औद्योगिक सलाहकार प्रदीप कुमार झुनझुनवाला ने 'यूपीआई कराधान विधेयक-2026' पर चेताया, कहा- छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों की आजीविका पर पड़ेगा गहरा असर
भागलपुर/विशेष संवाददाता: देश के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम (Digital Payment Ecosystem) में पिछले कुछ वर्षों में आई अभूतपूर्व क्रांति ने आम आदमी के जीवन को बेहद आसान बना दिया है। चाय के छोटे टप्पर से लेकर बड़े मॉल तक, हर जगह 'स्कैन एंड पे' (Scan & Pay) यानी यूपीआई (UPI) आज हर भारतीय की आदत बन चुका है। लेकिन इस बीच, डिजिटल भुगतान से जुड़े संभावित नए कर प्रावधानों को लेकर व्यापार जगत और आर्थिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। जाने-माने औद्योगिक सलाहकार प्रदीप कुमार झुनझुनवाला ने 'यूपीआई से जुड़े कराधान विधेयक-2026' पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि डिजिटल भुगतानों पर किसी भी प्रकार का शुल्क या नया कर (Tax/Charges) लगाया जाता है, तो इसका सबसे गंभीर और नकारात्मक प्रभाव देश के छोटे दुकानदारों, स्ट्रीट वेंडर्स (फुटपाथ विक्रेताओं) और मध्यम वर्ग पर पड़ेगा।
क्या है पूरा मामला और क्यों छिड़ी है बहस?
हाल ही में प्रस्तावित या चर्चा के केंद्र में आए 'यूपीआई कराधान विधेयक-2026' को लेकर आर्थिक विशेषज्ञों के बीच मंथन शुरू हो गया है। सरकार डिजिटल ट्रांजैक्शन को पारदर्शी बनाने और वित्तीय ढांचे को मजबूत करने के लिए लगातार नए नियम बना रही है। हालांकि, इस बीच वित्तीय विशेषज्ञों और उद्योग जगत के जानकारों का एक वर्ग यह आशंका जता रहा है कि यदि सरकार डिजिटल पेमेंट्स के जरिए होने वाले लेन-देन पर किसी तरह के प्रशासनिक शुल्क या अप्रत्यक्ष कर का दायरा बढ़ाती है, तो इससे पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
औद्योगिक सलाहकार प्रदीप कुमार झुनझुनवाला ने इस संदर्भ में आयोजित एक संगोष्ठी और बातचीत के दौरान कहा कि भारत में डिजिटल भुगतान को जन-जन तक पहुंचाने में यूपीआई (Unified Payments Interface) ने जो भूमिका निभाई है, वह पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। शून्य लागत (Zero Merchant Discount Rate - MDR) पर मिलने वाली इस सुविधा ने देश के छोटे से छोटे व्यापारी को भी डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। लेकिन यदि नए विधेयक के जरिए इस पर किसी तरह का वित्तीय बोझ डाला जाता है, तो यह देश के आर्थिक समावेश (Financial Inclusion) के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
छोटे दुकानदारों और फुटपाथ विक्रेताओं पर कसेगा शिकंजा?
प्रदीप कुमार झुनझुनवाला ने अपने बयान में खासतौर पर उन छोटे कारोबारियों का जिक्र किया जो अपनी आजीविका के लिए रोजाना के छोटे-छोटे लेन-देन पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि एक फल विक्रेता, चाय वाला, ऑटो चालक या ठेले पर सामान बेचने वाला व्यक्ति जब 10 रुपये या 20 रुपये का भुगतान यूपीआई के जरिए स्वीकार करता है, तो उसके पास हर पैसे का हिसाब स्पष्ट रहता है।
मार्जिन की समस्या: छोटे दुकानदारों का मुनाफा (Profit Margin) बहुत कम होता है। यदि डिजिटल भुगतान पर किसी भी प्रकार का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या अतिरिक्त कर थोपा जाता है, तो दुकानदार या तो डिजिटल पेमेंट लेना बंद कर देंगे या फिर उन्हें अपनी जेब से इसका नुकसान उठाना पड़ेगा।
नकद लेनदेन की ओर वापसी: यदि डिजिटल भुगतान महंगा या जटिल होता है, तो देश का एक बड़ा वर्ग फिर से नकदी (Cash) की तरफ लौटने को मजबूर हो जाएगा, जो सरकार के 'कैशलेस इकॉनमी' (Cashless Economy) के विजन को एक बड़ा झटका होगा।
डिजिटल अर्थव्यवस्था को लग सकता है झटका
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत की फिनटेक (FinTech) क्रांति की रीढ़ यूपीआई की सुगमता और इसकी मुफ्त उपलब्धता है। यदि कराधान विधेयक-2026 के प्रावधानों में पारदर्शिता नहीं बरती गई और छोटे व्यापारियों को राहत नहीं दी गई, तो इसके दीर्घकालिक परिणाम अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।
श्री झुनझुनवाला ने जोर देकर कहा कि सरकार को नीतिगत फैसले लेते समय जमीन पर काम करने वाले छोटे व्यापारियों और खुदरा विक्रेताओं की जमीनी हकीकत को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि नीति निर्माताओं को ऐसे प्रावधान लाने चाहिए जो डिजिटल भुगतान को हतोत्साहित करने के बजाय इसे और अधिक सुरक्षित, सुगम और पूरी तरह शुल्क-मुक्त बनाए रखें।
व्यापार संगठनों और जानकारों की प्रतिक्रियाएं
प्रदीप कुमार झुनझुनवाला के इस बयान के बाद देश भर के विभिन्न व्यापारिक संगठनों और चैंबर ऑफ कॉमर्स में भी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। व्यापारियों का कहना है कि वे पहले से ही जीएसटी (GST) और अन्य अनुपालन औपचारिकताओं के बोझ तले दबे हैं। ऐसे में यदि डिजिटल पेमेंट पर कोई नया टैक्स या शुल्क आता है, तो उनके लिए व्यवसाय करना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार 'यूपीआई कराधान विधेयक-2026' के प्रारूप को अंतिम रूप देते समय इन चिंताओं और सुझावों को कितना स्थान देती है। लेकिन इतना तय है कि औद्योगिक सलाहकार प्रदीप कुमार झुनझुनवाला द्वारा उठाया गया यह मुद्दा देश के करोड़ों छोटे कारोबारियों की उस आवाज को बुलंद कर रहा है, जो डिजिटल भारत की इस दौड़ में अपनी आजीविका को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं।