईकोर्ट के समक्ष यह रिपोर्ट प्रस्तुत करने की स्थिति में है कि चार दशक पुराना भगोड़ा अब कानून की गिरफ्त में आ चुका है।

कानपुर पुलिस द्वारा 40 साल से फरार चल रहे 72 वर्षीय अपराधी को वोटर आईडी के जरिए धर दबोचने की यह घटना यह साबित करती है कि कानून के हाथ भले ही लंबे हों, लेकिन वे अंततः अपराधी तक पहुँच ही जाते हैं। तीन किशोरियों को भगा ले जाने के मामले में 32 साल की उम्र में कानून से भागने वाला यह शख्स आज बुढ़ापे की दहलीज पर अपनी करनी की सजा भुगतने के लिए सलाखों के पीछे पहुँच चुका है। यह मामला न केवल पुलिस की जि ल्दबाजी और तकनीकी दक्षता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि न्याय की प्रक्रिया में समय जरूर लग सकता है, लेकिन न्याय की प्रासंगिकता कभी कम नहीं होती।