मुजफ्फरपुर में स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलती दर्दनाक घटना: आयुष्मान भारत योजना से नाम कटने के कारण कैंसर पीड़ित की रुकी कीमोथेरेपी, पत्नी ने अस्पताल प्रबंधन पर लगाए गंभीर आरोप

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता और प्रशासनिक लापरवाही को बेनकाब करने वाली एक बेहद मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। जिले के एक कैंसर पीड़ित मरीज की पत्नी ने अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए बताया है कि आयुष्मान भारत योजना (Ayushman Bharat Yojana) की सूची से अचानक उनके पति का नाम कट जाने के कारण उनका जीवनरक्षक इलाज और कीमोथेरेपी बीच में ही रोक दी गई।

पिछले चार वर्षों से अपनी बीमारी से बहादुरी से जंग लड़ रहे इस मरीज के सामने अब इलाज के आभाव में जिंदगी और मौत का संकट खड़ा हो गया है। इस घटना के बाद से स्थानीय स्तर पर गरीबों के इलाज के दावों की हवा निकलती नजर आ रही है और चारों तरफ आक्रोश का माहौल है।

क्या है पूरा मामला? (चार साल से चल रहा था इलाज)

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पीड़ित मरीज पिछले चार लंबे वर्षों से कैंसर जैसी घातक बीमारी से पीड़ित है और मुजफ्फरपुर के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में उसका लगातार इलाज चल रहा था।

नियमित कीमोथेरेपी: डॉक्टर की सलाह के अनुसार मरीज की समय-समय पर कीमोथेरेपी और अन्य चिकित्सीय प्रक्रियाएं हो रही थीं, जिससे उसकी स्थिति नियंत्रण में थी। इस पूरे लंबे सफर के दौरान आयुष्मान भारत योजना के तहत मिलने वाले गोल्डन कार्ड से उनका इलाज सुचारू रूप से चल रहा था।

अचानक सूची से नाम गायब: कुछ दिन पहले जब परिजन मरीज को अगली कीमोथेरेपी के लिए अस्पताल लेकर पहुंचे, तो अस्पताल के पोर्टल पर जांच के दौरान यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि आयुष्मान भारत की सूची से मरीज का नाम अचानक गायब (कट) हो चुका है।

पत्नी का छलका दर्द: "पैसे के अभाव में कैसे बचाएं पति की जान?"

मरीज की बेसहारा पत्नी ने रोते हुए मीडिया और स्थानीय अधिकारियों के सामने अपनी आपबीती सुनाई। उनका दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता:

अस्पताल का रूखा रवैया: पत्नी का आरोप है कि जब उन्होंने अस्पताल प्रबंधन से गुहार लगाई कि वे पिछले चार साल से यहाँ इलाज करवा रहे हैं और तकनीकी गड़बड़ी के कारण योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है, तो अस्पताल के कर्मचारियों ने साफ कह दिया कि बिना योजना के नाम या पैसों के वे आगे का इलाज या कीमोथेरेपी शुरू नहीं कर सकते।

आर्थिक तंगी और लाचारी: परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। पिछले चार वर्षों में इलाज करवाते-करवाते उनकी सारी जमापूंजी और घर के जेवरात बिक चुके हैं। पत्नी का कहना है, "सरकार गरीबों के लिए आयुष्मान योजना का बड़ा-बड़ा दावा करती है, लेकिन ऐन वक्त पर नाम काटकर हमारे पतियों की सांसों की डोर खींची जा रही है। हम प्राइवेट में कीमोथेरेपी का खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ हैं।"

आयुष्मान भारत योजना और सिस्टम की खामियां

यह घटना देश की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत (PM-JAY) के क्रियान्वयन पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।

पोर्टल से नाम हटना: अक्सर तकनीकी गड़बड़ी, डेटा री-वेरिफिकेशन या सूची के अद्यतन (Update) के दौरान कई पात्र और जरूरतमंद लाभुकों के नाम बिना किसी पूर्व सूचना के पोर्टल से हट जाते हैं।

गरीबों की सुध लेने वाला कोई नहीं: जब कोई गंभीर बीमारी (जैसे कैंसर) से जूझ रहा मरीज अस्पताल के बेड पर हो और उस वक्त प्रशासनिक भूल या सर्वर की गलती से उसका नाम सूची से गायब हो जाए, तो उसके लिए वह पल किसी वज्रपात से कम नहीं होता।

स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता: इस मामले में जिला स्वास्थ्य विभाग या आयुष्मान योजना के स्थानीय समन्वयकों की तरफ से अभी तक कोई ठोस स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है, जिससे आम जनता में भारी नाराजगी है।

सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों का आक्रोश

मुजफ्फरपुर की इस घटना ने बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को झकझोर कर रख दिया है। विभिन्न संगठनों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि तुरंत इस मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया जाए।

तत्काल इलाज की मांग: सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कागजी प्रक्रिया और सूची में नाम होने या न होने की बहस बाद में होती रहे, लेकिन कैंसर जैसे गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति की कीमोथेरेपी एक मिनट के लिए भी नहीं रुकनी चाहिए।

अस्पताल की मानवीय संवेदना: मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए अस्पताल को तुरंत अपनी देखरेख में मरीज का इलाज शुरू करना चाहिए और जिला प्रशासन को इसके खर्च की भरपाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

मुजफ्फरपुर में कैंसर पीड़ित की पत्नी द्वारा लगाया गया यह आरोप केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनहीनता का आईना है। चार साल तक इलाज कराने के बाद अचानक आयुष्मान भारत योजना से नाम कट जाना और इसके कारण कीमोथेरेपी का रुक जाना एक बहुत बड़ी प्रशासनिक भूल है। यदि समय रहते इस मरीज को उचित चिकित्सा सहायता नहीं मिली, तो यह लापरवाही एक बहुमूल्य जान ले सकती है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर मामले पर कितनी जल्दी संज्ञान लेते हैं और पीड़ित परिवार को क्या राहत पहुँचाते हैं।