दरभंगा के केवटी प्रखंड स्थित ऐतिहासिक बाबा रामेश्वर नाथ महादेव मंदिर: 18वीं शताब्दी के इस पावन तीर्थ में उमड़ती है शिवभक्तों की भारी भीड़; सावन और प्रत्येक सोमवार को गूंजता है 'हर-हर महादेव' का जयकारा
दरभंगा: बिहार की पौराणिक, सांस्कृतिक और धार्मिक धरा दरभंगा में अनगिनत ऐसे प्राचीन और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं, जो देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए अगाध आस्था का केंद्र बने हुए हैं। इन्हीं गौरवशाली धरोहरों में से एक प्रमुख नाम है दरभंगा जिले के केवटी प्रखंड (Keoti Block) के अंतर्गत आने वाले दक्षिण रनवे गांव (Dakshin Runway Village) में स्थित ऐतिहासिक बाबा रामेश्वर नाथ महादेव मंदिर (Baba Rameshwar Nath Mahadev Temple)। लगभग 18वीं शताब्दी में निर्मित यह प्राचीन शिव मंदिर अपनी विशिष्ट वास्तुकला, आध्यात्मिक महत्ता और चमत्कारी मान्यताओं के कारण आज के समय में मिथिलांचल का एक प्रमुख धार्मिक स्थल बन चुका है। यूं तो वर्षभर इस पावन मंदिर में भगवान शिव के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन विशेष तौर पर प्रत्येक सोमवार को यहां भक्तों का सैलाब उमड़ता है। वहीं, पवित्र सावन मास (Savan Month) के दौरान तो इस मंदिर का आध्यात्मिक परिवेश देखते ही बनता है, जहां दूर-दराज से आने वाले स्थानीय और बाहरी शिवभक्त अपनी मनोकामनाओं को लेकर बाबा भोलेनाथ के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते हैं।
मंदिर का ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्वरूप: 18वीं शताब्दी की अनमोल धरोहर
दक्षिण रनवे गांव स्थित बाबा रामेश्वर नाथ महादेव मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है और इसका निर्माण काल इसकी ऐतिहासिक महत्ता को और अधिक प्रगाढ़ कर देता है।
18वीं शताब्दी की वास्तुकला: इतिहासकार और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इस भव्य मंदिर की स्थापना 18वीं शताब्दी में हुई थी। उस दौर की स्थापत्य कला (Architecture) की अद्भुत छाप इस मंदिर के निर्माण में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इसकी पुरानी ईंटें, मंदिर का गुंबद और गर्भगृह का पुरातात्विक ढांचा उस कालखंड की संस्कृति और कलाप्रेम की कहानी बयां करता है।
भक्तों की अटूट आस्था: बुजुर्गों का मानना है कि इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग बेहद जाग्रत और स्वयंभू या पारंपरिक रूप से स्थापित पवित्र स्वरूप में है। यहां सच्चे मन से जो भी भक्त अपनी झोली फैलाकर मन्नत मांगता है, बाबा रामेश्वर नाथ उसकी हर मनोकामना को पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि समय के साथ इसका विस्तार हुआ है।
प्रत्येक सोमवार की विशेष पूजा और अनुष्ठान
हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है, और केवटी के दक्षिण रनवे स्थित इस मंदिर में हर सोमवार का दिन किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता।
सुबह से ही लगती है लंबी कतारें: हर सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त से ही मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। आस-पास के दर्जनों गांवों से पुरुष, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग नंगे पांव जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग और फल-फूल लेकर मंदिर पहुंचने लगते हैं।
रुद्राभिषेक और महाआरती: सोमवार के दिन गर्भगृह में विशेष वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाबा रामेश्वर नाथ का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक किया जाता है। संध्या बेला में होने वाली भव्य महाआरती में सैकड़ों दीपों की रोशनी और शंख-घंटियों की गूंज से पूरा इलाका पूरी तरह शिवमय हो उठता है।
सावन मास में उमड़ता है शिवभक्तों का सैलाब
पवित्र सावन मास (श्रावण मास) के दौरान बाबा रामेश्वर नाथ महादेव मंदिर की रौनक और महिमा कई गुना बढ़ जाती है। यह पूरा महीना इस क्षेत्र के लिए एक बड़े मेले जैसा होता है।
स्थानीय और बाहरी श्रद्धालुओं की भीड़: सावन के चारों सोमवार और प्रत्येक दिन के कांवरिया यात्रा के दौरान केवटी और उसके आसपास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में कांवरिया पवित्र नदियों से जल भरकर इस मंदिर तक पैदल यात्रा करते हैं।
सांस्कृतिक और धार्मिक उल्लास: सावन में मंदिर परिसर को फूलों और रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है। बोल बम और हर-हर महादेव के जयकारों से पूरा दक्षिण रनवे गांव गूंज उठता है। मेले जैसा माहौल होने के कारण स्थानीय दुकानदारों और व्यवसायियों के लिए भी यह समय काफी उल्लासपूर्ण रहता है।
केवटी प्रखंड के दक्षिण रनवे गांव स्थित ऐतिहासिक बाबा रामेश्वर नाथ महादेव मंदिर केवल एक पूजा-स्थल नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन संस्कृति, धरोहर और अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक है। 18वीं शताब्दी से लेकर आज तक यह मंदिर बिना थके, बिना रुके समाज को एकता और आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाता आ रहा है। सावन के महीने में और प्रत्येक सोमवार को यहां जुटने वाली भक्तों की भारी भीड़ यह साबित करती है कि भौतिकता की इस दौड़ में भी हमारी आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इस ऐतिहासिक धरोहर का और अधिक संरक्षण किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी समृद्ध संस्कृति और इस पावन मंदिर के इतिहास से भली-भांति परिचित हो सकें।